अध्याय -59, महौजसतीर्थ का माहात्म्य

पुलस्त्य उवाच ॥

महर्षि पुलस्त्य बोले–

ततो महौजसं गच्छेत्तीर्थ पातकनाशनम् ॥ यस्मिन्स्नातो नरो राजंस्तेजसा युज्यते ध्रुवम् ॥ ब्रह्महत्याग्निना शक्रः पुरा दैन्यं परं गतः ॥ १ ॥

तत्पश्चात् मनुष्य समस्त पापों को नष्ट करने वाले महौजस तीर्थ की ओर प्रस्थान करे । हे राजन् ! उसमें स्नान करने से व्यक्ति तेज से संपन्न हो जाता है। पूर्वकाल में ब्रह्महत्यारूपी प्रचंड अग्नि से दग्ध होकर देवराज इंद्र बड़े दीन हीन हो गये थे।।१।।

निःश्रीकस्तेजसा हीनो दुर्गन्धेन समन्वितः ॥ परित्यक्तः सुरैः सर्वैर्विषादं परमं गतः ॥ २ ॥

वे श्रीहीन होने के साथ ही तेजहीन भी हो चुके थे। और उनके शरीर से दुर्गंध भी आने लगी थी। इसलिए संपूर्ण देवताओं ने उनका परित्याग कर दिया। जिससे वे बहुत विषादग्रस्त हो गये।।२।।

ततः पप्रच्छ देवेन्द्रो द्विजश्रेष्ठं बृहस्पतिम् ॥ भगवंस्तेजसो वृद्धिः कथं स्यान्मे यथा पुरा ॥ ३ ॥

तत्पश्चात् देवराज ने द्विजश्रेष्ठ गुरु वृहस्पति से पूछा।
हे भगवन् ! मैं तेजोविहीन हो चुका हूं। मेरे तेज की वृद्धि पहले तजैसे कैसे हो सकती है ? ।।३।।

॥ बृहस्पतिरुवाच ॥

वृहस्पति जी बोले–

॥ तीर्थयात्रां सुरश्रेष्ठ कुरुष्व धरणीतले ॥
तीर्थं विना ध्रुवं वृद्धिस्तेजसो न भविष्यति ॥४॥

हे सुरश्रेष्ठ ! आप भूलोक में जाकर तीर्थयात्रा करें। इतना सुनिश्चित है कि तीर्थों में गये विना आपके तेज की वृद्धि किसी भी प्रकार नहीं हो सकती है।।४।।

ततस्तीर्थान्यनेकानि गत्वा शक्रो नराधिप ।। क्रमेणैवार्बुदं प्राप्तस्तत्र दृष्ट्वा जलाशयम् ॥
स्नानं चक्रे ततः श्रान्तो महौजाः प्रत्यपद्यत ॥ ५॥

हे राजेन्द्र !तत्पश्चात् वे अनेक तीर्थों की यात्रा करते हुए क्रमश: आबू पर्वत पहुंचे। अत्यंत थके हुए देवराज ने वहां एक जलाशय देखकर उसमें स्नान किया । जिसके बल से वे अपने पूर्वकाल के दिव्य तेज को प्राप्त कर लिए।।५।।

दुर्गन्धेन विनिर्मुक्तस्ततो देवैः समावृतः ॥
उवाच प्रहसन्वाक्यं शृणुध्वं सर्वदेवताः ॥ ६ ॥

वे दुर्गंध से भी पूर्णरूपेण छूट चुके थे। तत्पश्चात् सभी देवता उनके समीप आये। उन्होंने हंसते हुए कहा । हे देवगणों आप लोग मेरा वचन सुने।।६।‌

येऽत्र स्नानं करिष्यन्ति प्राप्ते शक्रोच्छ्रये सदा ॥ आश्विने शुक्लपक्षान्ते ते यास्यन्ति परां गतिम् ॥ सुश्रीकाश्च भविष्यन्ति सदा जन्मनि जन्मनि ॥ ७ ॥

देवराज इंद्र को तेजोवृद्धि तथा दुर्गंधक्षय रूपी उच्चता जहां प्राप्त हुई है। ऐसे इस पवित्र जलाशय में जो आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के अन्तिम समय अर्थात् आश्विन मास की पूर्णिमा को स्नान करेंगे। वे निश्चित ही श्रीसंपन्न होने के साथ दैहिक दुर्गंध से भी मुक्त हो जायेंगे ।

यहां देवराज इंद्ररूपी एक स्नानकर्ता पूर्वकालिक है और दूसरा उनसे भिन्न उत्तरकालिक। स्नान का फल दोनों को एक जैसा बतलाया गया है। इससे यह निश्चित हो रहा है कि जो स्नानकाल सभी मनुष्यों के लिए जिस फल के लिए कहा जा रहा है। इससे पूर्व उसी पल को देवराज इंद्र प्राप्त किये हैं। अत एव इंद्र का स्नान काल भी आश्विन मास की पूर्णिमा ही है। 

इति श्रीरुकान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे महौजसतीर्थप्रभाववर्णनं नामैकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” महौजस तीर्थ ” के माहात्म्य का वर्णन करने वाला ५९ वां अध्याय पू‌र्ण हुआ।।

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