अध्याय -३८, शिवगंगा कुण्डोत्पत्ति का माहात्म्य

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले–

॥ कुंडं तु शिवलिंगाख्यं ततो गच्छेन्महीपते ॥
यत्र सा जाह्नवी गुप्ता तिष्ठते भूपसत्तम ॥ १ ॥

हे राजन् ! उसके बाद प्राणी शिवलिंग कुण्ड नामक तीर्थ में जाए । जहां पर भगवती गंगा गुप्त रूप से स्थित हैं । यहां ” तिष्ठते’ यह आत्मने पद की क्रिया आर्षत्वात् है।।१।।

तस्यां स्नातो नरः सम्यक्सर्वतीर्थफलं लभेत् ॥ मुच्यते पातकात्कृत्स्नादाजन्ममरणान्तिकात् ॥ २ ॥

उस कुण्ड में स्नान करके प्राणी संपूर्ण तीर्थों का फल प्राप्त करता है और जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत किए गए समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ।।२।।

॥ ययाति रुवाच ॥

ययाति जी बोले–

॥ किमर्थं तत्र सा गुप्ता जाह्नवी तिष्ठते विभो ॥ कस्मिन्काले समायाता परं कौतूहलं हि मे ॥ ३ ॥

हे प्रभो! वहां पर किस कारण भगवती गंगा गुप्त होकर के निवास करती हैं ? और किस समय वहां पर श्रीगंगा जी आयीं। इस विषय में मुझे बड़ा कुतूहल है।।३।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले–

॥ यदा प्रसादितो देवैर्भगवान्वृषभध्वजः ॥ अर्बुदेऽस्मिन्सदा स्थेयमचलेन त्वया विभो ॥ ४ ॥

जिस समय भगवान वृषभध्वज शंकर जी देवताओं के द्वारा प्रसन्न किए गए । उस समय देवताओं ने उनसे कहा कि हे प्रभो! आप इस आबू पर्वत में सदा अचल रूप से स्थित रहें।। यहां अचलेश्वर महादेव का कथन किया जा रहा है।।।।४।।

तत्र संस्थापिते लिङ्गे स्वयं देवेन शम्भुना ॥
यत्पातितं पुरा लिंगं वालखिल्यैर्महर्षिभिः ॥ ५ ॥

अतिकोपसमायुक्तैः कस्मिञ्चित्कारणान्तरे ॥
तदा देवेन प्रतिज्ञातं सर्वेषां त्रिदिवौकसाम् ॥ ६।।

जिस लिंग को पूर्व काल में किसी कारण से अत्यंत कुपित वालखिल्य महर्षियों के द्वारा गिरा दिया गया था उस लिंग की स्थापना भगवान शिव के द्वारा किये जाने पर ।।५।। भगवान् भव ने संपूर्ण देवताओं के समक्ष प्रतिज्ञा की ।।६।।

अचले तु मयाऽत्रैव स्थातव्यं नात्र संशयः ॥
ततः कालेन महता वसतस्तस्य तत्र च ॥ ७ ॥

मैं इस अचल लिंग में ही निवास करूंगा । इसमें कोई संदेह नहीं है । तत्पश्चात् अचलेश्वर भगवान शिव के वहां दीर्घकाल तक निवास करने पर।।७।।

अचलेश्वररूपस्य गंगा चित्ते व्यजायत ॥
कथं नित्यं तया सार्द्ध भविष्यति समागमः ॥ ८ ॥

उनके चित्त में गंगा जी के विषय में संकल्प हुआ कि गंगा जी के साथ मेरा स्थायी संबंध कैसे होगा?।।८।।

अथ जानाति नो गौरी मानिनी परमेश्वरी ॥
तस्यैवं चिन्तयानस्य बहुशो नृपसत्तम ॥ ९ ॥

अतिमान करने वाली भगवती पार्वती को पता भी न चले।हे राजेन्द्र! इस प्रकार उन्होंने बहुत चिंतन किया।।९।।

उपायं सुमहद्ध्यात्वा जाह्नवीसङ्गसम्भवम् ॥ तेनादिष्टा गणाः सर्वे नन्दिभृङ्गिपुरःसराः ॥ १० ॥

और गंगा जी से मिलने के सुंदर उपाय को सोचकर
उन्होंने नंदी भृंगी के सामने समस्त गणों को आदेश दिया।।१०।।

अभिप्रायोऽस्ति मे कश्चिजलाश्रयव्रतोद्भवः ॥
क्रियतामुत्तमं कुण्डमस्मिन्पर्वतरोधसि ॥ ११ ॥

हे गणों! जल का आश्रय लेकर किए जाने वाले व्रत के विषय में उत्पन्न मेरा कुछ अभिप्राय है। उसे सिद्ध करने के लिए आबू पर्वत की इस भूमि में एक उत्तम कुंड का निर्माण करो।।११।।

तत्राहं जलमध्यस्थः स्थास्यामि जपतत्परः ॥ तच्छ्रुत्वा त्वरितं चकुर्गणाः कुण्डमनेकश: ॥ १२ ॥

उस कुंड के जल के बीच मैं जप पारायण होकर निवास करूंगा ऐसा सुनकर के गणों ने अनेक उपायों से शीघ्र ही एक कुंड का निर्माण किया।।१२।।

स्वच्छोदकसमाकीर्णं सुतीर्थ सुसुखावहम् ॥
ततो गौरीमनुज्ञाप्य जाह्नवीसङ्गलालसः ॥ १३ ॥

जो स्वच्छ जल से परिपूर्ण अत्यंत सुख देने वाला सुंदर तीर्थ था। भगवती पार्वती को बताकर गंगा जी के संगम की लालसा से भगवान शिव ने।।१३।।

व्रतव्याजेन देवेशो विवेश तदनन्तरम्॥
चिन्तयामास तत्रस्थो गङ्गां त्रैलोक्यपाविनीम् ॥ १४ ॥

व्रत के बहाने उस जल के मध्य प्रवेश किया और वहां तीनों लोकों को पवित्र करने वाली भगवती गंगा का स्मरण किया।।१४।।

सा ध्याता तत्क्षणात्तत्र शिवेन सह संगता ॥
एवं स भगवांस्तत्र जाह्नवीं भजते सदा ॥१५॥

स्मरण करते ही भगवती गंगा तत्क्षण शिव जी के समीप उपस्थित हुईं । इस प्रकार भगवान शिव उस कुंड में गंगा जी का सेवन करने लगे।।१५।।

व्रतव्याजेन राजेन्द्र न तु गौरीं व्यजानत ॥ कस्यचित्त्वथ कालस्य नारदो भगवान्मुनिः ॥ कैवल्यज्ञानसम्पनस्तत्रायातः परिभ्रमन्॥१६॥

हे राजेंद्र ! व्रत के बहाने भगवान शिव ऐसा किये और भगवती पार्वती को विस्मृत हो गये। कुछ समय पश्चात् भगवान नारद मुनि घूमते हुए वहां आये ।जो मोक्षविषयक ज्ञान से संपन्न थे ।।१६।।

स तु दृष्ट्वा महादेवं जलस्थं व्रतधारिणम् ॥ कामजेरिंगितैर्युक्तं तत्राऽसौ विस्मयान्वितः ॥ १७ ॥

नारद जी जल के मध्य व्रत धारण किए हुए काम से उत्पन्न चेष्टाओं से युक्त भगवान शिव को देखकर बड़े आश्चर्य में पड़ गये।।१७।।

वक्त्रनेत्रविकारोSयं किमस्य व्रतधारिणः ॥
ईदृक्कामसमायुक्तस्ततो ध्यानस्थितो मुनि: ॥ १८ ॥

व्रत को धारण करने वाले भगवान शिव के मुख और नेत्र में यह कामजन्य विकार कैसे? यह इस प्रकार काम से युक्त कैसे हो गए?? तत्पश्चात् ध्यानस्थ होकर मुनि ने ।।१८।।

अथाऽपश्पद्ध्यानदृष्टया गङ्गासक्तं महेश्वरम्॥
गौर्या भयेन सव्याजं ततो विस्मयमागतः ॥ १९ ॥

ध्यानदृष्टि से गंगा जी में आसक्त भगवान शिव को देखा । जो भगवती गौरी के भय से बहाना बनाकर ऐसा कर रहे थे। इससे वे बड़े विस्मित हुए।।१९।।

तदा स कथयामास सर्वं हरविचेष्टितम् ॥ २० ॥

तत्पश्चात् देवर्षि नारद ने वहां से आकर भगवान शिव की संपूर्ण चेष्टाओं को भगवती पार्वती से कहा।।२०।।

ततो देवी त्वरायुक्ता ययौ यत्र महेश्वर: ।।
आताम्रनयना रोषाद् वेपमाना मुहुर्मुहुः ॥ २१ ॥

उसके बाद वे देवी जहां भगवान शिव विराजमान थे। वहां शीघ्रतापूर्वक पहुंची ।। उनके नेत्र क्रोध से लाल हो गए थे और शरीर वार-वार रोष से फड़क रहा था ।।२१।।

तां दृष्ट्वा कोपसंयुक्तां समायातां महेश्वरीम् ॥
उवाच जाह्नवी भीता ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा।।२२।।

भगवान शिव अपने दिव्य नेत्रों से क्रुद्ध भगवती को आती हुई देखकर गंगा जी से बोले ।।२२।।

आवयोः संगमे देवी नारदेन निवेदिता ॥
सेयं रुष्टा समायाति कुरुष्व यदनन्तरम् ॥ २३ ॥

हे गंगे ! हम दोनों के मिलन को नारद जी ने पार्वती जी से बतला दिया है । इसलिए वह कुपित होकर यहां आ रही हैं । इस विषय में जो करना उचित हो। वह करो ।।२३।।

॥ श्रीमहादेव उवाच।।

भगवान् शिव बोले–

कर्तव्यं जाह्नवि श्रेय: पुरो गत्वा नगात्मजाम् ॥
अत्यर्थं मानिनी ह्येषा साम्ना च वशवर्तिनी ॥ २४॥

शैलपुत्री के सामने जाकर अपना कल्याण करना चाहिए ; क्योंकि यह अत्यधिक मान करने वाली हैं। ये सामनीति द्वारा ही वश में लायी जा सकती हैं।।२४।।

तत्क्षणाज्जायते साध्वी तस्मात् सामपरा भव।
नो चेच्छापं मया सार्धं तव दास्यत्यसंशयम्।।२३।।

सामनीति से वे शीघ्र ही क्रोध त्याग कर साधु स्वभाव को धारण कर लेंगी। इसलिए तुम सामनीति का आश्रय लो।अन्यथा वे मेरे साथ तुम्हें भी शाप दे देंगी। इसमें कोई संशय नहीं है।।२३।।

॥ एवमुक्ता च रुद्रेण जाह्नवी नृपसत्तम ॥ कुण्डान्निर्गत्य सा गङ्गा सम्मुखं प्रययौ तदा ॥ २४॥

हे राजेन्द्र! इस प्रकार भगवान भव के द्वारा कहे जाने पर जह्नुपुत्री श्रीगंगा जी कुंड से निकलकर श्रीपार्वती जी के सम्मुख पहुंचीं।।२४।।

प्रत्युद्ययौ सलज्जा च कृताञ्जलिपुरःसरा ॥
प्रणम्य शिरसा चेयं ततः प्राह स्वलंकृता ॥ २७ ॥

आभूषणों से अलंकृत, अपने कर्म से लज्जित होती हुईं हाथ जोड़कर वे गंगा जी भूमि पर शिर रखकर प्रणाम करती हुई भगवती पार्वती से बोलीं।।२७।।

पुराऽहं तव कान्तेन निपतन्ती नभस्तलात् ॥
धृता देवि त्वयाप्येतद्विदितं नृपतेः कृते ॥ २८ ॥

हे देवि! पूर्व काल में एक राजा के लिए ब्रह्मा जी के कमंडलु से आकाश मार्ग से गिरती हुई मुझ गंगा को आपके प्राणबल्लभ श्री शिव जी ने मुझे धारण किया था। यह रहस्य आपको विदित ही है।।२८।।

भगीरथाभिधानस्य ततः स्नेहो व्यवर्धत ॥ आवयोस्तव भीत्या च नाभूत्क्वापि समागमः ॥ २९ ॥

उन तृप्ति का नाम भगीरथ था। तत्पश्चात् हम दोनों में परस्पर स्नेह बढ़ने लगा। किन्तु आपके भय से हम लोगों का कभी मिलन नहीं हुआ।।२९।।

अधुना तव वाक्येन जानेऽहं न सुरेश्वरि ॥ समाहूताऽस्मि रुद्रेण किं वा स्वच्छन्दतः शुभे ॥ ३० ॥

हे सुरों की स्वामिनि! इस समय मैं यह नहीं जानती कि भगवान रुद्र ने मुझे आपकी आज्ञा से बुलाया है या मात्र अपनी इच्छा से?।।३०।।

त्रैलोक्यस्य प्रभुरयं तन्निष्क्रम्य कथञ्चन ॥ तस्मादत्रैव संप्राप्ता सत्यमेतन्मयोदितम् ॥ ३१ ॥

आपके प्राणेश्वर तीनों लोकों के स्वामी हैं। इसलिए उनकी आज्ञा के सम्मान हेतु मैं किसी प्रकार निकलकर यहां आयी हूं। यह मैं सत्य कह रही हूं।।३१।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले—

॥ तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा ततो देवी प्रहर्षिता ॥
प्रोवाच मधुरं वाक्यं सत्यमेतत्त्वयोदितम् ॥ ३२ ॥

श्रीगंगा जी के उन सामयुक्त वचनों को सुनकर भगवती पार्वती अत्यन्त प्रसन्न हुईं कि गंगा जी ने मेरे स्वामी की आज्ञा का पालन करके उनका मान ही बढाया है। और मधुर वचन बोलीं कि गंगे! तुमने यह सब सत्य ही कहा है।।३२।।

तस्माद्वरय भद्रं ते वरं मत्तो यथेप्सितम् ॥
मुक्त्त्वैकं पतिधर्म्मत्वे मम कांतं महेश्वरम् ॥ ३३ ॥

इसलिए हे कल्याणि! पतिधर्म अर्थात् एकपत्नीव्रत में स्थित एक मेरे प्रियतम भगवान् शिव को छोड़कर तुम मुझसे जैसा चाहो वैसा दूसरा सुंदर वर मांग लो‌।।३३।।

॥ गंगोवाच ॥

श्रीगंगा जी बोलीं–

अपि दौर्भाग्ययुक्ताऽहं भार्या जाताऽस्मि शूलिनः॥ तस्मादेकं दिनं देहि क्रीडनार्थमनेन तु ॥ ३४ ॥

हे देवि! मैं दुर्भाग्यशालिनी हूं; क्योंकि आपकी अनुमति के विना मैं त्रिशूलधारी भगवान् शिव की पत्नी बन चुकी हूं। इसलिए इनके साथ एक दिन की क्रीड़ा का समय मुझे प्रदान करें।।३४।।

चैत्रशुक्लत्रयोदश्यामहोरात्रं सुरेश्वरि ॥
शिवकुण्डं तथास्त्त्वेतन्मया यस्मात्समावृतम् ॥३५॥

हे सुरेश्वरि! चैत्र शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि में चलने वाली इस क्रीड़ा का स्थान यह शिव कुण्ड ही हो; क्योंकि इसे मैंने अपने जल से भर रखा है।।३५।।

शिवगङ्गाभिधानं च तस्मात्कुण्डं धरातले ॥
ख्यातिं यातु प्रसादेन तव पर्वतनन्दिनि ॥३६॥

और हे नगाधिराज हिमालय को प्रसन्न करने वाली देवि! आपके अनुग्रह से यह कुण्ड इस धरती पर
” शिवगंगा” के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त करे।।३६।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले–

॥ एवमस्त्विति सा देवी प्रोच्य गङ्गां महानदीम् ॥ ततो विसर्जयामास तामालिंग्य मुहुर्मुहुः ॥ ३७ ॥

उन देवनदी भगवती गंगा जी को ” तथास्तु”(वैसा ही हो)- कहकर जगज्जननी पार्वती जी ने वार वार उन्हें अपने भुजपाश में बांधकर अर्थात् गले लगाकर विदा किया ।।३७।।

गतायामथ गङ्गायामधोवक्त्रं सुलज्जितम् ॥
पाणी गृह्य ययौ रुद्रं भ्रममाणा गृहं प्रति ॥३८॥

गंगा जी के चले जाने पर लज्जा से मुंह लटकाये हुए अपने पति भगवान् भव का हाथ पकड़कर भगवती अपने धाम लौटीं। इससे यह शिक्षा मिलती है कि पति की गलतियों पर ध्यान न देकर पत्नी उसे सांत्वना दे। तो दाम्पत्य जीवन सुखमय ही रहता है। ।।३८।।

एवमेतत्पुरावृत्तं तस्मिन्कुण्डे नराधिप ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन चतुर्दश्यां समाहितः ॥ ३९ ॥

है नरराज! उस शिव कुण्ड पर इस प्रकार की घटना घटी थी। इसलिए पूर्ण प्रयास करते हुए एकाग्र चित्त से चतुर्दशी तिथि को ।।३९।।

शुक्लायां चैत्रमासे तु स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ सांनिध्याद्देवदेवस्य गंगायाश्च नृपोत्तम ।॥ ४० ॥

जो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में पड़ती हो। हे राजेन्द्र! उस समय श्रीगंगा जी और देवों के देव भगवान् शंकर का सान्निध्य होने से प्राणी वहां स्नान करें।।४०।।

यत्र संक्षयमायाति सर्वं तत्राशुभं कृतम् ॥
तत्र यो वृषभं दद्याद्भाह्मणाय नृपोत्तम ।॥ तद्रोमसंख्यया स्वर्गे स पुमान्वसति ध्रुवम् ॥४१॥

जहां पर स्नान करने से यत्र तत्र किये गये सभी अशुभ कर्मों का पूर्णतया विनाश हो जाता है। हे राजेन्द्र! उस शिव कुण्ड पर जो मनुष्य ब्राह्मण के लिए बैल का दान करेगा । वह उस वृषभ के जितने रोओं की संख्या है। उतने वर्ष पर्यंत स्वर्ग में निश्चित ही निवास करेगा।।४१।।

इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे शिवगङ्गाकुण्डोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” शिवगंगाकुण्डोत्पत्ति तीर्थ” के माहात्म्य का वर्णन करने वाला ३८ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

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