श्रीरामकृष्णादिमन्त्रों के निन्दापरक श्रीवचनभूषणकार के कथन की समीक्षा

श्रीरामकृष्णादिमन्त्रों के निन्दापरक श्रीवचनभूषणकार के कथन की समीक्षा

श्रीमज्जगद्गुरवे रामानन्दाचार्याय नम:

रामानुज संप्रदाय के मान्य ग्रन्थ श्रीवचनभूषणम् के भाष्य में भगवान् श्रीराम श्रीकृष्णादि के मन्त्रों को क्षुद्रफल देने वाला कहा गया है-

रामानुज संप्रदाय के मान्य श्रीलोकाचार्य जी ने अपने श्रीवचनभूषण में भगवान् राम, भगवान् कृष्ण आदि के मन्त्रों को प्रदान करने वाले महापुरुष साक्षात् आचार्य नहीं हो सकते – ऐसा कहा है; क्योंकि उनकी दृष्टि में साक्षात् आचार्य तो मात्र नारायण मन्त्र के उपदेष्टा ही होते हैं –

“साक्षादाचार्य इत्युच्यते संसारनिवर्तकस्य महाश्रीमन्त्रस्योपदेष्टा।।”

-श्रीवचनभूषणम्- सदाचार्यवैभवप्रकरण 335 वां सूत्र

महाश्रीमन्त्र से अष्टाक्षर नारायण मन्त्र, द्वयमन्त्र और चरम मन्त्र अभीष्ट है – ऐसा श्रीवचनभूषणम् के भाष्यकार श्रीवरवरमुनि अपने भाष्य में प्रतिपादित किये हैं ।अस्तु ।

अन्य जो भगवान् श्रीराम भगवान् श्रीकृष्णादि के मन्त्र हैं । उनके उपदेश करने वाले आचार्य क्यों नहीं हो सकते? -इसका उत्तर स्वयं श्रीलोकाचार्य जी देते हुए कहते हैं –

“ संसारवर्द्धकानां क्षुद्राणां भगवन् मन्त्राणामुपदेशष्टृणामाचार्यत्वपूर्तिर्नास्ति।।
-श्रीवचनभूषणम्-336वां सूत्र

श्रीलोकाचार्य जी कहते हैं कि भगवान् श्रीराम और भगवान् श्रीकृष्णादि के मन्त्र संसारवर्धक और क्षुद्रफल देने वाले हैं। इसलिए इनके मन्त्रों का उपदेश करने वाले जो भी लोग हैं । उनमें आचार्यत्व की पूर्ति नहीं है । अर्थात् वे पूर्ण आचार्य नहीं हैं ।

श्रीलोकाचार्य जी की दृष्टि में भगवान् श्रीरामकृष्णादि के मन्त्र अर्थ, काम, पुत्र और विद्यादि क्षुद्र फल देने वाला होने से क्षुद्र हैं। देखिए-

“भगवन्मन्त्रा: क्षुद्रा इत्युच्यन्ते फलद्वारा”
श्रीवचनभूषणम् – 337वां सूत्र

क्षुद्र फल देने वाले मन्त्रों का नामोल्लेख वरवरमुनि करते हैं –

ऐश्वर्यकामानां गोपालमन्त्रादय:, पुत्रकामानां राममन्त्रादय:-वरवरमुनिकृतभाष्य

ऐश्वर्य की इच्छा वालों के लिए भगवान् गोपाल आदि के मन्त्र हैं और पुत्र की कामना करने वालों के लिए भगवान् श्रीराम आदि के मन्त्र हैं।

अब ये श्रीरामकृष्णादि के मन्त्र संसारवर्धक कैसे हैं- इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए श्रीलोकाचार्य जी

एक सूत्र बनाकर लिख रहे हैं –

“ संसारवर्द्धका इत्यपि तेन’
-श्रीवचनभूषणम्-338वां सूत्र

ऐश्वर्य पुत्र विद्यादि क्षुद्र फल संसार को बढ़ाने वाले हैं । अत: उन फलों को देने वाले भगवान् श्रीराम, भगवान् श्रीकृष्णादि के मन्त्र संसारवर्धक हैं ।

अब श्रीलोकाचार्य जी की दृष्टि में संसारवर्धक क्षुद्र फलों को देने वाले श्रीरामकृष्णादि के मन्त्रों के उपदेष्टा श्रीरामानन्दाचार्य,श्रीनिम्बार्काचार्य, श्रीबल्लभाचार्य आदि जगद्गुरुरूपेण प्रसिद्ध महापुरुष साक्षात् आचार्य नहीं हो सकते । इन महानुभावों में आचार्यत्व पूर्णतया विद्यामान नहीं है ।

वह तो केवल अष्टाक्षर नारायण मंत्र के उपदेशकों में ही है । – ऐसा रामानुजीय आचार्य श्रीलोकाचार्य जी का मानना है । और यह श्रीवचनभूषण श्रीरामानुज संप्रदाय का उत्कृष्ट ग्रंथ माना जाता है।

श्रीलोकाचार्य जी पुन: कहते हैं कि भगवान् के मन्त्रों में क्षुद्रफलप्रदत्व औपाधिक है –

“इदं चौपाधिकम्”
श्रीवचनभूषणम्-339वां सूत्र

भगवान् श्रीरामकृष्णादि के मन्त्रों में क्षुद्रफलप्रदत्व औपाधिक हैं। अर्थात् स्वाभाविक नहीं।

औपाधिक क्यों है? इस पर कहते हैं –

“चेतनानां रुच्यागतत्वात्”

श्रीवचनभूषणम्– 340वां सूत्र

तात्पर्य यह कि यद्यपि भगवान श्रीरामकृष्णादि के मन्त्र मोक्ष रूपी फल देने में समर्थ हैं ।

तथापि माया के अधीन जीवों की ऐश्वर्य, पुत्रादि क्षुद्र फलों में रुचि होने से ये मन्त्र उन्हें क्षुद्र फल देते हैं।

इसीलिए श्रीरामकृष्णादि मन्त्रों को संसारवर्धक क्षुद्र मन्त्र कहा गया।

आपत्ति –

जब सभी भगवन्मन्त्र मोक्षफलप्रद हैं और उनमें चेतनों की मोक्षव्यतिरिक्त क्षुद्र फलों में रुचि से क्षुद्रत्व आया तो यहाँ नारायण मन्त्र का नाम वरवरमुनि ने क्यों नहीं लिया ?

क्या नारायण मन्त्र से ऐश्वर्यादि ऐहलौकिक फल प्राप्त नहीं हो सकता ? यदि आप कहें कि नारायण मन्त्र मात्र मोक्ष फल देता है, लौकिक नहीं, तो इनका यह कथन “ऐहलौकिकमैश्वर्यमित्यादिप्रकारेणाखिलफलप्रदत्वेपि” इस भाष्य वचन से विरुद्ध हो जायेगा । और यदि कहें कि नारायण मन्त्र भी लौकिक फल देता है किन्तु उसका मुख्य प्रयोजन मोक्ष ही है । इसलिए क्षुद्र मन्त्रों में उसकी गणना नहीं की गयी । तो इसका निराकरणात्मक उत्तर सुनें—

निराकरण-

हाँ श्रीमन् ! ठीक इसी प्रकार भगवान् श्रीराम, भगवान् श्रीकृष्ण के मन्त्रों का भी मुख्य प्रयोजन मोक्ष ही है, लौकिक फल नहीं । इसका निरूपण हम सप्रमाण आगे इसी लेख में करेंगे । तो वे आपके द्वारा क्षुद्र क्यों कहे गए ? जब जीव की रुचि के अनुसार ही भगवन्मन्त्रों में क्षुद्रत्व आता है । तब लौकिकफल देने में समर्थ नारायण मन्त्र की भी गणना क्षुद्र मन्त्रों में वरवरमुनि को करनी चाहिए थी, न कि केवल श्रीरामकृष्णादि के मन्त्रों की ।

श्रीलोकाचार्य जी स्वयं नारायण मन्त्र को ऐश्वर्यादि अपेक्षित फलों को को देने वाले कह रहे हैं-

—सर्वापेक्षितप्रदो भवति।।-मुमुक्षुप्पडि-१/१८,

ऐश्वर्यकैवल्यभगवल्लाभकामेभ्यस्तान् ददाति- मुमुक्षुप्पडि।१/१९

अत: क्षुद्रफलप्रदत्व हेतु से–

“नारायणमन्त्र: क्षुद्र: पुत्रादिक्षुद्रफलप्रदत्वात् ( भवदुक्त) श्रीरामकृष्णादिमन्त्रवत्”

नारायणमन्त्र में भी क्षुद्रफलप्रदत्व होने से रामकृष्णादिमन्त्रवत् इसे भी क्षुद्र कहना चाहिए था। किन्तु ऐसा न कहकर केवल रामकृष्णादि मन्त्रों की निन्दा उनके किस भाव को व्यक्त करती है??

दूसरी बात यह है कि नारायण मन्त्र में उक्त हेतु से क्षुद्रता आ जाने पर रामानुजीय आचार्यों में भी आचार्यत्वपूर्ति नहीं हो सकती ।

और जिस हेतु से रामकृष्णादि मन्त्रों में क्षुद्रत्व का कथन श्रीवरवरमुनि ने नामोल्लेखपूर्वक किया है। उसका विध्वंसक सत्प्रतिपक्षानुमान वाक्य प्रस्तुत है-

श्रीरामकृष्णादिमन्त्रा: न क्षुद्रा: मोक्षफलजनकत्वात् ( भवदुक्त)नारायणमन्त्रवत् ।

श्रीरामकृष्णादि के मन्त्र क्षुद्र नहीं हैं, मोक्ष फल जनक होने से, नारायणमन्त्र के समान ।

उक्त विवेचन द्वारा यह सिद्ध होता है कि भगवान के अन्य मन्त्रों के प्रति श्रुवरवरमुनि आदि का कितना विद्वेष था!!!

यदि कहा जाए कि नारायण मन्त्र मोक्षफलप्रदत्वेन ही रामानुज संप्रदाय में उपदिष्ट है । तो उक्त आचार्यो को यह भी समझना चाहिए कि श्रीरामकृष्णादि मन्त्र भी तत्तत् संप्रदायों में मोक्षप्रदत्वेन ही समुपदिष्ट हैं।

श्रीरामषडक्षर मन्त्रराज में मोक्षजनकता—

भगवान् श्रीराम का षडक्षर मन्त्र जिसे मन्त्रराज भी कहा जाता है। उसे संसार का विशेष निवर्तक कहा गया है –

“ रामो ङेंSन्तो वह्निपूर्वो नमोSन्त: स्यात् षडक्षर:।

तारको मन्त्रराजोSयं संसार विनिवर्तक: ।

– श्रीनारदपंचरात्र,

श्रीअग्रदास जी महाराज ने नारद पांचरात्रादि का उद्घोष करते हुए श्रीराममन्त्रराज को संसार का विनिवर्तक कहा है। और एक एक पद के अर्थ का विस्तारपूर्वक विवेचन भी किया है ।

श्रीविद्यारण्य स्वामी जी जो एक सन्न्यासी जगद्गुरु थे । उन्होंने भी सारसंग्रह ग्रन्थ का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए राममन्त्र को वैष्णव मन्त्रों में सर्वश्रेष्ठ और मोक्षप्रद कहा है-

वैष्णवेश्वपि मन्त्रेषु राममन्त्र: फलाधिक:।

गणपत्त्यादि मन्त्रेषु कोटिकोटिगुणाधिक: ।।

यह मन्त्र शान्त, प्रसन्न, वरदायक और भक्तवत्सल है । इसके समान जगत् में दूसरा मन्त्र नहीं है।

सकाम प्राणियों को यह मन्त्र विविध भोगों और निष्काम महानुभावों को मुक्ति रूपी फल देता है –

मन्त्रराजसमो मन्त्रो जगत्स्वपि न विद्यते ।

सकामानां भुक्तिदोयं निष्कामानां च मुक्तिद: ।।

जो भोग और मोक्ष दोनों चाहते हैं । उन्हें यह मन्त्र दोनों प्रकार के फल देता है-

नृणामुभयकामानां भक्तिमुक्तिप्रदायक:।

⁃ श्रीविद्यार्णवतन्त्र-२८वां श्वास,पृष्ठ-२प्र

वृहन्नारदीयपुराण के पूर्वखण्ड के पांचवें अध्याय में भगवान श्रीराम के मन्त्र सिद्धिदायक और संसारसागर से पार उतारने वाले कहे गए हैं-

” अथ रामस्यमनवो वक्ष्यन्ते सिद्धिदायका:।

येषामाराधनान्मर्त्यास्तरन्ति भवसागरम्।।”-१

इस प्रकार अनेक सिद्धियों को देने वाले मन्त्रों को भवसागर से पार उतारने वाला कहकर सनत्कुमार जी संसार से मुक्ति ही राम मन्त्र का मुख्य फल बतला रहे हैं । इसलिए मुख्य फल मोक्ष में श्रीरामकृष्णादि के मन्त्रों का तात्पर्य होने से उनके प्रति क्षुद्रता का कथन वरवर मुनि आदि की क्षुद्र मानसिकता का ही परिचायक है।

रामोत्तरतापिन्युपनिषद् में बताया गया है कि काशी में प्राण त्याग के समय भगवान् भव जीवों को तारकब्रह्म राम मन्त्र का उपदेश करते हैं। जिससे वह मोक्ष फल को प्राप्त करता है-

“अत्र हि जन्तो: प्राणेषूत्क्रममाणेषु रुद्रस्तारकं ब्रह्म व्याचष्टे।
येनासावमृती भूत्वा मोक्षीभवति’।।-।१।

इस प्रकार श्रुतिप्रभृति ग्रंथों में श्रीराम मन्त्र की अमित महिमा दिख रही है। यही स्थिति गोपालमन्त्र की भी है।

विस्तारभय से यहां नहीं दिखलाया जा रहा है ।

रामरहस्योपनिषद् में श्रीहनुमान जी महाराज ने राममन्त्र को ऐहिकफलों की प्राप्ति के लिए विनियोग करने का निषेध किया है। यदि साधक को ऐहिक फल की इच्छा हो तो उसे मुझ मारुति का स्मरण करना चाहिए-

नैव योज्यो राममन्त्र: केवलं मोक्षसाधक:।

ऐहिके समनुप्राप्ते मां स्मरेद्ररामसेवकम्।।

रामरहस्योपनिषद्-४/११

जो मन्त्रराज का जप करते हुए भक्तिपूर्वक श्रीराम का स्मरण करते हैं। उन्हें अभीष्ट फल देने की मैंने दीक्षा ले रखी है-

यो रामं स्मरेन्नित्यं भक्त्या मनुपरायण:।

तस्याहमिष्टसंसिद्ध्यै दीक्षितोस्मि मुनीश्वरा:।।

-रामरहस्योपनिषद्-४/१२

जो राघव के भक्त हैं। उनके मनोवांछित फल देने हेतु रामकार्य में धुरन्धर मैं हनुमान् सदा जागरुक रहता हूँ

वाञ्छितार्थं प्रदास्यामि भक्तानां राघवस्य तु।

सर्वथा जागरूक़ोस्मि रामकार्यधुरन्धर।।

-रामरहस्योपनिषद्-४/१३

इसी प्रकार भगवान् श्रीरामकृष्णादि के मन्त्रों का मुख्य फल मोक्ष ही है, क्षुद्र फल ऐश्वर्यदि नहीं ।

लोकाचार्यकृत आचार्य लक्षण में दोष-

लोकाचार्य जी का “साक्षादाचार्य इत्युच्यते संसारनिवर्तकस्य महाश्रीमन्त्रस्योपदेष्टा।”

(श्रीवचनभूषणम्- सदाचार्यवैभवप्रकरण,335 सूत्र)

वचन सदोष है; क्योंकि बालक ध्रुव को द्वादशाक्षर वासुदेव मन्त्र के उपदेष्टा देवर्षि नारद में यह लक्षण नहीं जा रहा है। जो कि द्वादश महाभागवतों के मध्य परिगणित भक्तिसूत्रों के रचयिता महान् आचार्य हैं।

मुमुक्षुप्पडि में तो लोकाचार्य जी ने यहां तक कह दिया कि वासुदेव और विष्णु मन्त्र भी अशिष्टों द्वारा परिगृहीत हैं–

” अन्ययोरशिष्टपरिग्रहोSपूर्तिश्चास्ति।।

-मुमुक्षुप्पडि-१/१२,

वासुदेव मन्त्र देवर्षि नारद ने भक्तप्रवर ध्रुव को दिया । तो इस मन्त्र के गृहीता ध्रुव जी लोकाचार्य जी की दृष्टि में अशिष्ट हैं। और उस मन्त्र के उपदेष्टा देवर्षि नारद आचार्य नहीं। धन्य हैं रामानुजीय आचार्य!!!

श्रीनिम्बार्काचार्य, श्रीरामानन्दाचार्य, श्रीबल्लभाचार्य आदि में भी यह लोकाचार्यकृत आचार्य का लक्षण नहीं जा रहा है। जबकि ये सब जगद्गुरुत्वेनाभिमत आचार्य हैं । और इनके अनुयायियों में अनेकानेक सिद्ध महापुरुष हो चुके हैं ।

चूंकि मोक्षप्रद मन्त्रदाता आचार्य ही साक्षात् आचार्य हैं।

इसलिए “संसारनिवर्तकमन्त्रोपदेष्ट्रित्वं साक्षादाचार्यत्वम्’ जैसा लक्षण करना चाहिए। जो संसारनिवर्तक श्रीरामकृष्णादि सभी मन्त्रों के उपदेष्टा महापुरुषों में चला जायेगा।

निष्कर्ष यह है कि लोकाचार्य जी या वरवरमुनि जो भी आचार्य हैं। इन्हें अपनी उपासना के अनुरूप प्रतिपादन तो करना चाहिए था। किन्तु श्रीरामकृष्णादि मन्त्रों को फलमुखेन तुच्छ नहीं कहना चाहिए था; क्योंकि वही दोष इनके नारायण मन्त्र पर भी प्रसक्त हो रहा है । जो पूर्व में प्रदर्शित किया जा चुका है ।

यदि कोई कहे कि “नहि निन्दा निन्दितु प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम्” न्यायानुसार हमारे आचार्यों ने जो राम कृष्णादि के मन्त्रों को क्षुद्रफलप्रद कहा। वह उनकी निन्दा के लिए नहीं,अपितु नारायण मन्त्र की प्रशंसा के लिए कहा है। तो इसका उत्तर यह है कि उस न्याय का अवलंबन ऐसे स्थलों में लिया जाता है। जहाँ समप्रमाण वचनों से विहित कार्यों की प्रशंसा में विरोधी वचन प्रस्तुत होते हैं । जैसे प्रात: होम की स्तुति में सायं होम की निन्दा और सायं होम की स्तुति में प्रात: होम की निन्दा। अनार्ष व्यक्तियों के वचनों में उक्त न्याय प्रवृत्त नहीं होता ।

-#आचार्यसियारामदासनैयायिक वैष्णवाचार्य

श्रीरामानन्दपीठ, रघुनाथ मंदिर माउंट आबू , राजस्थान

One Reply to “श्रीरामकृष्णादिमन्त्रों के निन्दापरक श्रीवचनभूषणकार के कथन की समीक्षा”

  1. इस लेख के निराकरण में निकले कमलाकांत त्रिपाठी जी के लेख का खण्डन क्रमश: प्रस्तुत होगा। जय श्रीराम

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