॥ पुलस्त्य उवाच ॥
महर्षि पुलस्त्य महाराज ययाति से बोले–
॥ अवियुक्तवनं गच्छेत्ततः पार्थिवसत्तम ॥ यस्मिन्दृष्टे नरोभीष्टैर्न वियुज्येत कर्हिचित् ॥१॥
हे नृपश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् प्राणी अवियुक्त वन नामक तीर्थ में जाय। जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य अपने अभीष्ट से कभी भी अलग नहीं हो सकता।।१।।
तत्र पूर्व शची राजन्प्रविष्टा दुःखसंयुता ॥
नहुषेण हृते राज्ये देवेन्द्रस्य महात्मनः ॥ २ ॥
हे राजन् ! पूर्वकाल में जब देवेंद्र जैसे महात्मा का राज्य नहुष को प्राप्त हुआ तो उनकी कुदृष्टि से दु:खी होकर इन्द्र की पत्नी शची इसी वन में आयीं।।२।।
तत्प्रभावात्पुनः प्राप्तो वियुक्तोऽपि शतक्रतुः ॥ ततस्तस्य वरो दत्तो वनस्य हि तया नृप ॥ ३ ॥
१०० यज्ञों के अनुष्ठाता इन्द्र यद्यपि उनसे बिछुड़ गये थे।तथापि इस तीर्थ के प्रभाव से उन्होंने पत्नी शची को पुनः प्राप्त कर लिया था।।३।।
नरो वा यदि वा नारी वियुक्ताऽत्र वने शुभे ॥ प्रियैर्निवास एकस्मिन्रात्रिमेकां वसिष्यति ॥ ४ ॥
जो नर या नारी अपने प्रियजनों से बिछुड़ गयी हो । वह इस अवियुक्त वन में यदि एक रात्रि निवास करेगी ।।४।।
स तेन लभते संगं भूय एव यथो मया ॥
प्रियैः स लभते वासमेकरात्रं वसन्नृप ॥ ५ ॥
वह मनुष्य उस बिछुड़े व्यक्ति का साथ पुनः प्राप्त कर लेता है। जैसे इंद्र की लक्ष्मी शची देवी ने अपने स्वामी इंद्र का संग प्राप्त किया। हे राजन् ! यहां एक रात्रि वास करने से ही प्रियजन संग रूपी फल प्राप्त होता है।।५।।
फलदानं प्रशंसन्ति तत्र ब्राह्मणसत्तमाः ॥
वंध्यानां च विशेषेण यतः पुत्रफलं लभेत् ॥ ६ ॥
इस तीर्थ में फलदान की प्रशंसा श्रेष्ठ मुनिजन करते हैं। जो बांझ स्त्री है। वह विशेष रूप से पुत्र रूपी फल अवश्य प्राप्त करती है।।
इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डेऽवियुक्तक्षेत्र माहात्म्यवर्णनं नाम सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” अवियुक्त क्षेत्र ” के माहात्म्य का वर्णन करने वा
ला ५७ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

