कमलाकान्त त्रिपाठी जी के आक्षेप का खण्डन भाग-१

श्रीरामकृष्णादिमन्त्रों के निन्दापरक श्रीवचनभूषणकार के कथन की समीक्षा” लेख की आपत्तियां पूर्ववत् गर्ज रही हैं।

 

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श्रीरामानुजीय विद्वान् प्रो•श्रीकमलाकान्त त्रिपाठी जी के लेख की समीक्षा भाग–१

 

26 जून 2024 को फेसबुक में प्रस्तुत किये गए ‘श्रीरामकृष्णादिमन्त्रों के निन्दापरक श्रीवचनभूषणकार के कथन की समीक्षा”

 नामक लेख का उत्तर श्रीरामानुज संप्रदाय की ओर से प्राप्त करके 24 जुलाई 2024को विद्वद्वर आचार्य ऋषिकुमार त्रिपाठी द्वारा मुझे भेजा गया । 

 

लेख का शीर्षक है —

 

 “श्रीसियारामदास जी नैयायिक के द्वारा श्री रामानुजीय आचार्यों के ऊपर किए गए आक्षेपों का समाधान”

लेखक – प्रो• कमलाकान्त त्रिपाठी

 इस लेख में 13 पृष्ठ हैं।

 

लेख पढ़ने से निश्चित हुआ कि मेरे द्वारा उठायी गयीं आपत्तियों का निराकरण करने में मेरे मित्र श्रीत्रिपाठी जी दत्तचित्त नहीं थे।। 

 

हां उन्होंने आक्षेप अवश्य किया है । जिसका क्रमश: निराकरण कर रहा हूं।

 

एक बात और बता देना चाहता हूं कि मैं फेसबुक में अपने लेख में उठाई गई आपत्तियों के समाधान हेतु प्रोफेसर श्रीकमलाकान्त त्रिपाठी जी को समाहूत किया था ।किंतु यहां पर उन्होंने कोई समाधान नहीं दिया । 

 

इसका कारण यह है कि वॉल पर मेरे लेख को विज्ञ जन पढ़ सकते हैं । और ये क्या समाधान देंगे, उसका लेख से क्या संबंध होगा , – इसका परिज्ञान सभी को हो जाता कि समाधान क्या दे रहे हैं और पूछा क्या जा रहा है, आपत्ति क्या उठायी जा रही है। इसलिए फेसबुक के लेख पर तो समाधान विद्वद्वर ने दिया ही नहीं ।अस्तु।

 

अब जो लेख इन्होंने लिखा है । उसमें मेरे लेख के कुछ अंश को लेकर जिनका सम्बन्ध लेख में प्रस्तुत अग्रिम पंक्तियों से है उसको दृष्टिपात न करते हुए 

आपत्तियां उठाई जिनका समाधान किया जा रहा है।

उनमें किसी एक का भी उत्तर नहीं दिया फिर भी लेखक जिन आपत्तियों को उठाने का प्रयास किया है उसको समक्ष प्रस्तुत करते हुए मैं उसकी परीक्षा कर रहा हूं। 

 

प्रोफेसर कमलाकान्त त्रिपाठी जी लिखते हैं कि “श्री नैयायिक जी की आपत्तियों पर अब विचार होना चाहिए-

 

“रामानुज संप्रदाय के मान्य ग्रन्थ श्रीवचनभूषणम् के भाष्य में भगवान् श्रीराम, श्रीकृष्णादि के मन्त्रों को क्षुद्रफल देने वाला कहा गया है।”

 

इस अंश को प्रस्तुत करते हुए श्रीत्रिपाठी जी लिख रहे हैं कि यह नैयायिक जी का वाक्य उस तरह से प्रस्तुत है जिससे उनको आलोचना करने का अवसर मिल जाए।

आचार्य सियारामदास नैयायिक —

 

भगवन्! आपने मेरे लेख के वाक्य को जिस प्रकार से प्रस्तुत किया है । वह उस प्रकार नहीं है। क्या भेद है? और उससे क्या निकल रहा है? यह मैं आपके और अपने द्वारा प्रस्तुत दोनों वाक्यों को रख रहा हूं–

 

“रामानुज संप्रदाय के मान्य ग्रन्थ श्रीवचनभूषणम् के भाष्य में भगवान् श्रीराम, श्रीकृष्णादि के मन्त्रों को क्षुद्रफल देने वाला कहा गया है।”

-प्रो•कमलाकान्त त्रिपाठी द्वारा उद्धृत वाक्य

 

यहां श्रीत्रिपाठी जी तो मेरे संयोजक चिह्न को ही हटा दिये । जिससे इन्हें कटाक्ष करने का अवसर मिल जाय।

 

मेरे लेख का वाक्य देखें–

 

रामानुज संप्रदाय के मान्य ग्रन्थ श्रीवचनभूषणम् के भाष्य में भगवान् श्रीराम श्रीकृष्णादि के मन्त्रों को क्षुद्रफल देने वाला कहा गया है- 

 

यहां पंक्ति के अन्त में संयोजक चिह्न ‘-‘लगा हुआ है । जो अग्रिम वाक्यों से इसका सम्बन्ध बतला रहा है।

 

और वे निम्नलिखित वाक्य हैं–

 

“श्रीलोकाचार्य जी की दृष्टि में भगवान् श्रीरामकृष्णादि के मन्त्र अर्थ, काम, पुत्र और विद्यादि क्षुद्र फल देने वाला होने से क्षुद्र हैं। देखिए- 

 

 “भगवन्मन्त्रा: क्षुद्रा इत्युच्यन्ते फलद्वारा”

श्रीवचनभूषणम् – 337वां सूत्र 

 

 क्षुद्र फल देने वाले मन्त्रों का नामोल्लेख वरवरमुनि करते हैं – 

 

ऐश्वर्यकामानां गोपालमन्त्रादय:, पुत्रकामानां राममन्त्रादय:-वरवरमुनिकृतभाष्य 

 

ऐश्वर्य की इच्छा वालों के लिए भगवान् गोपाल आदि के मन्त्र हैं और पुत्र की कामना करने वालों के लिए भगवान् श्रीराम आदि के मन्त्र हैं।”

 

इन पूर्वोक्त पंक्तियों से सुस्पष्ट हो रहा है कि श्रीलोकाचार्य और श्रीवरवर मुनि श्रीरामकृष्णादि मन्त्रों को क्षुद्रमन्त्रत्वेन परिगणित कर रहे हैं।

 

कुछ रामानुजीय विद्वान् कह रहे हैं कि श्रीलोकाचार्य जी ने रामकृष्ण आदि मन्त्रों को क्षुद्र नहीं कहा है। मात्र श्रीवरवरमुनि ने कहा है।

 

इसका भी उत्तर सुनें–

 

श्रीवचनभूषणम् का भाष्य श्रीवरवरमुनि द्वारा प्रणीत है। जो श्रीरामानुज संप्रदाय में प्रतिष्ठित है। 

 

भाष्य उसे कहते हैं जिसमें सूत्रानुसारी पदों से सूत्रार्थ वर्णित हो – 

 

“सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र, पदैः सुत्रानुसारिभिः। 

स्वपदानि च वर्ण्यन्ते, भाष्यं भाष्यविदो विदु:।।” 

 

 श्रीलोकाचार्य जी ने” भगवन्मन्त्रा: क्षुद्रा इत्युच्यन्ते फलद्वारा- श्रीवचनभूषणम्, सदाचार्यवैभवप्रकरणम्- सूत्र-337 से फल द्वारा भगवन्मन्त्रों को क्षुद्र कहा । 

 

और उसका भाष्य है-

-“-मन्त्रा: क्षुद्रा इत्युच्यन्ते इति- अर्थकामपुत्रविद्यादिक्षुद्रफलप्रदत्वद्वारेत्यर्थ: ।।

और आगे चलकर श्रीवरवरमुनि भाष्य में लिखते हैं- 

ऐश्वर्य कामानां गोपालमन्त्रादय:, पुत्रकामानां राममन्त्रादय–” 

 

अब आप बतलायें कि ‌श्रीवरवरमुनि ने भगवन्मन्त्रों में “अर्थकामपुत्रविद्यादिक्षुद्रफलप्रदत्वद्वारेत्यर्थ” इस भाष्य से जो क्षुद्रता दिखलायी है । और 

पुन: 

 

 ऐश्वर्यकामानां गोपालमन्त्रादय:, पुत्रकामानां राममन्त्रादय–”  इस भाष्य से जो लिख रहे हैं। यह भाष्य श्रीवचनभूषणकार के सूत्रानुसार है या नहीं??

 

यदि कहें कि “है” तो भाष्य के सूत्रानुसारी होने से ऐश्वर्यकाम के लिए गोपाल मन्त्र एवं पुत्रकाम के लिए राम मन्त्र श्रीलोकाचार्य को भी अभिमत है – 

यह सिद्ध हो गया। 

 

यदि कहें कि उक्त भाष्य श्रीवचनभूषणकार के उक्त सूत्रानुसार नहीं है। तब तो उसकी भाष्य संज्ञा से ही हाथ धोना पड़ेगा; क्योंकि भाष्य का लक्षण है–

 

“सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र, पदैः सुत्रानुसारिभिः। 

स्वपदानि च वर्ण्यन्ते, भाष्यं भाष्यविदो विदु:।।”

 

अत: राम कृष्णादिमन्त्रों की निन्दा श्रीवचनभूषणकार श्रीलोकाचार्य जी को भी अभिमत है– यह सिद्ध हो रहा है। जिसे भाष्य रूप में श्रीवरवरमुनि ने दर्शाया है।

 

विचारणीय है कि श्रीलोकाचार्य जी द्वारा प्रस्तुत “भगवन्मन्त्रा: क्षुद्रा इत्युच्यन्ते फलद्वारा”

श्रीवचनभूषणम् – 337वां सूत्र 

 

इस सूत्र में घटकतया प्रविष्ट “भगवन्मन्त्रा:” पद से जिन भगवन्मन्त्रों का निर्देश किया जा रहा है। क्या उनमें श्रीरामकृष्णादि मन्त्र ही आते हैं ?नारायण मन्त्र नहीं आता है? क्या नारायण मन्त्र भगवन्मन्त्र नहीं है? 

 

यदि है, तो श्रीवरवरमुनि ने जिस प्रकार क्षुद्रफलप्रदत्वेन श्रीरामकृष्णादि मन्त्रों का नाम लिया । उस प्रकार नारायण मन्त्र का नाम क्यों नहीं लिया ??

 

ऐश्वर्यकामानां गोपालमन्त्रादय:, पुत्रकामानां राममन्त्रादय:–सदाचारवैभवप्रकरण,340वें सूत्र का

श्रीवरवरमुनिकृतभाष्य । 

 

इन आपत्तियों का समाधान विद्वज्जनों से 

अपेक्षित है।

क्रमशः–

 

–#आचार्यसियारामदासनैयायिक वैष्णवाचार्य श्रीरामानन्द पीठ, रघुनाथ मन्दिर माउंट आबू 

सिरोही राजस्थान

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