॥ पुलस्त्य उवाच ॥
महर्षि पुलस्त्य राजा ययाति से बोले–
॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ गुहेश्वरमनुत्तमम् ॥
गुहामध्ये गतं लिङ्गं सिद्धेः संपूजितं पुरा ॥ १ ॥
हे नृपश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् मनुष्य अत्युत्तम गुहेश्वर तीर्थ की ओर प्रस्थान करे। जहां पर पूर्वकाल में सिद्धों द्वारा सविधि पूजित एक लिंग मिलता है। जो गुफा के मध्य प्रतिष्ठित है।।१।।
यं यं काममभिध्याय संपूजयति मानवः ॥
तं तं स लभते राजन्निष्कामो मोक्षमाप्नुयात् ॥ २ ॥
मानव जिस जिस कामना को मन में रखकर उस लिंग की पूजा करता है। हे राजन्! प्राणी उन उन भोग पदार्थों को प्राप्त करता है।। यदि निष्काम भाव से उसका पूजन किया जाय तो निश्चित ही वह मोक्ष को प्राप्त करता है।।२।।
इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे गुहेश्वरमाहात्म्यवर्णनं नाम षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥
इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” गुहेश्वर तीर्थ ” के माहात्म्य का वर्णन करने वाला ५६ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

