अध्याय -५४, त्रिपुष्कर तीर्थ का माहात्म्य

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

 

महर्षि पुलस्त्य महाराज ययाति से बोले–

 

 ॥ ततस्त्रिपुष्करं गच्छेदभीष्टं पद्मजस्य च ।। 

ब्रह्मणा तत्समानीतं पर्वतेऽर्बुदसंज्ञके ॥ १ ॥

 

हे नृपेन्द्र ! तत्पश्चात् प्राणी ब्रह्मा जी को प्रिय त्रिपुष्कर तीर्थ जाय। इस आबू नामक पर्वत पर उसे ब्रह्मा जी ही लाये थे।।१।।

 

 वसिष्ठस्य पुरा सत्रे वर्त्तमाने नराधिप ॥ 

तस्मिन्नगे समायाता ब्रह्माद्याश्च सुरोत्तमाः ॥ २ ॥

 

कब लाये? – इस शंका का समाधान पुलस्त्य जी कर रहे हैं। हे राजेन्द्र ! बहुत पहले महर्षि वशिष्ठ का सत्र= यज्ञ चल रहा था। उस समय ब्रह्मा आदि सभी श्रेष्ठ देवता उस आबू पर्वत पर पधारे।।२।।

 

 प्रतिज्ञातं महाराज ब्रह्मणाऽव्यक्तजन्मना ॥ यावत्स्थास्ये नृलोकेऽस्मिंस्तावत्सन्ध्यां त्रिपुष्करे ॥ वंदयिष्यामि संप्राप्ते संध्याकाले समाहितः ॥ ३ ॥

 

उस समय ब्रह्मा जी ने प्रतिज्ञा की कि जब तक मैं इस मनुष्य लोक में रहूंगा। तब तक संध्या काल आने पर मैं त्रिपुष्कर तीर्थ में ही संध्या वंदन करूंगा।।३।।

 

 एतस्मिन्नेव काले तु प्रस्थितः पुष्करं प्रति ॥

 संध्यार्थं पद्मजो यावद्वसिष्ठस्तावदब्रवीत् ॥ ४ ॥ 

 

जब संध्याकाल आया तो ब्रह्मा जी पुष्कर तीर्थ की ओर संध्या वंदन के लिए प्रस्थान करने लगे। तब महर्षि वशिष्ठ ने उनसे कहा ।।४।।

 

॥ वसिष्ठ उवाच ॥ 

 

वशिष्ठ जी ब्रह्मा जी से बोले–

 

कर्मकालश्च सम्प्राप्तो यज्ञेऽस्मिन्सुरसत्तम ॥ 

स विना न त्वया देव सिद्धिं यास्यति कर्हिचित् ॥ ५ ॥

 

हे सुरश्रेष्ठ! मेरे द्वारा अनुष्ठीयमान इस यज्ञ में कर्म संपन्न करने का समय आ चुका है। हे देव ! यह यज्ञ आपके विना किसी भी प्रकार से संपन्न नहीं हो सकता ।।५।।

 

 तस्मादानय चात्रैव पद्मयोने त्रिपुष्करम् ॥ संध्योपास्तिं ततः कृत्वा तत्र भूयः सुरेश्वर ॥

 ब्रह्मत्वं कुरु देवेश सत्रे चास्मिन्दयानिधे ॥ ६ ॥

 

इसलिए हे पद्मजन्मा ब्रह्मा जी ! आप त्रिपुष्कर तीर्थ को अपने संकल्प बल से यहीं ले आयें। और उसमें संध्योपासन करके हे सुरों के स्वामी ! हे दयासागर ! आप इस यज्ञ में ब्रह्मा का पद सम्हालें।।६।।

 

 एवमुक्तो वसिष्टेन ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

 ध्यात्वा तत्रानयामास ज्येष्ठमध्यकनिष्ठकम् ॥ पुष्करत्रितयं चागात्सुपुण्ये सलिलाशये ॥ ७ ॥ 

 

जब इस प्रकार वशिष्ठ जी ने कहा। तो लोकपितामह ब्रह्मा जी उस त्रिपुष्कर तीर्थ का ध्यान किये। उनके ध्यान करते ही ज्येष्ठ, मध्यम, और कनिष्ठ इस तीन प्रकार के भेद वाला वह त्रिपुष्कर तीर्थ वहां के पुण्यमय जलाशय में आ गया ।।७।।

 

ततः प्रभृति संजातमर्बुदेऽ स्मिंस्त्रिपुष्करम् ॥ ८ ॥

 

उस समय से लेकर वह त्रिपुष्कर तीर्थ आबू पर्वत में स्थित हुआ।।८ ।।

 

 तत्र यः कार्तिके मासि पौर्णमास्यां समाहितः ॥

 स्रानं करोति दानं च तस्य लोकाः सनातनाः ॥ ९ ॥

 

उस त्रिपुष्कर तीर्थ में जो मनुष्य कार्तिक मास की पूर्णिमा को एकाग्रचित्त होकर स्नान करता है। दान देता है। उसे सनातन लोकों की प्राप्ति होती है।।९।।

 

 तस्य चोत्तरदिग्भागे सावित्रीकुण्डमुत्तमम् ।। ज्ञानदानादिकं कुर्वन्यत्र याति शुभां गतिम् ॥ १० ॥

 

उस त्रिपुष्कर तीर्थ के उत्तर दिशा में अत्युत्तम ‘ सावित्री कुंड’ विद्यमान है। जहां ज्ञान, दानादि करने से प्राणी सद्गति को प्राप्त होता है।।१०।।

 

 इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां 

संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृत्तीयेऽर्बुदखण्डे त्रिपुष्करमाहात्म्यवर्णनं नाम चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥

 

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” त्रिपुष्कर तीर्थ ” के माहात्म्य

का वर्णन करने वाला ५४ वां अध्याय पू‌र्ण हुआ।।

 

व्याख्याता– आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य

सर्वेश्वर श्रीरघुनाथ मन्दिर, जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य पीठ, नक्की लेक, सिरोही, राजस्थान 

 

 

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