अध्याय –५५, रुद्रह्रद तीर्थ का माहात्म्य

 ॥ पुलस्त्य उवाच ॥ 

महर्षि पुलस्त्य बोले– 

॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ पुण्यं रुद्रह्रदं शुभम् ॥

 यत्र स्नातो नरो भक्त्या गणाधीशत्वमाप्नुयात् ॥१॥

हे महाराज! तत्पश्चात् प्राणी पुण्यमय शुभ तीर्थ रुद्रह्रद जाय। जहां भक्तिपूर्वक स्नान करने से मनुष्य गणपति पद को प्राप्त करता है।।१।।

 पुरा हत्वाऽधिकं दैत्यं सगणो वृषभध्वजः॥

 ततः स्नातो ह्रदं कृत्वा ततो रुद्रह्रदोऽभवत् ॥२॥

पूर्वकाल में अपने गणों के साथ भगवान् वृषभध्वज शिव ने रणभूमि में बहुत अधिक दैत्यों का वध किया। उसके बाद भगवान् रुद्र ने आबू पर्वत में ह्रद का निर्माण करके उसमें स्नान किया।‌ इसलिए वह तीर्थ “रुद्रह्रद” नाम से विख्यात हुआ।।२।।

 चतुर्दश्यां महाराज यस्तत्र कुरुते नरः ॥

 स्रानं तस्य भवेत्पुण्यं सर्वतीर्थसमुद्भवम् ॥३॥ 

हे महाराज! जो मनुष्य चतुर्दशी तिथि को उसमें स्नान करता है। उसे संपूर्ण तीर्थों में स्नान करने का जो फल है। उसे प्राप्त करता है ।।३।।

इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे रुद्रह्रदमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” रुद्रह्रद तीर्थ ” के माहात्म्य का वर्णन करने वाला ५५ वां अध्याय पू‌र्ण हुआ।।

 

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