व्यासासन ब्रह्मासन अर्थात् ब्राह्मण का आसन है, शूद्रों का नहीं, सूत ,व्यास, वाल्मीकि ब्राह्मण हैं ।

व्यासासन ब्रह्मासन अर्थात् ब्राह्मण का आसन है, शूद्रों का नहीं, सूत ,व्यास, वाल्मीकि ब्राह्मण हैं ।

Vyasasan Brahmasan Arthat Brahmano ka Aasan Hai, Shudron Ka Nahi, Sut,Vyas, Valmiki Brahman Hain Shudr Nah,

सूत जी शूद्र नहीं अपितु ब्राह्मण थे; क्योंकि सूत जी के वध से बलराम जी को ब्रह्म हत्या लगी और उन्होंने उसका प्रायश्चित किया । शूद्र के वध से ब्रह्महत्या नहीं लगती है ।

 इस तथ्य की चर्चा श्रीमद्वाल्मीकि रामायण में श्रवण कुमार ने महाराज दशरथ से की है । जब महाराज दशरथ ने अपने शब्द भेदी बाण द्वारा श्रवण कुमार को बीध दिया और उनके समय पहुंचे तो दशरथ जी के हृदय में बड़ा कष्ट हो रहा था।

उस समय श्रवण कुमार ने उनसे कहा कि हे राजन् ! आपके हृदय में जो यह संताप है कि मुझसे ब्रह्महत्या हुई है। इस बात को हृदय से निकाल दीजिए; क्योंकि मैं ब्राह्मण नहीं अपितु शूद्र हूं–

“ब्रह्महत्याकृतं पापं हृदयादपनीयताम्।

न द्विजातिरहं राजन् मां भूत्ते मनसो व्यथा ।।”

– वाल्मीकि रामायण अयोध्याकाण्ड-63/50

यदि सूत जी शुद्र होते तो उनके वध से श्रीबलराम जी को ब्रह्महत्या क्यों लगती ? सूत जी के वध से लगी ब्रह्महत्या को दूर करने के लिए ऋषियों ने श्रीबलराम जी को ब्रह्महत्या का प्रायश्चित करने को कहा था–

“यद्येतद् ब्रह्महत्याया: पावनं लोकपावन।

चरिष्यसि भवांल्लोकसंग्रहोSनन्यचोदित: ।।”

—भागवत महापुराण -10/78/32

इसलिए श्रवण कुमार के वचनों को ध्यान में रखते हुए सूतवध से लगी ब्रह्म हत्या के कारण सूत जी को ब्राह्मण मानना पड़ेगा; क्योंकि ब्रह्महत्या ब्राह्मण के वध से ही लग सकती है, शूद्र के वध से नहीं।

सूत की उत्पत्ति महाराज पृथु के यज्ञ में अग्निकुंड की अग्नि से हुई है । और वेदों में अग्नि को ब्राह्मण कहा गया है –” अग्निर्वै ब्राह्मण:”।

इसलिए अग्नि से उत्पन्न होने के कारण सूत जी ब्राह्मण हैं। अत एव ब्राह्मण सूत के वध से बलराम जी को ब्रह्महत्या लगी और उन्होंने ब्रह्महत्या का प्रायश्चित भी किया ।

इससे सिद्ध हुआ कि सूत जी ब्राह्मण ही हैं, शूद्र नहीं। 

श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना करने वाले भगवान् व्यास ने अपने को ब्रह्मवादी ब्राह्मण कहा है। जिस समय महाराज युधिष्ठिर का यज्ञ आरंभ हुआ । उस समय उन्होंने ब्रह्मवादी ब्राह्मणों का ऋत्विक् रूपमें वरण किया—

इत्युक्त्वा यज्ञिये काले वव्रे युक्तान् स ऋत्विज: ।

कृष्णानुमोदित: पार्थो ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिन: ।।

भागवत महापुराण -10/74/6

 और उन ब्रह्मवादी ब्राह्मणों में भगवान् व्यास का नाम सबसे पहले आता है–

द्वैपायनो भरद्वाज: समन्तुर्गौतमोSसित: ।।

—भागवत महापुराण — 10/74/7

इस प्रकार जब भगवान् व्यास स्वयं को भागवत महापुराण में ब्राह्मण लिख रहे हैं तो उन्हें शूद्र कहना या समझना भागवत शास्त्र का घोर अपमान और महाप्रज्ञापराध है। 

महर्षि वाल्मीकि भी ब्राह्मण हैं, शूद्र नहीं; क्योंकि भगवान कृष्ण द्वैपायन व्यास उन्हें स्कंद महापुराण भविष्य महापुराण आदि ग्रन्थों में ब्राह्मण लिखते हैं ।स्वयं महर्षि वाल्मीकि भरी सभा में अपने को प्रचेता का दसवां पुत्र कहते हैं—

” प्रचेतसोSहं दशम: पुत्रो राघवनन्दन ।”

– वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड- 

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में वर्णन है कि जब महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पर ब्रह्मा जी पधारते हैं तब उन्होंने वाल्मीकि जी के लिए ब्राह्मणबोधक ब्रह्मन् शब्द का प्रयोग किया है–

” मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती” ।

वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड-2/31

इसलिए भगवान् व्यास, महर्षि वाल्मीकि और ब्रह्मा जी के वचनों के आधार पर रामायणकार महर्षि वाल्मीकि ब्राह्मण ही हैं, शूद्र नहीं।

अब रामायणकार महर्षि वाल्मीकि को शूद्र वाल्मीकि समझने का भ्रामक प्रचार प्रसार कैसे हुआ– इस पर हम चर्चा कर रहे हैं । 

जैमिनीयाश्वमेध पर्व में वर्णन आया है कि महाराज युधिष्ठिर के यज्ञ में श्वपच वाल्मीकि पधारे थे । जो बहुत बड़े भक्त थे । जिनके भोजन करने पर महाराज युधिष्ठिर जी का यज्ञ पूर्ण हुआ था ।

इन्हीं श्वपच वाल्मीकि और रामायणकार महर्षि वाल्मीकि के नाम में समानता के कारण लोगों ने रामायणाकार महर्षि वाल्मीकि और श्वपच वाल्मीकि को एक समझ लिया ।

फलत: भागवतमहापुराण आदि महान ग्रन्थों के प्रणेता भगवान व्यास के वचनानुसार सूत जी तथा वाल्मीकि जी ब्राह्मण सिद्ध होते हैं । और भगवान व्यास स्वयं अपनी लेखनी से अपने को ब्राह्मण लिख रहे हैं । इन सभी तथ्यों से अनभिज्ञ आजकल के छद्म कथावाचक तथा मूढ़ जन सूत, व्यास एवं वाल्मीकि जी को शूद्र समझने का महान अपराध कर रहे हैं ।

जय श्रीराम 

-#आचार्यसियारामदासनैयायिक

 

 

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