बन्धन का कारण और निवारण

आसक्ते: कारणं निवारणञ्च-आचार्य सियारामदास नैयायिक

संसार में जीव उसी समय से आत्मबल खोने लगता है । जब उसकी आसक्ति परमात्मा से भिन्न वस्तुओं में होने लगती है । यह आसक्ति ही सबसे बड़ा बन्धन है । इसे ही राग कहते हैं । आसक्ति का विषय जब उपलब्ध नहीं होता । तब उसे द्वेष दबाता है । ये राग और द्वेष दोनों मोहमूलक हैं । मोह अर्थात् अज्ञान । देह में अहंबुद्धि । जैसे मैं ब्राह्मण हूँ ,क्षत्रिय हूँ , मोटा हूँ, पतला हूँ –इत्यादि । मोह के अनेक रूप हैं । 

इस मोह को दूर करने के लिए हमें किसी सद्गुरु की शरण ग्रहण करनी चाहिए । जो श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ हों । आश्रम चेला चेली में आसक्त व्यक्ति स्वयं मोहग्रस्त है । उससे दूर किसी वैराग्यवान् ज्ञानी की शरण ग्रहण करनी चाहिए ।
उससे वह ज्ञान मिलेगा जो देह में अहंबुद्धि के निरसन में सहायक होगा ।
आत्मतत्त्व का श्रवण करके उसका मनन और निदिध्यासन करना पड़ेगा । तब जाकर देह में आत्मबुद्धि हटेगी । और अपने स्वरूप में दृढ निष्ठा होगी । आत्मा स्वयं सुखरूप है । उसका अनुभव होने के बाद कोई वस्तु ज्ञातव्य नही रहती
। द्वैतभाव का नाश हो जाता है । मुमुक्षु को मठाधीशों का संग कभी नहीं करना चाहिए । मठाधीश आपको अपना मठ दे सकता है पर अपने स्वरूप का बोध नहीं करा सकता ।
साधक को नारी का संग भूलकर भी नहीं करना चाहिए ; क्योंकि वह मोहरूपी वन के लिए वसन्त के समान है और जप तप नियम रूपी जलाश्रय को सोखने के लिए ग्रीष्म ऋतु की भाँति हैं –
सुनु मुनि कह पुरान श्रुति सन्ता । मोह विपिन कहुं नारि वसन्ता ।।
जप तप नेम जलाश्रय झारी । होइ ग्रीषम सोखइ सब नारी ।।
–रामचरितमानस-अरण्यकाण्ड-४४-१-२,
यहाँ नारी की निन्दा नहीं है; क्योंकि इसका तात्पर्य यह भी  है कि अगर कोई साधिका है तो उसके लिए पुरुष भी वैसे ही बन्धनकारक है जैसे साधक के लिए नारी । किन्तु यह बात पति पत्नी, गुरु एवं शिष्या के मध्य मान्य नहीं है ; क्योंकि यहाँ सम्बन्ध परमात्मा से योग का है । किसी प्रकार के भोग का नहीं ।
—जय श्रीराम—
#आचार्यसियारामदासनैयायिक

Gaurav Sharma, Haridwar

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