अध्याय-४१, मार्कण्डेयाश्रम की उत्पत्ति का माहात्म्य

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले– 

 ॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ मार्कण्डेयस्य चाश्रमम् ।।

 यत्र पूर्वं तपस्तप्तं मार्कण्डेन महात्मना ॥ १ ॥

हे राजेन्द्र ! तत्पश्चात् प्राणी मार्कण्डेय आश्रम जाय। जहां पूर्वकाल में महात्मा मार्कण्डेय ने वड़ा कठोर तप किया था। मृकण्डस्सायम् ( यह मृकण्ड का है ) विग्रह में ” तस्येदम्” तद्धितसूत्र से “अण्” प्रत्यय होकर ‘मार्कण्ड’ बनता है ।।१।।

मृकण्डो ब्राह्मणो नाम पुराऽऽसीच्छंसितव्रतः ॥

अन्ते वयसि संजातस्तस्य पुत्रोऽतिसुन्दरः ॥ २ ॥

बहुत पहले उत्तम व्रत का पालन करने वाले मृकण्ड नामक ब्राह्मण हुए। वृद्धावस्था में उनके यहां एक अत्यंत सुंदर पुत्र का जन्म हुआ।।२।।

 सर्वलक्षणसम्पूर्णः शान्तः सूर्यसमप्रभः ॥ कस्यचित्त्वथ कालस्य तस्याश्रमपदे नृप ॥ ३ ॥

हे नृप! वह बालक समस्त शुभ लक्षणों से परिपूर्ण, शान्त स्वभाव और सूर्य के समान तेजस्वी था।कुछ समय बाद मृकण्ड के आश्रम प्रदेश में ।।३।।

आगतो ब्राह्मणो ज्ञानी कश्चित्सामुद्र‌विच्छुभः ॥ ततोऽसौ क्रीडमानस्तु बालकः पञ्चवार्षिकः ॥ ४ ॥

कोई सामुद्रिक शास्त्र का ज्ञाता,अच्छा, ज्ञानी ब्राह्मण आया। वहां उसने खेलते हुए पांच वर्ष के बालक को देखा।।४।।

आनासाग्रशिखाग्राभ्यां चिरं चैवावलोकितः ॥ ततोऽहसत् स सहसा तं मृकण्डो ह्यलक्षयत् ॥ ५ ॥

उस विप्र ने उसे नाक से लेकर शिखा पर्यंत देर तक देखा। उसके बाद सहसा वह हंसा। उसे हंसते हुए महर्षि मृकण्ड ने देखा ।।५।।

अथाऽब्रवीच्चिरं दृष्टस्त्वया पुत्रो मम द्विज ॥ 

ततो हसितवान् भूयः किमिदं कारणं वद ॥ ६ ॥

मुनि बोले। हे विप्रवर ! आपने मेरे पुत्र को देर तक देखा और देखने के बाद पुनः हंसने लगे। इसका क्या कारण है? ।।६।।

असकृत् स मृकण्डेन यावत्पृष्टो द्विजोत्तमः ॥ 

उपरोधवशात्तस्मै यथार्थ संन्यवेदयत् ॥ ७ ॥

महर्षि मृकण्ड ने उस ब्राह्मणश्रेष्ठ से वार वार पूंछा तो उनके आग्रहवशात् विप्र ने उन्हें यथार्थ रहस्य बतलाया ।।७।।

अस्य बालस्य चिह्नानि यानि काये द्विजोत्तम । अजरश्चामरश्चैव तैर्भवेत्त्पुरुषः किल ॥ ८ ॥

हे द्विजवर! इस बालक के देह में जो लक्षण दिख रहे हैं। उनसे पुरुष निश्चित ही अजर और अमर हो जाता है।।८।।

षण्मासेनास्य बालस्य नूनं मृत्युर्भविष्यति ॥ एतस्मात्कारणाद्धास्यं मयाऽकारि द्विजोत्तम ॥

अनृतं नोक्तपूर्वं मे वैरिष्वपि कदाचन ॥ ९ ॥ 

किन्तु इस शिशु की ६ मास में निश्चित ही मृत्यु हो जायेगी। इसीलिए मैं हंसा। मैंने कभी अपने शत्रुओं से भी मिथ्या वचन नहीं कहा है।।९।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले– 

॥ एवमुक्त्वा तु स ज्ञानी उषित्वा तत्र शर्वरीम् ॥ मृकण्डेनाभ्यनुज्ञात इष्टं देशं जगाम ह ॥ १० ॥

ऐसा कहकर वह ज्ञानी उस आश्रम में रात्रि भर निवास करके महर्षि मृकण्ड की अनुमति लेकर अपने अभीष्ट देश को चला गया।।१०।।

मृकण्डोपि सुतं ज्ञात्वा ततः क्षीणायुषं नृप ॥ पंचवार्षिकमप्यार्त्तश्चकारोपनयान्वितम् ॥ ११ ॥

हे राजन्! मृकण्ड अपने पुत्र को इसकी आयु क्षीण हो गयी है – ऐसा समझकर बडे दु: की हुए और उन्होंने पांच वर्ष का होने पर भी उसका उपनयन करा दिया। जबकि ब्राह्मण बालक का उपनयन आठवें वर्ष में होता है। वस्तुत: बालक को ब्रह्मतेजस्वी बनाना हो तो पांच वर्ष में ही उपनयन करवा देना चाहिए।। ऐसा ही मनु आदि स्मृतियों का निर्देश है।।११।।

श्रुताध्ययनसंपन्न यं यं पश्यसि चाग्रतः ॥ तस्याभिवादनं कार्य त्वया पुत्रक नित्यशः ॥ १२ ॥

मृकण्ड ने पुत्र से कहा । हे पुत्र ! जिस जिस को वेदाध्ययन से संपन्न देखो। उस उस को प्रतिदिन प्रणाम किया करो।। १२।।

ततश्चक्रे ब्रह्मचारी पितुर्वाक्यं विशेषतः ॥ १३ ॥

पिता की आज्ञा मानकर वह ब्रह्मचारी पुत्र विशेष ध्यान रखकर वैसा ही करने लगा।।१३।।

बालं वृद्धं युवानं च यं यं पश्यति चक्षुषा ॥ नमस्करोति तं सर्वं ब्राह्मणं विनयान्वितः ॥ १४ ॥

वह बालक, वृद्ध, युवा जिस जिस को आंखों से देखता। उन सभी विप्रों को विनयपूर्वक नमस्कार करता रहता था।।१४।।

कस्यचित्त्वथ कालस्य तस्याश्रमसमीपतः ॥

सप्तर्षयः समायातास्तीर्थयात्रापरायणाः ॥ १५ ॥

कुछ समय बाद तीर्थयात्रा करते हुए सप्तर्षि मृकण्ड ऋषि के आश्रम के समीप आये।।१५।।

 अथ तान्सत्त्वरं गत्वा वन्दयामास पार्थिव ॥

 बालः स विनयोपेतः सर्वांश्चैव यथाक्रमम् ॥ १६ ॥

हे भूपते! वह विनम्र बालक शीघ्र ही जाकर : उन सबको क्रमश: प्रणाम किया।।१६।।

दीर्घायुर्भव तैरुक्तः स बालस्तुष्टितत्परैः ॥

आस्थिताश्च यथाभीष्टं देशं बालं विसज्य तम् ॥१७॥

प्रसन्न होकर उन सातों ऋषियों ने उसे आशीष दिया कि तुम दीर्घायु हो जाओ। ऐसा कहकर उस बालक से विदा लेकर अपने अभीष्ट तीर्थ की ओर प्रस्थान हेतु तैयार हुए।।१७।।

तेषां मध्येंऽगिरानाम दिव्यज्ञानसमन्वितः ॥ तेनावलोकितो बालः सुक्ष्मदृष्टया परन्तप ॥ १८ ॥

हे शत्रुओं को संतप्त करने वाले वीर राजन्! उन ऋषियों के मध्य दिव्यज्ञान से संपन्न एक अंगिरा नामक महर्षि ने सूक्ष्म दृष्टि से बालक को देखा।।१९।।

 अथ तानब्रवीत्सर्वान्मुनीन्किञ्चित्सविस्मयः ॥ दीर्घायुर्न च बालोऽयं युष्माभिः संप्रकीर्त्तितः ॥१९॥

उन्होंने कुछ हंसते हुए उन सभी ऋषियों से कहा -” यह बालक दीर्घायु नहीं है और आप सबने इसे दीर्घायु का आशीर्वाद दे दिया ।।१९।।

 गमिष्यति कुमारोऽयं निधनं पञ्चमे दिने ॥

तन्न युक्तं हि नो वाक्यमसत्यं द्विजसत्तमाः ॥२०॥

आज से पांचवें दिन यह बालक मर जायेगा। जिससे आप जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों का आशीष मिथ्या हो जायेगा। और ऐसा कथमपि उचित नहीं है।‌२०।।

 यथाऽयं चिरजीवी स्यात्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥

अथ ते मुनयो भीता मिथ्या वाक्यस्य पार्थिव।।२१।।

जैसे भी यह दीर्घकाल तक जीवित रहे। वैसी नीति अपनानी चाहिए। हे राजन्! ‌वे मुनि अपनी वाणी के मिथ्या होने के भय से डर गये।।२१।।

 बालकं तं समादाय ब्रह्मलोकं गतास्तदा ॥

 तत्र दृष्ट्वा चतुर्वक्त्रं नमश्चक्रुर्मुनीश्वराः ॥ २२ ॥

वे सब उस बालक को लेकर ब्रह्मा जी के लोक पहुंचे। और वहां चतुर्मुख ब्रह्मा जी को देखकर उन्हें नमन किया ।।२२।।

तेषामनन्तरं तेन बालकेनाभिवादितः ॥ 

दीर्घायुर्भव तेनाऽपि ब्रह्मणोक्तः स बालकः ॥२३॥

तत्पश्चात् उस बालक ने भी ब्रह्मा जी को नमस्कार किया। प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने कहा–” दीर्घायु हो “

।।२३।‌

ततः सप्तर्षयो हृष्टाः स्वचित्ते नृपसत्तम ॥ सुखासीनान् स विश्रान्तानमुनीन् मुनिपुंगवान्॥२४॥

हे राजेन्द्र ! तब सप्तर्षि अपने मन में बड़े प्रसन्न हुए।मुनियों में श्रेष्ठ वे श्रममुक्त ऋषि जब सुखपूर्वक बैठे गये तो उनसे ।।२४।।

 ॥ ब्रह्मोवाच ॥

ब्रह्मा जी बोले–

॥ परिपृच्छत किं कार्यं कुतो यूयमिहागताः ॥२५॥

ब्रह्मा जी ने पूछा।आप सबके आगमन का प्रयोजन क्या है? आप सब कहां से आ रहे हैं ? यहां “परिपृच्छत” आर्ष प्रयोग है।।२५।।

 ॥ ऋषय ऊचुः ॥ 

ऋषिगण बोले–

 तीर्थयात्रा प्रसङ्गेन भ्रममाणा महीतलम् ॥ 

अर्बुदं पर्वतं नाम तस्य तीर्थेषु वै गताः ॥ २६ ॥

तीर्थयात्रा के प्रसंग में हम लोग भ्रमण करते हुए आबू पर्वत पहुंचे और वहां के तीर्थों में भ्रमण करने लगे।।२६।।

अथागत्य द्रुतं दूराद्बालेनानेन वन्दिताः ॥ 

दीर्घायुर्भव संदिष्टस्ततश्चायमनेकधा ॥

 पञ्चमे दिवसेऽस्यापि मृत्युर्देव भविष्यति ॥२७॥

वहां दूर से दौड़ते हुए आकर इस बालक ने हम सबको प्रणाम किया और हम सबने इसे दीर्घायु होने का आशीष दिया। बाद में अनेक प्रकार से विचार किया तो ज्ञात हुआ कि आज से पांचवें दिन इसकी मृत्यु हो जायेगी।।२७।।

यथा वयं त्वया सार्द्धर्मसत्या न चतुर्मुख ॥ भवामोऽस्य कृते देव तथा किञ्चिद्विधीयताम्॥२८ ॥ 

हे प्रभो चतुरानन ब्रह्मा जी ! अब आपके साथ हम लोग जैसा भी हो । असत्यवादी सिद्ध न हों। हे देव! इस बालक के लिए वैसा कुछ अवश्य करना चाहिए।।२८।।

 अथ ब्रह्मा प्रहृष्टात्मा दृष्ट्वा तं मुनिदारकम् ॥ मत्प्रसादादयं बालो भावी कल्पायुरब्रवीत् ॥ २९ ॥

उसके बाद ब्रह्मा जी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने उस मुनिपुत्र को देखकर कहा कि मेरे अनुग्रह से यह बालक अल्पायु नहीं अपितु कल्पायु होगा अर्थात् कल्प पर्यंत लंबी इसकी आयु होगी ।।२९।।

 ततस्ते मुनयो हृष्टात्तमादाय गृहं प्रति ।।

 प्रस्थिता ब्रह्मलोकात्तु नमस्कृत्वा चतुर्मुखम् ॥३०॥

तत्पश्चात् वे सप्तर्षि अत्यंत प्रसन्न हुए और ब्रह्मा जी को नमस्कार करके ब्रह्मलोक से उस बालक को लेकर उसके घर की ओर प्रस्थान किये।।३०।।

अथ तस्य पिता तत्र मृकण्डो मुनिसत्तमः ॥

 ततो भार्यासमायुक्तो विललाप सुदु:खित: ।। ३१।।

इधर पुत्र को परलोक गया देखकर मुनिवर मृकण्ड अपनी पत्नी के साथ अत्यंत दु:खी होकर विलाप करने लगे।।३१।।

हा पुत्र पुत्र करुणं रुदित्वा धर्मवत्सलः ॥

अनामन्त्र्य च मां कस्माद्दीर्घपन्थानमाश्रितः॥३२॥

वे धर्मवत्सल मुनि हे पुत्र! हे पुत्र! तुम मुझसे विना पूछे क्यों इतने लंबे मार्ग का आश्रय लिये। जिससे लौटकर आया नहीं जा सकता। इस प्रकार भांति भांति के करुण विलाप कर रहे थे।।३२।।

अकृत्वापि क्रिया: कार्या: कथं मृत्युवशं गतः ॥

सोऽहं त्वया विना पुत्र न जीवामि कथञ्चन ॥ ३३ ॥

तुम वेदाध्ययन, अग्निहोत्रादि जीवन की मुख्य क्रियाओं को किये विना ही मृत्यु के अधीन कैसे हो गये? हे पुत्र ! तुम्हारे विना मैं किसी भी प्रकार जीवित नहीं रह सकता।।३३।।

एवं विलपतस्तस्य बहुधा नृपसत्तम ॥ बालश्चाभ्यागतस्तत्र यत्र देशे पुरा स्थितः ॥ ३४ ॥

हे राजेन्द्र! इस प्रकार वे मुनि अनेक भांति विलाप कर ही रहे थे कि उनका वह बालक उस स्थान पर पहुंचा। जहां वह पहले विद्यमान था ।।३४।।

 अथासौ प्रयुयौ बालः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥

 तं दृष्ट्वा पथि तातश्च संप्रहृष्टो बभूव ह ॥ ३५ ॥

फिर वह बालक प्रसन्न मन से पिता के समीप आया। उसको मार्ग में आते हुए देखकर उसके पिता अत्यंत प्रसन्न हुए।।३५।।

पप्रच्छ किं समारोप्य चिरागमनकारणम् ॥ 

ततः स कथयामास सर्वं मुनिविचेष्टितम् ॥ 

दर्शनं ब्रह्मलोकस्य पद्मयोनेर्वरं तथा ॥ ३६ ॥ 

और उसे गोद में बिठाकर पूछे कि इतने विलंब से आने का कारण क्या है? तत्पश्चात् उसने अपने विषय में किये गये सप्तर्षियों के संपूर्ण क्रियाकलापों जैसे ब्रह्मलोक का दर्शन और श्रीब्रह्मा जी से प्राप्त कल्पपर्यंत दीर्घायु की बात पिता को बतलायी।।३६।।

॥ बालक उवाच ॥ 

बालक बोला–

॥ अजरश्चामरच्चाहं कृतस्तात् स्वयम्भुवा ।। तस्मात्सत्यं मदर्थे ते व्येत्वसौ मानसो ज्वरः ॥३७॥

हे तात! श्रीब्रह्मा जी द्वारा मैं अजर और अमर बना दिया गया हूं। यह ध्रुव सत्य है। इसलिए मेरे लिए जो आपका मानसिक दु:खरूपी ज्वर है। वह अब शान्त हो जाय ।।३७।।

सोऽहमाराधयिष्यामि तथैव चतुराननम् ॥ कृत्वाऽऽश्रमपदं रम्यमर्बुदे पर्वतोत्तमे ॥ ३८ ॥

पिता से ऐसा कहकर बालक ने अपने जीवन का उद्देश्य बतलाया कि अब मैं इस उत्तम आबू पर्वत पर आश्रम में सुंदर रमणीय ब्रह्मा जी का स्थान बनाकर उनकी आराधना करूंगा।।३८।।

अमृतस्रावि तद्वाक्यं श्रुत्वा पुत्रस्य स द्विजः ॥ मुकण्डो हर्षसंयुक्तो वाचमित्यब्रवीच्च तम् ॥ ३९ ॥

महर्षि मृकण्ड पुत्र की अमृतमयी वाणी सुनकर अति हर्षित हुए और उससे बोले। पुत्र ! यह ब्रह्मा जी का आराधनरूपी कार्य अत्युत्तम है ।।३९।।

मार्कण्डोऽपि द्रुतं गत्वा रम्यमर्बुदपर्वतम् ॥

 तपस्तेपे सुविस्तीर्णं ध्यायन्देवं पितामहम् ॥४०॥

मार्कण्डेय भी रमणीय आबू पर्वत के विशेष भूभाग पर जाकर आश्रम बनाकर पितामह ब्रह्मा का ध्यान करते हुए दीर्घकाल तक ऐसा कठोर तप किये। जिसका प्रचंड तेज समस्त लोकों में व्याप्त हो गया।यहां मार्कण्डेय और मार्कण्ड शब्द समानार्थक हैं।मृकण्डस्सायम् ( यह मृकण्ड का है ) विग्रह में ” तस्येदम्” तद्धितसूत्र से “अण्” प्रत्यय होकर ‘मार्कण्ड’ बनता है। और मृकण्डस्यापत्यम् ( यह मृकण्ड की सन्तान है) इस विग्रह में ” शुभ्रादिभ्यश्च”-४/१/१२३ सूत्र से ‘ ढक्’ प्रत्यय होकर ” मार्कण्डेय” बनता है‌।।४०।।

तस्याश्रमपदे पुण्ये श्रावणे मासि पार्थिव ॥ पौर्णमास्यां विशेषेण यः कुर्यात्पितृतर्पणम् ॥ पितृमेधफलं तस्य सकलं स्यादसंशयम् ॥४१॥

हे पृथिवीपते! उनके आश्रम में किसी भी स्थान पर श्रावण मास की पूर्णिमा को यदि कोई व्यक्ति अपने पितरों के लिए तर्पण करता है। तो उसे पितृमेध का संपूर्ण फल प्राप्त होता है। इसमें कोई संशय नहीं है।।४१।।

ऋषियोगेन यस्तत्र तर्पेयेद्राह्मणोत्तमान् ॥

 ब्रह्मलोके चिरं वासस्तस्य संजायते नृप ॥४२॥

हे महाराज ! वहां महर्षि मार्कण्डेय कल्पपर्यंत जीवित रहने वाले हैं। इसलिए उस आश्रम में उनका संबंध होने से जो कोई वहां उत्तम ब्राह्मणों को भोजन वस्त्र दक्षिणादि से तृप्त करता है। तो उसका चिरकाल तक ब्रह्मलोक में वास होता है।‌४२।।

 यः स्रानं कुरु‌ते तत्र सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः ।॥ नाल्पमृत्युभयं तस्य कुले क्वापि प्रजायते ॥४३॥

जो वहां पूर्ण श्रद्धा के साथ स्नान करता है। उसके कुल में कहीं भी अल्पमृत्यु का भय उत्पन्न नहीं होता।।४३।।

 इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीति साहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे मार्कण्डेयाश्रमपदोत्पत्तिवर्णनं

नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४१॥ 

 

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” मार्कण्डेयाश्रम के माहात्म्य” का वर्णन करने वाला ४१ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

 

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