अध्याय-३६,चण्डिकाश्रम का माहात्म्य,भाग-२

पुत्रहीनश्च यो मर्त्यो नारी वापि समाहिता ॥ 

तन्मनाः पिंडदानं वै तथा स्नानं करिष्यति ॥

 अपुत्रो लभते शीघ्रं सुपुत्रं नात्र संशयः ॥ १७१ ॥ 

पुत्रहीन जो मनुष्य अथवा नारी एकाग्रचित होकर  पुत्र प्राप्ति को मन में रख करके यहां स्नान तथा पिंडदान करेंगे वह पुत्र अवश्य ही सुंदर पुत्र प्राप्त करेंगे। इसमें कोई संशय नहीं है।।

॥ इन्द्र उवाच ॥

इंद्र बोले–

॥ भ्रष्टराज्यो नृपो योऽत्र स्नानं दानं करिष्यति ॥ सर्वशत्रुक्षयस्तस्य राज्यावाप्तिर्भविष्यति ॥ १७२॥ ॥

राज्य से भ्रष्ट जो राजा यहां स्नान और दान करेगा । उसके संपूर्ण शत्रु नष्ट हो जाएंगे और उसे राज्य की प्राप्ति होगी।।

॥॥ अग्निरुवाच ॥ ॥ 

अग्निदेव बोले —

अत्रागत्य शुचिः श्राद्धं यः करिष्यति मानवः ॥ आत्मवित्तानुसारेण तस्य यज्ञफलं भवेत् ॥ १७३॥

यहां पर आकर जो मनुष्य पवित्र होकर अपने धन के अनुसार श्रद्धा करेगा उसे यज्ञ का फल प्राप्त होगा।।

 ॥ यम उवाच ॥ 

यमराज बोले —

॥ अब स्नात्वा तिलान्यस्तु ब्राह्मणेभ्यः प्रदास्यति ॥ अल्पमृत्युभयं तस्य न कदाचिद्भविष्यति ॥१७४॥

इस चण्डिकाश्रम में स्नान करके जो ब्राह्मणों के लिए तिलों का दान करेगा‌ । उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं होगा ।।१७४।।

॥ राक्षसा ऊचुः ॥ 

राक्षस बोले–

॥ पिण्डदानं नरा येऽत्र करिष्यन्ति तवाऽश्रमे ॥ प्रेतोत्थं न भयं तस्य देवि क्वापि भविष्यति ॥१७६॥

हे देवि मात:! जो लोग आपके इस आश्रम में आकर पिण्ड दान करेगा । उसे प्रेतजन्य बाधा कभी भी नहीं होगी।।

॥ वरुण उवाच ॥

वरुण जी बोले–

 ॥ स्नानार्थ ब्राह्मणेन्द्राणां योऽत्र तोयं प्रदास्यति ॥ विमलस्तु सदा भावि इह लोके परत्र च ॥ १७६ ॥ 

जो प्राणी यहां उत्तम ब्राह्मणों के लिए स्नान हेतु जल प्रदान करेगा। वह इस लोक में पापमुक्त होकर परलोक में सुख भोगेगा।।१७६।।

॥ वायुरुवाच ॥ 

वायुदेव बोले–

॥ विलेपनानि शुभ्राणि सुगंधानि विशेषतः ॥ 

योSत्र दास्यति विप्रेभ्यो नीरोगः स भविष्यति ॥ १७७ ॥ 

जो मानव यहां ब्राह्मणों के लिए शुद्ध सुगन्धित कुंकमादि चंदन का लेप प्रदान करेगा। वह लोगों से मुक्त रहेगा ।।१७७।।

॥ धनद उवाच ॥

कुबेर जी बोले–

॥ योऽत्र वित्तं यथाशत्क्त्या ब्राह्मणेभ्यः प्रदास्यति ॥ न भविष्यति लोके स वित्तहीनः कथंचन ॥ ॥१७८॥

जो यहां विप्रों के लिए यथा शक्ति धन देगा। वह संसार में किसी भी तरह धनहीन नहीं होगा।।१७८।।

॥ ईश्वर उवाच ॥ 

शिव जी बोले–

॥ योऽत्र व्रतपरो भूत्वा चातुर्मास्यं वसिष्यति ॥

 इह लोके परे चैव तस्य भावि सदा सुखम् ॥ १७९ ॥

जो व्यक्ति यहां तीर्थों में निवास योग्य व्रतों का पालन करता हुआ चातुर्मास्य करेगा । वह ऐहिक और पारलौकिक सुखों को प्राप्त करेगा।।१७९।।

॥ वसव ऊचुः ॥ 

वसुगण बोले–

॥ त्रिरात्रं यो नरः सम्यगुपवासं करिष्यति ॥ आजन्ममरणात्पापान्मुक्तः स च भविष्यति ॥१८०॥

जो इस आश्रम में तीन रात्रि पूर्णतया उपवास करेगा। वह जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त होने वाले समस्त पापों से मुक्त हो जायेगा।।१८०।।

॥ आदित्य उवाच ॥

भगवान् सूर्य बोले–

॥ अत्राश्रमपदे पुण्ये ये ये नरा भक्तिसंयुताः ॥ छत्रोपानत्प्रदातारस्तेषां लोकाः सनातनाः ॥ १८३ ॥

इस पुण्यमय आश्रम के स्थान पर जो लोग भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को छत्ता, जूता का दान करेंगे वे सनातन ब्रह्मलोक को प्राप्त करेंगे।।१८३।।

 ॥ अश्विनावूचतुः ॥ 

दोनों अश्विनी कुमार बोले–

॥ मिष्टान्नं श्रद्धयोपेतो ब्राह्मणाय प्रदास्यति ॥

 योऽत्र तस्य परा प्रीतिर्भविष्यत्यविनाशिनी ॥ १८२ ॥

जो यहां श्रद्धायुक्त होकर विप्र के लिए मिठाई देगा। इस लोक में उसके परिवार में कभी नष्ट न होने वाला प्रेम होगा।।१८२।।

॥ तीर्थान्यूचुः ॥ 

समस्त तीर्थ बोले–

॥ अद्यप्रभृति सर्वेषां तीर्थानामिह संस्थितिः ॥ भविष्यति विशेषेण ह्याश्रमे लोकविश्रुते ॥१८३॥

संसार में विख्यात इस आश्रम में आज से हम सभी समस्त तीर्थों का विशेष रूप से निवास होगा।।१८३।।

 कृष्णपक्षे चतुर्दश्यामाश्विने मासि भक्तित: ॥ उपवासपरो भूत्वा योऽत्र स्नानं कारिष्यति ॥ सर्वेषामेव तीर्थानां स फलं हि लभिष्यति ॥ १८४॥

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को जो भक्तिपूर्वक उपवास करते हुए यहां स्नान करेगा। वह संपूर्ण तीर्थों का फल प्राप्त कर लेगा।।१८४।।

 ॥ गन्धर्वा ऊचुः ॥ 

गन्धर्व बोले–

॥ गीतवाद्यानि यश्चात्र प्रकरिष्यति मानवः ॥ सप्तजन्मान्तराण्येव रूपवान्स भविष्यति ॥ १८५ ॥

“”(गीयतेइति।गैगाने + भावे क्तः।) गानम्।इत्यमरः।१।६।२५॥तस्यलक्षणंयथा –धातुमातुसमायुक्तंगीतमित्युच्यतेबुधैः।तत्र नादात्मकोधातुर्मातुरक्षरसञ्चयः॥”

वद् + णिच् + यत् । ) वादयन्ति ध्वनयन्ति यत् । वाज्ना इति भाषा । तत्पर्य्यायः । वादित्रम् २ आतोद्यम् ३ । तच्चतुर्विधं यथा “ ततं वीणादिकं वाद्यमानद्धं मुरजादिकम् । वंश्यादिकन्तु शुषिरं कांस्यतालादिकं घनम् ॥ “ इत्यमरः ॥””

धातु मातु से युक्त को गीत कहते हैं । वह दो प्रकार का होता है। नादात्मक जैसे तबला आदि से निकली ध्वनि और अक्षरों का संचय = समूह, जैसे भजनादि। अर्थात् जब संकीर्तनादि वाद्ययन्त्र ध्वनिपूर्वक हो तब उसे गीत कहेंगे। किन्तु यहां वाद्य का पृथक् उल्लेख होने से गीत से मात्र संकीर्तनादि तथा वाक्यानि से वाद्य अर्थात् चार प्रकार के वाद्यों जैसे -१-तत=वीणादि,२-आनद्ध= मुरजादि, ३-सुषिर=वंशी आदि, ४-घन= कांस्य करतालादि का ग्रहण है।

इस प्रकार जो मनुष्य यहां गीत और वाद्य का आयोजन करेंगे। वे सात जन्मों तक रूपवान होंगे।।१८५।।

॥ ऋषय ऊचुः ॥ 

ऋषिगण बोले–

॥ आश्रमेऽस्मिन् त्रिरात्रं य उपवासं करिष्यति ॥ चान्द्रायणसहस्रस्य फलं तस्य भविष्यति ॥ १८६ ॥

इस चण्डिकाश्रम में जो तीन रात उपवास करेगा। उसके उस उपवास का फल एक हजार चान्द्रायण व्रत के समान होगा ।।१८६।।

 ॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले– 

 ॥ एवं सर्वे वरान्दत्त्वा देव्यै देवा नृपोत्तम ।॥ तदाज्ञया दिवं जग्मुर्देवी तत्रैव संस्थिता ॥ १८७॥

हे नृपेन्द्र! इस प्रकार सम्पूर्ण देवता उन भगवती को वर देकर उनकी आज्ञा से स्वर्ग चले गये। और भगवती चण्डिका वहीं निवास करने लगीं।।१८७।।

अथ मर्त्त्या दिवं जग्मुर्दृष्ट्वा देवीं तदाश्रमे ॥ अनायासेन संपूर्णस्ततो मर्त्यैस्त्रिविष्टपः ॥ १८८ ॥

तत्पश्चात् सभी प्राणी उस आश्रम में चण्डी देवी का दर्शन करके अनायास स्वर्ग जाने लगे। इससे स्वर्ग लोक मरणधर्मा प्राणियों से भर गया।।१८८।।

 अग्निष्टोमादिकाः सर्वाः क्रिया नष्टा धरातले ॥

धर्मक्रियास्तथा चान्या मुक्त्वा देव्या: प्रपूजनम्।।१८९।।

भगवती के उत्तम पूजन को छोड़कर धरती पर अग्निष्टोमादि समस्त कर्म नष्ट हो गये। तथा धर्म संबंधी संध्यावन्दन,अग्निहोत्र आदि सभी क्रियाएं नष्ट हो गयीं। जब देवी के दर्शन से ही स्वर्ग मिल रहा था। तब स्वर्ग की कामना से दर्शपूर्णमासादि दीर्घकाल साध्य कर्मों का अनुष्ठान कौन करता।।१८९।।

ततो भीतः सहस्राक्षः संमंत्र्य गुरुणा सह ॥ आह्वयामास वेगेन कामं क्रोधं भयं मदम् ॥ १९० ॥

व्यामोहं गृहपुत्रोत्थं तृष्णामायासमन्वितम् ॥

इस प्रकार धर्म का लोप होता देखकर देवराज इन्द्र डर गये। उन्होंने गुरु वृहस्पति के साथ मन्त्रणा करके शीघ्र ही काम, क्रोध, भय, मद और तृष्णा तथा माया से युक्त महामोह को बुलाया।।

गत्वा यूयं द्रुतं मर्त्ये स्थातुकामान्नरान् स्त्रियः ॥१९१॥ चण्डिकायतने पुण्ये सेवध्वं हि ममाज्ञया ॥ विशेषेणाश्विने मासि कृष्णपक्षेऽन्त्यवासरे ॥ १९२॥

आप सब यहां से शीघ्र जाकर मेरी आज्ञा से पुण्यमय चण्डिकाश्रम में रुकने की इच्छा वाले पुरुष और स्त्रियों का सेवन करो। विशेष रूप से उन पर अधिकार करना जो आश्विन मास के कृष्णपक्ष के अन्तिम दिन अर्थात् अमावस्या को वहां रुकें। तात्पर्य यह की श्राद्धादि में विशेष विघ्न करो।।१९२।‌

एवमुक्तास्ततः सर्वे कामाद्यास्ते द्रुतं ययुः ॥

मर्त्यलोके महाराज रक्षां चक्रुश्च सर्वशः ॥ १९३॥

इस प्रकार आदेश पाते ही कामादि दुर्गुण शीघ्र ही मृत्युलोक में चण्डिकाश्रम पहुंचे। और हे महाराज! उन दुष्टों ने सर्वतोभावेन स्वर्ग की रक्षा आरंभ कर दी। वहां आने जाने वाले प्राणियों के सत्कर्म में विघ्न उत्पन्न करके स्वर्ग को भरने से रोक दिया। यही स्वर्ग की रक्षा हुई।।१९३।।

 एवं ज्ञात्वा द्रुतं गच्छ तत्र पार्थिवसत्तम ।।

यदीच्छसि परं श्रेय इह लोके परत्र च ॥ १९४ ॥

हे नृप श्रेष्ठ! यदि तुम इस लोक और परलोक में परम कल्याण चाहते हो तो इस प्रकार चण्डिकाश्रम का माहात्म्य समझकर तुम शीघ्र ही वहां जाओ।।१९४।।

यो याति चण्डिकां द्रष्टुमर्बुदं प्रति पार्थिव ।। 

नृत्यन्ति पितरस्तस्य गर्जन्ति च पितामहाः ॥ १९५ ॥ 

हे राजन्! जो मानव आबू पर्वत में स्थित भगवती चण्डिका का दर्शन करने जाता है। उसके पितर प्रसन्नता से नृत्य करने लगते हैं और पितामह गर्जना करने लगते हैं।।१९५।।

तारयिष्यति नः सर्वान्स पुत्रो य इहाश्रमे ॥ चण्डिकायाः प्रगत्वाऽथ कुर्याच्छ्राद्धं समाहितः ॥ १९६ ॥ 

कि भगवती चण्डिका के आश्रम जाकर चित्त एकाग्र करके वह पुत्र श्राद्ध करेगा। तथा हम सबको तार देगा ।।१९६।।

एकया लभ्यते राज्यं स्वर्गश्चैव द्वितीयया ॥ 

तृतीयया भवेन्मोक्षो यात्रया तत्र पार्थिव ॥ १९७ ॥

हे नृप! वहां एक वार की यात्रा से राज्य और दूसरी यात्रा से स्वर्ग तथा तीसरी यात्रा से मोक्ष होता है।।१९७।।

 तस्मात्सर्वप्रयत्नेन यात्रां तत्र समाचरेत् ।। 

अर्बुदे पर्वत श्रेष्ठे सर्वतीर्थमये शुभे ॥ १९८ ॥

इसलिए सर्वतीर्थमय सुंदर पर्वतश्रेष्ठ आबू में विराजमान चण्डिकाश्रम के लिए सब प्रकार से प्रयत्न करके यात्रा करनी चाहिए।।१९८।।

तत्र श्लोकः पुरा गीतो नारदेन महर्षिणा ॥

 स्नात्वा तत्राश्रमे पुण्ये बहुविप्रसमागमे ॥ १९९ ॥

उस विषय में महान् ऋषि देवर्षि नारद जी ने पूर्वकाल में श्लोक गाया था। कि पुण्यप्रद अनेक ब्राह्मणों का समागमस्थल उस चण्डिकाश्रम में स्नान दानादि करके ।।

पुनन्त्येवान्यतीर्थानि स्नानदानैरसंशयम् ॥ अर्बुदालोकनादेव विपाप्मा तत्र जायते ॥ २०० ॥

अन्य तीर्थ भी स्वयं को पवित्र करते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है। आबू पर्वत के दर्शन मात्र से प्राणी सभी पापों से मुक्त हो जाता है।।२००।।

 यः शृणोति सदाख्यानमेतच्छूद्धासमन्वितः ॥

 स प्राप्नोति नरश्रेष्ठ: कामान्मनसि वांछितान् ॥ २०१ ॥

जो प्राणी इस सत्य कथानक को श्रद्धा से युक्त होकर सुनता है। मनुष्यों में श्रेष्ठ वह व्यक्ति मन को अभीष्ट समस्त भोगों को प्राप्त कर लेता है।।२०१।।

 यस्यैतेत्तिष्ठते गेहे लिखितं पुस्तकं नृप ।

 तस्यापि वांछिताः कामाः सम्पद्यन्ते दिनेदिने ॥ २०२ ॥ 

हे राजन्! जिसके घर में लिखी हुई यह पुस्तक अर्थात् पांडुलिपि विराजमान हैं। उसे भी अभिलषित भोग दिनों-दिन मिलते रहते हैं।।२०२।।

पठति श्रद्धयोपेतो यो वा भूमिपते नरः ॥ 

सोऽपि यात्राफलं राजंल्लभते पुरुषोत्तमः ॥२०३॥

हे भूपते! जो इस माहात्म्य को श्रद्धापूर्वक पढ़ता है‌ या सुनता है। हे राजन् ! वह भी आबू पर्वत की यात्रा का फल प्राप्त करता है।।२०३।।

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे चण्डिकाश्रमोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनं नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥ 

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में चण्डिकाश्रमोत्पत्ति माहात्म्य का वर्णन करने वाला ३६ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

व्याख्याकार — आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य, जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य पीठ, श्रीरघुनाथ मन्दिर,नक्की लेक ,आबू पर्वत,सिरोही, राजस्थान 

 

 

 

 

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