सर्वेश्वरश्रीरघुनाथो विजयतेतराम्
निग्रहाचार्य जी की भ्रान्ति एवम् उनके अज्ञानमूलक आक्षेपों का खण्डन
Nigrahacharya Ji Ki Bhranti Evam Unke Agyanmulak Akshepon Ka Khandan
निग्रहाचार्य श्री भागवतानंद जी ने “निषादस्थपतिं याजयेत्” वेदवाक्य के आधार पर कहा कि इसके द्वारा मैं शूद्र का वेदाधिकार सिद्ध किया हूं।इस संदर्भ में उन्होंने अनेक प्रकार का आक्षेप किया । इसलिए उनकी समस्त भ्रांतियों एवम् आक्षेपों का निराकरण इस वीडियो में न्याय मीमांसा और वेदान्त का संदर्भ देते हुए किया गया है।
“स्त्रीशूद्रौ नाधीयाताम्” से शूद्र का वेदाध्ययन निषिद्ध है। इधर “निषादस्थपतिं याजयेत्” से भगवान् वेद निषादरूपी शूद्र से यज्ञ का आदेश दे रहे हैं। शूद्र वेद में अनधिकृत होने से इष्टि संबंधी ज्ञान के अभाव में उसे कैसे संपन्न करेगा?
यदि नहीं करेगा तो वेदवाक्य के वैयर्थ्य की प्रसक्ति होगी।
इन सब शंकाओं के समाधान हेतु ये वीडियो सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत है। साथ ही निग्रहाचार्य जी की एतद्विषयक भ्रान्ति और उनके अज्ञानमूलक आक्षेपों का निराकरण भी।
इसमें पूर्व मीमांसा जैमिनिसूत्र और उत्तरमीमांसा ब्रह्मसूत्र दोनों में आये अपशूद्राधिकरण का भी विवेचन किया गया है।।
— आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य
जगद्गुरु रामानन्दाचार्य पीठ, सर्वेश्वर श्रीरघुनाथ
मन्दिर,आबू पर्वत,सिरोही, राजस्थान

