अध्याय ३७,नागह्रद तीर्थ का माहात्म्य

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले– 

 ॥ नागह्नदं ततो गच्छेत्तीर्थंं पापप्रणाशनम् ॥

 यत्र नागैस्तपस्तप्तं रम्ये पर्वतरोधसि ॥ १ ॥

हे राजन्! तत्पश्चात् संपूर्ण पापों का विध्वंस करने वाले नागह्रद तीर्थ को प्राणी जाए । जहां आबू पर्वत के समीप जलह्रद के तट पर नागों ने अत्यंत उत्कृष्ट तब किया था।।१।।

 कद्रूशापं पुरा श्रुत्वा नागाः सर्वे भयातुराः ॥ पप्रच्छुर्नागराजानं शेषं प्रणतकन्धराः ॥ २ ॥

पूर्व काल में माता कद्रू के शाप को सुनकर संपूर्ण नाग भय से व्याकुल हो गए और उन्होंने नतमस्तक होकर नागराज भगवान् शेष से पूछा।।२।।

 मातृशापेन संतप्ता वयं पन्नगसत्तम ॥

 किं कुर्मः क च गच्छामः शापमोक्षो भवेत्कथम् ॥ ३ ॥

है नागराज! हम लोग माता के शाप से अत्यंत संतप्त हैं। हम क्या करें ? कहां जाएं ?और माता के शाप से हम लोगों का मोक्ष कैसे होगा? ।।३।।

 ॥ शेष उवाच ॥

भगवान् शेष बोले–

 ॥ प्रसादिता मया माता शापमुक्तिकृते पूरा ॥ तयोक्तं ये तपोयुक्ता धर्मात्मानः सुसंयताः ॥ ४ ॥

पूर्व काल में मैंने माता कद्रू को प्रसन्न किया और शाप से मुक्ति के लिए उनसे पूछा तो उन्होंने कहा की जो धर्मात्मा एकाग्रचित होकर तप करेंगे।।४।।

 न दहिष्यति तान्वह्निर्यज्ञे पारिक्षितस्य हि ॥ तस्माङ्गत्वार्बुदं नाम पर्वतं धरणीतले ॥ ५ ॥

उन्हें महाराज परीक्षित के यज्ञ में अग्नि देव जलाएंगे नहीं । इसलिए आप लोग पृथ्वी पर अर्बुद ( आबू) नामक पर्वत पर।।५।।

 तत्र यूयं तपोयुक्ता भवध्वं सुसमाहिताः ॥

 यत्रास्ते सा स्वयं देवी चंडिका कामरूपिणी ॥ ६ ॥

एकाग्रचित होकर के तप में लग जांए।जहां पर अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाली भगवती चण्डी विराजमान हैं।।६।।

 यस्याः संकीर्त्तनेनापि नश्यन्ति विपदो ध्रुवम् ॥ आराधयध्वमनिशं तां देवीं मम वाक्यतः ॥ ७ ॥

जिनके नाम का संकीर्तन करने से भी विपत्तियां निश्चित ही नष्ट हो जाती हैं। मेरे आदेश से तुम सब 

अहर्निश उन भगवती चण्डी की आराधना करो।।७।।

 तस्याः प्रसादतः सर्वे भविष्यथ गतज्वराः ॥ एतमेवात्र पश्यामि ह्युपायं नागसत्तमाः ॥

 देवो वा मानुषो वाऽपि नान्यो वो मुक्तिकारक: ।।८।।

उन भगवती के अनुग्रह से तुम सब कष्ट से रहित हो जाओगे। हे श्रेष्ठ नागों! यही उपाय मैं तुम सबके लिए देख रही हूं ।इसके अतिरिक्त कोई मनुष्य या देवता तुम लोगों को शाप से मुक्ति दिलाने में समर्थ नहीं है।।८।।

 ॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले– 

 ॥ एवमुक्तास्ततो नागा नागराजेन पार्थिव ॥

 प्रणम्य तं ततो जग्मुरर्बुदं पर्वतं प्रति ॥ ९ ॥

हे राजन्! जब इस प्रकार नागराज शेष ने उन नागों को कहा तो वे सब उन्हें प्रणाम करके अर्बुद पर्वत की ओर प्रस्थान किये।।९।।

 ते भित्त्वा धरणीपृष्ठं पर्वते तदनन्तरम् ॥ निजग्मुर्विलमार्गेण कृत्वा श्वभ्रं सुविस्तरम् ॥ १० ॥

उन लोगों ने उसके बाद धरती को विदीर्ण करके बिल के द्वारा सुंदर गड्ढा बनाकर ।।१०।।

 ततो धृतव्रताः सर्वे देवीभक्तिपरायणाः ॥

 वसन्ति भक्तिसंयुक्ताश्चण्डिकाराधनाय ते ॥ ११ ॥

उस गर्त में व्रत को धारण करते हुए भगवती चण्डिका की भक्ति में लगकर भक्तियुक्त होकर उनकी आराधना के लिए रहने लगे।।११।।

 तस्थुस्तत्र सदा होमं कुर्वन्तो जाप्यमुत्तमम् ॥ एकाहारा निराहारा वायुभक्षास्तथा परे ॥ १२ ॥

उसे गर्त में वे लोग उत्तम मन्त्र का जप करते हुए सदा होम करते रहते थे ।उनमें कोई एक बार आहार करता था कोई निराहार था और कुछ लोग वायु का भक्षण करके जप करने लगे।।१२।।

 दन्तोलूखलिनः केचिदश्मकुट्टास्तथा परे ॥ पञ्चाग्निसाधकाश्चान्ये सद्य; प्रक्षालकास्तथा ॥ १३॥ 

उनमें कुछ लोग ऊखल का काम दांत से लेने वाले और कुछ लोग पत्थर पर कूटकर खाने वाले तथा अन्य नाग पंचाग्नि के साधक एवम् अन्य लोग प्राप्त वस्तु को धोकर आहार करने वाले थे।।१३।।

गीतं वाद्यं तथा चक्रुरन्ये देवाः पुरस्तदा ॥

 अनन्य श्रद्धयोपेतांस्तान्दृष्ट्वा पन्नगोत्तमान् ॥ १४ ॥ 

अन्य लोग गीत और वाद्य के द्वारा भगवती के सम्मुख उन्हें प्रसन्न करने के लिए अनन्य श्रद्धा से संयुक्त होकर के जप परायण हुए। उन उत्तम नागों को इस प्रकार देखकर के।।१४।।

ततो देवी सुसन्तुष्टा वाक्यमेतदुवाच ह ।॥ १५ ॥

तत्पश्चात् भगवती उन पर अत्यंत प्रसन्न हुईं और उनसे इस प्रकार वचन बोलीं।।१५।।

 ॥ ॥ देव्युवाच ॥ ॥ 

देवी चण्डिका बोलीं–

परितुष्टास्मि वो वत्साः किमर्थं तप्यते तपः ॥ वरयध्वं वरं मत्तो यः स्थितो भवतां हृदि ॥ १६ ॥

हे बालकों ! मैं तुम लोगों पर अत्यंत प्रसन्न हूं। तुम सब किस लिए तप कर रहे हो ? तुम्हारे ह्रदय में जो हो वह वर मुझसे मांग लो ।।१६।।

 ॥ नागा ऊचुः ॥ ॥

नाग बोले–

 मातृशापेन संतप्ता वयं देवि निराश्रयाः ॥ नागराजसमादेशाच्छरणं त्वां समागताः ॥ १७॥

हे मात:! हम लोग मां कद्रू के शाप से अत्यंत संतप्त हैं । हे देवि! हम लोगों का कोई दूसरा आश्रय नहीं है। नागराज भगवान शेषनाग के आदेश से हम लोग आपकी शरण मेंआए हैं।।१७।।

 सा त्वं रक्ष भयात्तस्माच्छापवह्निसमुद्भवात्।।

 वयं मात्रा पुरा शप्ताः कस्मिंश्चित्कारणान्तरे ॥ पारिक्षितस्य यज्ञे वः पावको भक्षयिष्यति ॥ १८ ॥

हे देवि! आप हम लोगों की माता के शापरूपी अग्नि से उत्पन्न भय से रक्षा करें। हम लोग किसी कारण से पूर्व काल में मां के शाप से अभिशप्त हो चुके हैं । वह शाप यह कि हम लोगों को महाराज परीक्षित के यज्ञ में अग्नि देव भक्षण कर लेंगे।।१८।।

 ॥ देव्युवाच ॥ ॥ 

देवी बोलीं —

यावत्तस्य भवेद्यज्ञस्तावद्यूयं ममान्तिके ॥

 संतिष्ठत विना भीत्या भोगान्भुङ्क्ष्वं सुपुष्कलान् ॥ १९ ॥ 

है नागों! जब तक महाराज परीक्षित का यज्ञ होता है तब तक तुम लोग मेरे समीप निर्भय होकर निवास करो और सुंदर सुंदर बहुत से भोगों को भोगो।।१९।।

समाप्ते च क्रतौ भूयो गन्तारः स्वं निकेतनम् ॥ युष्माभिर्भेदितं यस्मादेतत्पर्वतकन्दरम् ॥ २० ॥

जब महाराज परीक्षित का यज्ञ समाप्त हो जाए तो तुम लोग अपने-अपने घर चले जाओ। आप लोगों ने इस पर्वत की गुफा का भेदन करके एक जलाशय बना दिया है ।।२०।।

 नागह्वदं तु तत्तीर्थमेतद्भावि धरातले ॥ 

अत्र यः श्रावणे मासि पञ्चम्यां भक्तितत्परः ॥२१॥

 इसलिए यह तीर्थ नागह्रद नाम से विख्यात होगा । यहां पर श्रावण मास की पंचमी तिथि में जो भक्ति में तत्पर होकर।।२१।।

 करिष्यति नरः स्रानं तस्य नाहिकृतं भयम् ॥ भविष्यति पुनः श्राद्धात्पितॄन्संतारविष्यति ॥ २२॥

 प्राणी यहां स्नान करेगा उसे सर्प से कोई भय नहीं होगा । और जो यहां श्राद्ध करेगा वह अपने पितरों का उद्धार कर देगा।।२२।।

 ये भोगा भूतले ख्याता ये दिव्या ये च मानुषाः ॥ तान्सर्वान्स नरो नित्यं लभिष्यति न संशयः ॥२३॥

पृथ्वी पर जितने भोग प्रसिद्ध है और जो जो देवताओं के सुलभ भोग हैं। वे सब भोग वह प्राणी नित्य ही प्राप्त करेगा । पुत्रों! इसमें कोई समस्या नहीं है।।२३।।

 ॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले– 

ततो हृष्टा बभूवुस्ते मुक्त्त्वा तदारुणं भयम्॥ देव्याः शरणमापन्नास्तस्थुस्तत्र नगोत्तमे । २४।।

तत्पश्चात् वे सभी नाग भयंकर भय से मुक्त होकर बड़े प्रसन्न हुए और उस श्रेष्ठ आबू पर्वत में भगवती के शरण में निवास करने लगे।।२४।।

 तत: कालेन महता सत्रे पारिक्षितस्य च ॥ 

निवृत्ते ते तदा जग्मुः सुनिर्वृत्ता रसातलम् ॥२५॥

जब महाराज परीक्षित का यज्ञ दीर्घ काल में पूर्ण हो गया तो उसके बाद वे नाग सानंद रसातल चले गए।।२५।।

 देव्या चैवाभ्यनुज्ञाताः प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः ।॥ कृच्छ्रात्पार्थिवशार्दूल तद्भक्त्या निश्चलीकृताः ॥ २६ ॥ 

हे राजन्! वे नाग कष्ट से मुक्त होकर भगवती की भक्ति से निश्चल हो गये और उन्हें वार वार प्रणाम करके उनकी आज्ञा से अपने निवास स्थान पर प्रस्थान किये।।२६।।

अद्यापि कृष्णपञ्चम्यां श्रावणे मासि पार्थिव ॥ सान्निध्यं तत्र कुर्वन्ति देवीदर्शनलालसाः ॥ २७ ॥

हे राजेन्द्र! आज भी श्रावण मास की पंचमी तिथि को वे नाग देवी चण्डिका के दर्शन की लालसा से वहां उपस्थित होते हैं।।२७।।

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं तत्र समाचरेत् ॥

 स्रानं च पार्थिवश्रेष्ठ य इच्छेच्छ्रेय आत्मनः ॥ २८ ॥

इसलिए हे नृपेन्द्र! जो प्राणी आत्मकल्याण चाहता हो । वह वहां पर स्नान और श्राद्ध संपूर्ण प्रयास से करे।।२८।।

इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे नागोद्भवतीर्थमाहात्म्यवर्णनंनाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥ 

 

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” नागोद्भव तीर्थ” के माहात्म्य का वर्णन करने वाला ३७ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

 

 

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