मुस्लिमों के कब्र की मूल परम्परा वर्गविशेष के राक्षसों से चली है

मुस्लिमों के कब्र की मूल परम्परा वर्गविशेष के राक्षसों से चली है-सप्रमाण विवेचन

हमारे शास्त्रों में मृत शरीर के ३परिणाम बताये गये हैं—

१-कीड़ा बनना, २-विष्ठा, ३-भस्म,

—”कृमिविड्भस्मसंज्ञान्तं शरीरमिति वर्णितम् ।”
–«भागवतपुराण, माहात्म्य–अ.-५/६०»

१-जब मृतक को गड्ढा खोदकर गाड़ दिया जाता है तब शरीर में सड़ने से कीड़े ही कीड़े पड़ जाते
हैं । यह परम्परा हिन्दू ,मुसलिम और इशाई आदि में प्रसिद्ध है ।

२-मृतक को जल आदि में फेंक देने पर जब उसे मछली कौवे कुत्ते आदि जीव खा जाते हैं तब वह
विष्ठा (मल =टट्टी) के रूप में परिणत हो जाता है । केवल हिन्दुओं में ही इसकी परम्परा आज भी
दृष्टिगोचर होती है–छोटे बच्चों एवं सन्त महापुरुष आदि के विषय में ।

मुस्लिम और इशाई आदि में यह परम्परा नहीं है ।

३-जब मृतक का दाह करते हैं तब उसका शरीर भस्म के रूप में बदल जाता है । यह परम्परा भी आज
हिन्दुओं में ही दिखती है ,मुस्लिम या इशाई आदि में नही ।

इस विवेचन से यह निष्कर्ष निकला कि शव को जलाने और जल आदि में फेकने की परम्परा मात्र हिन्दुओं
में ही है मुस्लिम एवं इशाई आदि में नहीं ।

जलाने का ही नाम अन्त्येष्टि संस्कार भी है । यह अनादि काल से ही है । ऋग्वेद में इसके मन्त्र मिलते हैं–
“लोमभ्यः स्वाहा –” इत्यादि।

आदिराज महाराज पृथु के शरीर को उनकी पत्नी ने ही वन में अन्य किसी बन्धु बांधव के न होने से
स्वयं चिता सजाकर जलाया था—

“चितामथारोपयदद्रिसानुनि”–«भागवतपुराण-४/२३/२१»

कब्र परम्परा किसकी ? और कितनी प्राचीन ?

मुस्लिम और इशाई ये दो सम्प्रदाय ऐसे हैं जिनमें मृतक को कब्र में दफनाते हैं । मृतक के अनुसार
गड्ढा खोदकर शव को उसमें रखकर अपनी प्रक्रिया इन दोनों सम्प्रदायों में पूर्ण की जाती है ।

जिनमें मुस्लिमों की परम्परा १४३७ वर्ष पुरानी तथा इशाइयों की २०१५ के आस पास है । इससे
अधिक प्राचीनता में कोई प्रमाण नही ।

कब्र की सबसे प्राचीन परम्परा के मूल वर्गविशेष के राक्षस हैं

कब्र की सबसे प्राचीन मूल परम्परा का उल्लेख हमारे आदिकाव्य वाल्मीकि रामायण में मिलता है ।
यह परम्परा एक ऐसे विशेष वर्ग के राक्षसों की थी जिनका काम दूसरों की बहू बेटियों को जबरदस्ती
छीनना और पशुओं का मांस खाना था । इसे हम सप्रमाण प्रस्तुत करते हैं–

जब भगवान् श्रीराम, जानकी जी और लक्ष्मण जी के साथ वन में विचरण कर रहे थे तब उन्हे मार्ग में
विराध नामक एक राक्षस मिला। जो पशुओं का मांस खाने वाला था –वह लोहे से बने एक अस्त्र में
३सिंह, ४व्याघ्र, २भेड़िये और १०हिरणों को मारकर ले रखा था ।–

“मुस्लिमों

“त्रीन् सिंहान् चतुरो व्याघ्रान् द्वौ वृकौ पृषतान् दश”–«वा.रा.अर.का.–२/६»

और वह हिन्दु धर्म का घोर विरोधी था ;क्योंकि वह प्रतिदिन हिन्दू धर्मानुयायी ऋषियों का मांस
खाता था—

“चरामि सायुधो नित्यम् ऋषिमांसानि भक्षयन्।” –«वाल्मीकि रामायण,अरण्यकाण्ड–२/१३»

उसने सीता जी को देखते ही दौड़कर पकड़ लिया और श्रीराम तथा लक्ष्मण जी से बोला कि मैं इसे
अपनी पत्नी बनाऊंगा और तुम दोनों को मार डालूंगा। अन्ततः श्रीराम और लक्ष्मण उसे इतना मारे
कि मरते मरते वह बोला –

हे राम! तुम मुझे गड्ढा खोदकर उसमें गाड़ दो(अर्थात् कब्र खोदकर उसमें दफना दो)। यह हम जैसे
राक्षसों का सनातन धर्म है —

“अवटे चापि मां राम निक्षिप्य कुशली ब्रज ।
रक्षसां गतसत्त्वानामेष धर्मः सनातनः ।।”
–«अर.का.–४/२२»

यहां विराध ने स्पष्ट व्यक्त कर दिया कि शव को फेंकना या जलाना उसकी परम्परा का सनातन
धर्म नही है । उसके कथनानुसार श्रीराम ने आज्ञा देकर लक्ष्मण जी से उसे दफनवा दिया ।

अतः कब्र की मूल परम्परा दूसरों की बहू बेटियों का अपहरण करने वाले मांसाहारी ,पशुहिंसक,
हिन्दूविरोधी एक वर्गविशेष के राक्षसों की है ।

और इस परम्परा का निर्वाह करने वाले मुस्लिम तथा इशाई आज भी हिन्दुओं के धर्म का विनाश
करने पर तुले हुए हैं ।

अतः हिन्दुओं को अपनी मौलिकता को पहचाननी चाहिए । हम उस सनातन परम्परा के हैं ।जिसने अथाह सागर
की भीषण लहरों पर पुल बांध दिया था।

जिसने निषाद को गले लगाया। वानर भालु जैसे पशुओं से भी मैत्री निभाई । और पशुहिंसक, मांसाहारी, नारी का
अपहरण करने वाले हिन्दूधर्मविरोधी को कब्र में दफनवा दिया । सेतु पर पुल बाँधकर छल से नारी अपहरण करने
वाले का उसी के देश में समूल विध्वंस कर दिया । बक्सर और पंचवटी आदि में बनाये हुए आतंकवादी संगठनों का सफाया कर दिया ।

ये विराध के अनुयायी मुस्लिम आज आतंकवाद तथा लवजिहाद आदि के द्वारा भारत में जो षड्यन्त्र कर रहे हैं । उससे
हमें देश की रक्षा के लिए दृढ़संकल्प होना है ।

जय श्रीराम

जयतु भारतम्, जयतु संस्कृतम्

#आचार्यसियारामदासनैयायिक

Gaurav Sharma, Haridwar

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