लोग आक्षेप करते हैं कि शूद्रों के कान में शीसा पिघलाकर डालने की बात शास्त्रों में क्यों कहीं गयी ??
जहां तक पिघला शीसा डालने की बात है । वह इस रूप में अमान्य है । शास्त्रों की एक प्रणाली है प्रस्तुतीकरण की ।
ऐसे वाक्य अर्थवाद कहे जाते हैं । ये भी तीन तरह के होते हैं । जो प्रत्यक्ष झूंठ होते हैं । उन्हें गुणवाद रूप अर्थवाद कहते हैं । जैसे ” प्रजापतिरात्मनो वपामुदक्खिदत्–” “प्रजापति ने अपनी वपा को निकालकर आग्नि में आहुति देदी ” ।
इस वेदवाक्य पर कुमारिलभट्ट प्रभृति मीमांसको ने विचार किया कि कोई अपनी वपा निकालकर कैसे जीवित रह सकता है ?
अतः: इसका तात्पर्य अभिधा शक्त्या नहीं लगाना चाहिए । उनका तात्पर्य है कि यज्ञादि पुण्य कार्यों में सर्वस्व त्याग की भावना रखनी चाहिए । कंजूसी नहीं करनी चाहिए । इसे ही पौराण शब्दों में ” वित्तशाठ्यं न कारयेत्” कहा गया ।
यही स्थिति शूद्र के कान में शीसा पिघलाकर डालने वाले वाक्य की है । जिसका उपनयन नहीं हुआ है उसे वेदविद्या में अधिकार नहीं हैं चाहे वह ब्राह्मण ही क्यों न हो । अरे ब्राह्मण की बात छोड़ो वह साक्षात् देवता ही क्यों न हो । यदि यज्ञोपवीत नहीं हुआ तो उसका अधिकार वेदाध्ययन में नहीं है ।
ब्रह्मसूत्र देवताधिकरण में अनुपवीत होने के कारण देवों का वेदाध्ययन में अधिकार न होने से उनका ब्रह्मविद्या में अधिकार है या नहीं — यह प्रश्न खड़ा करके गंभीर विचार किया गया है ।
स्त्री और शूद्र का भी वेदाध्ययन नहीं होता । ये दोनों तो “वेदाध्ययनायोग्यत्व धर्मेण” देवश्रेणी में चले गये ।
अब आप बतलायें कि शूद्रवत् अनुपवीत इनके कान में भी शीसा घोलकर डाला जाय क्या ? नहीं न । तो शीसा डालने वाले वाक्य का इतना ही तात्पर्य है कि जो अनधिकारी हों उन्हें वेदाध्ययन में शामिल न किया जाय । चाहे वे शूद्र हों या उनके सदृश उपनयनशून्य ब्राह्मणादि ।
यदि वैदिक वचनों का सीधा अर्थ लेंगे । प्रशंसाधिकरण में ” गोSश्वेभ्यो अन्ये अपशव:” गाय और घोड़े से भिन्न भैंस आदि को पशु से भिन्न बतलाया गया है । क्या ये अभिधेयार्थ बाधित नहीं है ? क्या बाधितार्थ के बोधक वेद अप्रामाण्यग्रस्त नहीं हो जायेगे ?
इसलिए वहां भी तात्पर्य ही लिया गया कि गाय और घोड़े से भिन्न जैसे मच्छर है और वह गाय घोड़े के समक्ष अत्यन्त तुच्छ है । ऐसे ही भैंस आदि भी अपशु अर्थात् मच्छरवत् गाय और घोड़े के सामने तुच्छ हैं ।
यह विधा है शास्त्रों की अपने तात्पर्य कथन की । किन्तु मीमांसा का अध्ययन न होने से अल्पश्रुतों ने सब गड़बड़ कर दिया । परिणाम यह कि महर्षियों की संतानें ही आज अपने पूर्वजों पर व्यंग कर रही हैं या उनकी रागद्वेषशून्यता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहीं हैं ।
शास्त्रों के पारिभाषिक शब्द न समझने पर महान् अनर्थ हो जाता है । जैसे नैयायिकों का लिंगपरामर्श और व्यभिचार । जो लिंग और व्यभिचार का सर्वप्रसिद्ध अर्थ लेगा । वह तो नैयायिकों की निन्दा ही करेगा न ।
इसलिए यदि आप शास्त्र की परिधि में कोई बात करते हैं तो उन शास्त्रों के पारिभाषिक शब्दों और उनके तात्पर्यनिर्धारणविधा का ज्ञान अवश्य रखें ।
जय श्रीराम
#आचार्यसियारामदासनैयायिक


Naman gurudev 🥰🥰🥰🙏🥰🥰🥰
प्रसन्न रहें भगवन्!
जय श्रीराम।