स्वसम्प्रदायाचार्यविषयकभ्रमभूधरभंग
- भ्रमभूधरभंगकर्ता- आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य
श्रीलोकाचार्य जी ने साक्षात् आचार्य को परिभाषित करने के लिए यह सूत्र लिखा है-
‘साक्षादाचार्य इत्युच्यते संसारनिवर्तकस्य महा- श्रीमन्त्रस्योपदेष्टा’। (सदाचारवैभवप्रकरण-335)
यहाँ पर यह ध्येय है कि केवल महाश्रीमन्त्र का उपदेश दे देने मात्र से कोई आचार्य नहीं हो जायेगा। अधीतसनियमार्थावगमनावसानवेद, एषणात्रयविनिर्मुक्त अर्थात् त्यक्तकाम्यधर्मानुष्ठान, परिगृहीतधर्मशास्त्रोक्तसकलाचार आदि भी रहे।
– पीताम्बरामृत-पृष्ठ-23, प्रो•कमलाकान्त त्रिपाठी
समीक्षा––
आचार्य सियारामदास नैयायिक —
विद्वद्वर! आपके कथनानुसार “केवल महाश्रीमन्त्र का उपदेश दे देने मात्र से कोई आचार्य नहीं हो जायेगा। अधीतसनियमार्थावगमनावसानवेद, एषणात्रयविनिर्मुक्त अर्थात् त्यक्तकाम्यधर्मानुष्ठान, परिगृहीतधर्मशास्त्रोक्तसकलाचार आदि भी रहे।”
इससे यह फलित हुआ कि —
“अधीतसनियमार्थावगमनावसानवेदत्वविशिष्टैषणात्रविनिर्मुक्तत्वविशिष्टपरिगृहीतधर्मशास्त्रोक्तसकलाचारत्वविशिष्टमहाश्रीमन्त्रोपदेष्टृत्वं साक्षादाचार्यत्वम्” ।
वैशिष्ट्यञ्च सामानाधिकरण्यरूपम्।
आप इस लक्षण से प्रतिग्रहादिलिप्त लोगों के आचार्यत्व का निराकरण करना चाह रहे हैं । जिससे आचार्यत्व का लक्षण अधीतसनियमार्थावगमनावसानवेदादि से भिन्न केवल महाश्रीमन्त्र का उपदेश करने वालों में अतिव्याप्त न हो। उचित है ।
किन्तु लक्षण वही होता है जो अव्याप्ति, अतिव्याप्ति और असम्भव रूप दोषत्रय से शून्य हो–
” अव्याप्त्यत्यतिव्याप्त्यसम्भवरूपदोषत्रशून्यत्वं
लक्षणत्वम्।
श्रीशठकोप स्वामी में लक्षण की अव्याप्ति
किन्तु विद्वद्वर! आपके द्वारा किया गया लक्षण अव्याप्ति दोष से ग्रस्त है; क्योंकि उक्त लक्षण
आपके पूर्वाचार्य चतुर्थ वर्णोत्पन्न श्रीशठकोप
स्वामी जी जैसे परमाचार्य में नहीं जा रहा है।
जबकि श्रीरामानुज संप्रदाय में वे सर्वमान्य
आचार्य हैं। उनसे श्रीनाथमुनि जी को तत्वत्रय तथा रहस्यत्रय सम्यक्तया प्राप्त हुआ था–
कारिसूनुः कृपासिन्धुर्बभूव शठजिन्महान् ॥
आस्तिको धर्मशीलश्च शीलवान्वैष्णवः शुचिः ॥ ४६ ॥ गम्भीरश्चतुरो धीरः शिष्य इत्यभिधीयते ॥
इत्यादिगुणयुक्ताय धीमते नाथयोगिने ॥ ४७ ॥
जगाद निखिलानर्थान्यथा वागशरीरिणी ॥ सहस्रगीतिप्रमुखान्प्रबंधाञ्छठजित्तदा ॥ ४८ ॥
दिव्यं चक्षुर्यथा कृष्णः पार्थाय कृपया ददौ ॥
तथैव नाथसुनये दिव्यनेत्रं प्रदाय च ॥ ४९ ॥
तत्त्वत्रयं तथा सम्यग्रहस्यत्रितयं तथा ॥
–प्रपन्नामृत-107वां अध्याय
उक्त लक्षण न जाने का कारण यह कि श्रीशठकोप स्वामी जी पादज अर्थात् चतुर्थ वर्ण हैं–
” पदजकारिगृहेSवतीर्णं
श्रीशास्पदं शठरिपुं शरणं प्रपद्ये।
— प्रपन्नामृत-103/57,
“दिव्यसूरिचरितम्” के चतुर्थ सर्ग का उद्धरण देते हुए अन्य विद्वान् भी इस तथ्य का संकेत करते हुए कहते हैं–
“एवं श्रीरामानुजाचार्यसम्प्रदायेSपि “पल्ली”संज्ञकस्य
शूद्रस्य कुले जात: शठकोप:”
इधर श्रीरामानुजाचार्य जी महाराज ब्रह्मसूत्र के “श्रीभाष्य” में चतुर्थ वर्ण शूद्र के उपनयनादि संस्कार का अभाव सप्रमाण प्रतिपादित कर रहे हैं–
संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ।। १-३-३६ ॥ ब्रह्मविद्योपदेशप्रदेशेषूपनयनसंस्कारः परामृश्यते-
“उप त्या नेष्ये “तं होपनिन्ये इत्यादिषु। शूद्रस्य चोपनयनादिसंस्काराभावोSभिलप्यते-
“न शूद्रे पातकं किञ्चिन्न च संस्कारमर्हति”
चतुर्थो वर्ण एकजातिर्न च संस्कारमर्हतीत्यादिषु ॥३६॥
श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् ।। १ । ३ ॥ ३८ ॥
शूद्रस्य वेदश्रवणतदध्ययनतदर्थानुष्ठानानि प्रतिषिध्यन्ते–“
— श्रीभाष्यम्
जब चतुर्थ वर्ण में समुत्पन्न होने से श्रीशठकोप स्वामी जी का उपनयन संस्कार ही बाधित है। तब उन्हें वेदाध्ययन कैसे प्राप्त होगा?
अत: “अधीतसनियमार्थावगमनावसानवेदत्वविशिष्टैषणात्रविनिर्मुक्तत्वविशिष्टपरिगृहीतधर्मशास्त्रोक्तसकलाचारत्वविशिष्टमहाश्रीमन्त्रोपदेष्टृत्वं साक्षादाचार्यत्वम्”।
रूप लक्षण उनमें न जाने से उक्त लक्षण अव्याप्तिदोष से समाक्रान्त है। अत एव दुष्ट है।
इसलिए इसके आधार पर कहा गया आपका शेष कथन भी धूलिधूसरित हो चुका है।
मान्यवर श्रीत्रिपाठी जी लिखते हैं कि
“माननीय सुहृद्वर्य श्रीनैयायिक जी भी श्रीमहान्त हैं। मठ चलाने के लिए उनको भी कथापुरान-प्रतिग्रह आदि का सहारा लेना ही पड़ता होगा।”
समीक्षा-
आचार्य सियारामदास नैयायिक—
सुहृद्वर्य ! भागवतकथादि से प्रसादस्वरूप धनराशि को प्राप्त करने वाला वक्ता प्रतिग्रही की कोटि में प्रविष्ट नहीं है—
॥ श्रोतुर्दानमनंत्याय वक्तुर्नैव प्रतिग्रहः ॥ ९४ ॥ श्लोकैकश्रवणे यस्य रत्नकोटिर्न निष्क्रिया ॥
सर्वस्य तस्य यो वक्ता प्रतिग्राही कथं हि सः? ९५ ।।
कौशिकसंहिता के छठे अध्याय के उक्त वचन भागवत कथावक्ता को प्रतिग्राही की कोटि से सहेतुक निर्मुक्त बतला रहे हैं। और यही हेतु समग्र भगवत्कथाओं में होने से उसके वक्ता प्रतिग्रही नहीं कहे जा सकते।
आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य
जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य पीठ,
सर्वेश्वर श्रीरघुनाथ मन्दिर माउंट आबू
नक्की लेक, सिरोही, राजस्थान

