अध्याय- ४०, कामेश्वर माहात्म्य

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले–

॥ ततः कामेश्वरं गच्छेत्तत्र कामप्रतिष्ठितम् ।। यस्मिन्दृष्टे सदा मर्त्यः सुरूपः सुप्रभो भवेत् ॥ १ ॥

तत्पश्चात् मानव कामदेव के द्वारा प्रतिष्ठित कामेश्वर महादेव का दर्शन करने जाय। जिनके दर्शन से मनुष्य सुंदर रूप और मनोहर कांति को प्राप्त करता है।।१।।

॥ ययातिरुवाच ॥

ययाति जी बोले —

॥ त्वया प्रोक्तं पुरा शम्भुः कामबाणभयात्किल ।। वालखिल्याश्रमं प्राप्तो यत्र लिंगं पपात ह ॥ २ ॥

भगवन्! आपने पहले बतलाया कि भगवान शिव कामदेव के बाण के भय से भागकर वालखिल्य मुनियों के आश्रम पर पहुंचे । जहां उनका लिंग उन ऋषियों के शाप से गिरा।।२।।

स कथं पूजितस्तेन शंभुर्मे कौतुकं महत् ॥
वद सर्वं दिजश्रेष्ठ कामेश्वरनिवेशनम् ॥ ३ ॥

तो कामदेव के द्वारा उन भगवान शिव की पूजा कैसे हुई? पराजित होकर तो दुर्बल़ भागता है। तो बलवान् उसकी पूजा कैसे करेगा? यह मेरे हृदय में बड़ा कुतूहल है। इसलिए हे द्विजवर ! कामदेव के द्वारा कामेश्वर शिवलिंग की स्थापना के विषय में बतलाइये।।३‌‌।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले–

॥ मुक्तलिंगेऽपि देवेशे न स्मरस्तं मुमोच ह । दर्शयन्नात्मनो बाणं तस्यासौ पृष्ठतः स्थितः ॥ २॥

भगवान् महादेव का लिंग गिर जाने पर भी काम ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। वह अपने बाण को दिखाते हुए भयभीत करता हुआ उनके पीछे लगा रहा। इससे यह शिक्षा मिलती है कि शिश्नेन्द्रिय गिर जाय या शिथिल हो जाय तो भी कामशत्रु पीछा नहीं छोड़ता । देहाभिमान अर्थात् स्वरूपविस्मृति ही कामादि समस्त अनर्थों की जड़ है- यही शिक्षा सच्चिदानन्द भगवान् शिव अपनी इस लीला से दे रहे हैं।।।२।।

ततो वाराणसीं प्राप्तस्तद्भयात्त्रिपुरान्तकः ॥ तत्राऽपि च तथा दृष्ट्वा धृतचापं मनोभवम् ॥५॥

उसके बाद त्रिपुरान्तक भगवान् शिव काम के भय से वाराणसी पहुंचे। वहां पर भी उन्होंने धनुषधारी काम को देखकर।।५।।

ततः प्रयागमापन्न: केदारं च ततः परम् ॥
नैमिषे भद्रकर्णं च जम्बूमार्गे त्रिपुष्करम् ॥ ६॥

वहां से प्रयाग पहुंचे। पुनः काम से बचने के लिए केदार पुनः केदार से नैमिष तीर्थ, वहां से भद्रकर्ण, भद्रकर्णं से जंबू नदी के मार्ग में पड़ने वाले त्रिपुष्कर तीर्थ।।६।।।

गोकर्ण च प्रभासं च पुण्यं च कृमिजाङ्गलम् ॥ गंगाद्वारं गयाशीर्षं कालाभीष्टं वटेश्वरम् ॥७।।

वहां से गोकर्ण, प्रभास, पुण्यमय कृमिजांगल,गंगाद्वर,गया शीर्ष, कालाभीष्ट,वटेश्वर तीर्थो में क्रमश: शिव जी पहुंचे।।७।।

किंवा तेन बहूक्तेन तीर्थान्यायतनानि च ॥ असंख्यानि गतो देवः कामं च ददृशे तथा ॥ ८ ॥

अधिक क्या कहा जाय? असंख्य तीर्थों, देवस्थानों पर जहां जहां भगवान महेश्वर पहुंचे। वहां वहां धनुष पर बाण चढ़ाये हुए कामदेव को उन्हों नेने देखा।।८।।

यत्र यत्र महादेवस्तद्भयादुपगच्छति ॥
तत्र तत्र पुनः: कामं प्रपश्यति धृतायुधम् ॥ ९ ॥

महादेव जी काम के भय से जहां जहां जाते हैं। वहीं वहीं धनुष-बाण-धारी काम को देखते हैं।।९।।

कस्यचित्त्वथ कालस्य पुनः प्राप्तोऽर्बुदं प्रति ॥ तत्रापश्यत्तथा काममाकर्णाकर्षितायुधम्॥ आकुंचितैकपादं च स्थिरदृष्टिं नृपोत्तम॥१०॥

हे राजेन्द्र! इस प्रकार काम के प्रकोप से भीत भगवान शिव कुछ समय बाद आबू पर्वत पहुंचे। वहां पर भी उन्होंने देखा कि आगे का पैर मोड़कर लक्ष्य पर दृष्टि स्थिर किया हुआ काम कान तक धनुष पर बाण खींचे हुए आक्रामक मुद्रा में खड़ा है।।१०।।

अथाऽसौ भगवान्छान्तः प्रियादुःखसमन्वितः ॥ कोधं चक्रे विशेषेण दृष्ट्वा तं पुरतः स्थितम् ॥ ११ ॥

परम शान्त भगवान् शिव अपनी प्रियतमा सती के दु: ख से वैसे ही अत्यधिक दुःखी थे। और उस पर
दुर्जय काम उन्हें संतप्त कर रहा था।अब त्रिपुरान्तक से रहा नहीं गया। काम अपनी मर्यादा का अतिक्रमण कर चुका था। अब भगवान् अपने सामने काम को देखकर भयंकर क्रोध प्रकट किये।।११।।

तस्य कोपाभिभूतस्य ततीयान्नयनान्नृप ।।
निश्चक्राम महाज्वाला ययाऽसौ भस्मसात्कृतः॥१२ ॥

हे राजन्! क्रोधाविष्ट त्रिपुरारि के तृतीय नेत्र से बड़ी भयंकर अग्नि की महाज्वाला निकली। जिससे वह दुष्ट काम तत्क्षण भस्म हो गया।।१२।।

सचापः सशरो राजंस्तस्मिन्पर्वतरोधसि ॥
शंकरो रोषपर्यन्तं गत्वा सौख्यमवाप्तवान् ॥ १३ ॥

वह धनुष-बाण- धारी काम आबू पर्वत में ही भस्म हुआ था। तत्पश्चात् भगवान् शंकर क्रोध शान्त करके परम सुखी हुए। तात्पर्य यह कि तीर्थयात्रा से काम पर विजय नहीं मिल सकती । काम को तो आज्ञा चक्र की दिव्याग्नि से ही भस्म किया जा सकता है।।१३।।

कैलासं पर्वतश्रेष्ठं जगाम सुरपूजितः ।॥
दग्धे मनोभवे भार्या रतिरस्य पतिव्रता ॥ व्यलपत्करुणं दीना पतिशोकपरिप्लुता ॥ १४॥

देवता भगवान् भव की पूजा किये। तत्पश्चात् वे पर्वतश्रेष्ठ कैलास पधारे। इधर काम के भस्म हो जाने पर उसकी पतिव्रता दीन पत्नी रति पतिशोक से व्याकुल होकर करुण विलाप करने लगी।।१४।।

ततो दारूणि चाहृत्य चितिं कृत्वा नराधिप ॥ आरुरोहाग्निसंदीप्तां चितिं सा पतिदुःखिता ॥ तावदाकाशगां वाणीं शुश्राव च यशस्विनी ॥ १५ ॥

हे नृपश्रेष्ठ! तत्पश्चात् रति ने लकड़ियों को इकट्ठा करके चिता बनायी और अग्नि से प्रज्वलित उस चिता पर पति की मृत्यु से दु:खित रति जैसे ही चढ़ी । उसी समय उस यशस्विनी ने आकाशवाणी सुना।।१५।।

॥ वागुवाच ॥

आपकावाणी बोली–

॥ मा पुत्रि साहसं कार्षीस्तपसा तिष्ठ सुन्दरि ॥
भूयः प्राप्स्यसि भर्त्तारं कामं तुष्टेन शम्भुना ॥ १६ ॥

हे पुत्रि! ऐसा दुस्साहस मत करो। हे सुंदरि! रुक जाओ। भगवान् शिव के प्रसन्न होते ही तुम अपने पति कामदेव को पुनः प्राप्त कर लोगी।।१६।।

सा श्रुत्वा तां तदा वाणीं समुत्तस्थौ सुमध्यमा ॥ देवमाराधयामास दिवानक्तमतन्द्रिता ॥
व्रतैर्दानैर्जपैर्होमैरुपवासैस्तथा परैः ॥ १७ ॥

उस आकाशवाणी को सुनकर जिसके देह का मध्य भाग अतिसुंदर है ऐसी वह काम पत्नी रति शीघ्र ही उठकर खड़ी हो गयी। और आलस्य छोड़कर दिन रात उत्तम व्रतों,दानों, जपों, होमों तथा उपवासों से भगवान् सतीपति की आराधना करने लगी।।१७।।

ततो वर्षसहस्रान्तेतुष्टस्तस्या महेश्वर: ।
अब्रवीद्वद कल्याणि वरं यन्मनसिस्थितम्।।१८।।

तत्पश्चात् एक हजार वर्ष बीतने के बाद उस पर भगवान् महेश्वर प्रसन्न हुए और बोले। हे कल्याणि! तुम्हारे मन में जो स्थित हो । वह वर मुझसे मांग लो।।१८।।

।। रतिरुवाच॥

रति बोली–

॥ यदि तुष्टोऽसि मे देव भगवांल्लोकभावन:।
अक्षताङ्ग: पुनः: काम: कान्तो मे जायतां पति: ।।१९।।

हे संपूर्ण विश्व को उत्पन्न करने वाले परमात्मन्! हे महादेव ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं। तो मेरा पति काम अपने संपूर्ण अंगों से युक्त होकर अत्यंत सुंदर हो जाय।।१९।।

॥ एवमुक्ते तया वाक्ये तत्क्षणात्समुपस्थितः ।॥ यथा सुप्तो महाराज तद्वद्रूपः स हर्षित:॥ २० ॥

इस प्रकार उसके वर मांगते ही तत्क्षण काम उठकर खड़ा हो गया। हे महाराज ! जैसे कोई सोया हुआ पुरुष उठकर खड़ा हो जाता है। वैसे ही अपने पूर्व रूप को प्राप्त कर वह काम अत्यंत हर्षित हुआ।।२०।।

इक्षुयष्टिमयं चापं पुष्पबाणसमन्वितम् ॥ भृङ्गश्रेणिमय्या मौर्व्या शोभितं सुमनोहरम् ॥ २१ ॥

वह अत्यंत मनोहर ईंख की छड़ी से बना धनुष और सुंदर पुष्पों के बाण से युक्त था। उसके धनुष की प्रत्यंचा भंवरों की पंक्तियों से बनी थी।।२१।।

ततो रतिसमायुक्तः प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ अनुज्ञातस्तु तेनैव स्वव्यापारेऽभ्यवर्त्तत ॥ २२ ॥

इस प्रकार काम अपनी पत्नी रति से मिला और भगवान् शिव को प्रणाम करके उनकी आज्ञा लेकर पुनः अपने काम में लग गया।।२२।।

स दृष्ट्वा शिवमाहात्म्यं श्रद्धां कृत्वा नृपोत्तम ॥
शिवं संस्थापयामास पर्वतेऽर्बुदसंज्ञिते ॥ २३ ॥

हे राजेन्द्र ! काम ने भगवान् शिव के प्रभाव को देखकर उनमें श्रद्धा करते हुए उस आबू पर्वत मेंं शिव जी की स्थापना की ।।२३।।

यस्मिन्दृष्टे महाराज नारी वा यदि वा नरः ॥ सप्तजन्मान्तराण्येव न दौर्भाग्यमवाप्नुयात् ॥ २४ ॥

हे महाराज ! जिनका दर्शन होते ही चाहे नर हो या नारी। वह सात जन्मों में कभी भी दुर्भाग्य प्राप्त नहीं करता।।२४।।

एवमेतन्मया ख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।। कामेश्वरस्य माहात्म्यं कामदाहं सविस्तरम् ॥ २५ ॥

हे राजन् ! तुमने जो मुझसे पूछा था। वह कामेश्वर का माहात्म्य और कामदाह सब कुछ मैंने तुम्हें बड़े विस्तार से बतला दिया।।२५।।

इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे कामेश्वरमाहात्म्यवर्णनं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” कामेश्वर माहात्म्य” का वर्णन करने वाला ४० वां अध्याय पूर्ण क्षंय्हुआ।।

 

2 Replies to “अध्याय- ४०, कामेश्वर माहात्म्य

  1. प्रणमामि गुरुवर!
    यह श्रीकामेश्वर मंदिर आबू में कहां स्थित है क्या आप यहां गए हैं?

    1. अनेक मंदिरों पर गया हूं। किन्तु व्याख्या लेखन बाद में शुरू हुआ । इसलिए स्मरण नहीं है।

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