अध्याय -५०,कोटितीर्थ का माहात्म्य

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले–

॥ कोटितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपातकनाशनम् ॥

तीर्थानां यत्र संजाता कोटिः पार्थिव हेलया ॥१॥

हे राजन्! तत्पश्चात् प्राणी संपूर्ण पापों के विनाशक “कोटितीर्थ” को जाय । जहां पर करोड़ों तीर्थ अनायास प्रकट हुए ।।१।।

यदा स्यात्कलिकालस्तु रौद्रो राजन्महीतले ॥
म्लेच्छभूता जनाः सर्वे तत्स्पर्शात्तीर्थविप्लवः॥२॥

हे राजन् ! जब घोर कलिकाल होता है और मानव म्लेच्छों जैसा आचरण करने लगते हैं। तब उनके स्पर्श से तीर्थों में अशांति उत्पन्न हो जाती है।‌२।।

तिस्रःकोट्योऽर्धकोटिश्च तीर्थानां भूमिवासिनाम् ॥ तेषां कोटिस्ततोऽवात्सीत्पर्वतेऽर्बुदसंज्ञके ॥ ३ ॥

तब भूमि पर विद्यमान जो साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं। उनमें एक कोटि ( करोड़ )अर्बुद ( आबू ) पर्वत पर निवास करने लगते हैं ।।३।।

पुष्करे च तथा कोटिः कुरुक्षेत्रे च पार्थिव ।। वाराणस्यामर्धकोटिः स्तुता देवैः सवासवैः ॥ राजन्नेतानि रक्षति सर्वे देवाः सवासवाः ॥ ४ ॥

हे राजन् ! उसी प्रकार पुष्कर में एक करोड़ तीर्थ, तथा एक करोड़ तीर्थ कुरुक्षेत्र में और वाराणसी में आधे करोड़ तीर्थ विद्यमान होते हैं। जिनकी स्तुति देवताओं द्वारा की गयी है। हे नृप ! देवराज इन्द्र के सहित संपूर्ण देवता इन तीर्थों की रक्षा करते हैं।।४।।

यदा यदा भयार्त्तानि म्लेच्छस्पर्शात्समंततः ॥ स्थानेष्येतेषु तिष्ठन्ति तीर्थान्युक्तेषु सत्वरम् ॥ ५ ॥

जब जब समस्त दिशाओं से म्लेच्छों के स्पर्श के भय से तीर्थ पीड़ित होते हैं। तब तब वे शीघ्र ही अपने पावनता की रक्षा हेतु पूर्वोत्तर आबू आदि स्थानों में स्थित हो जाते हैं।।।५।।

कोटितीर्थानि त्रीण्येवं तत्र जातानि भूतले ॥
अर्धकोटिसमेतानि सर्वपापहराणि च ॥ ६ ॥

इसलिए भूतल पर समग्र पापों को हरने वाले तीन ही कोटितीर्थ हुए। जिनमें आबू, पुष्कर और कुरुक्षेत्र में पापसंहारक एक एक करोड़ तथा वाराणसी में आधे करोड़ तीर्थ विद्यमान होते हैं।।६।।

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नानं तत्र समाचरेत् ॥
कृष्णपक्षे त्रयोदश्यां नभस्ये च विशेषतः ॥ ७ ॥

अत एव मनुष्य को पूर्ण प्रयास से उन उन तीर्थों में भाद्रपद मास भर स्नान न हो सके तो कम से कम कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को स्नान विशेष रूप से अवश्य करना चाहिए।। ७।।

तत्र स्नानादिकं सर्व जपहोमादिकं च यत् ॥
सर्वं कोटिगुणं राजंस्तत्प्रसादादसंशयम् ॥ ८॥

हे राजन् ! उन उन कोटितीर्थों में स्नानादि तथा जप, होम, भगवान् की अर्चना, विप्रभोज आदि जो भी सत्कर्म किया जाता है। वह सब उन “कोटितीर्थ” के प्रभाव से कोटि गुणा हो जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं ।।८।।

इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेSर्बुदखण्डे
कोटितीर्थप्रभाववर्णनं नाम पञ्चाशततमोऽध्यायः ॥ ५० ॥

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” कोटितीर्थ” के माहात्म्य का वर्णन करने वाला ५० वां अध्याय पू‌र्ण हुआ।।

 

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