ईशावास्योपनिषद्,मन्त्र ५ ब्रह्म की विचित्र शक्तिमत्ता
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य बाह्यतः ।। 5 ..
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् –मुण्डक-1/2, जिससे अविनाशी सत्यस्वरूप परमात्मा का ज्ञान हो उस ब्रह्मविद्या को तत्त्वतः–अज्ञान संशय और विपर्यय का निराश जिस प्रकार हो उस प्रकार प्रोवाच –पुनः पुनः उपदेश करना चाहिए –इसी अभिप्राय को ध्यान में रखकर पूर्व कथित पदार्थों का निर्वचन पुनः कर रहे हैं –तदेजति आदि से ।
तद्–वह ब्रह्म,एजति–चलते हुए जैसा है अर्थात् उसके सर्वत्र व्याप्त होने से चलने का फल अन्य देश का सम्बन्ध वह स्वतः प्राप्त है । तत् -वह परमात्मा ,नैजति–किञ्चित् भी कम्पन नहीं करता ; कम्पन का फल देशान्तर की प्राप्ति उसके सर्वव्यापक होने से स्वतः ही है ।
तद्–वे भगवान्,दूरे–विषयासक्त प्राणियों से दूर हैं –
परांमुखा ये गोविन्दे विषयासक्तचेतसः ।
तेषां तत्परमं ब्रह्म दूराद्दूरतरे स्थितम् । ।
-जो भगवान् से विमुख विषयासक्त चित्त वाले जीव हैं उनसे वे परब्रह्म दूर से भी दूर स्थित हैं अर्थात् ऐसे लोगों के अशुद्ध मन का विषय वे कभी नही बनते ।
और, तद्- वही परमात्मा, उ अन्तिके–भगवत्परायण विषयों में अनासक्त प्राणियों के अति समीप हैं –
तन्मयत्वेन गोविन्दे ये नरा न्यस्तचेतसः ।
विषयत्यागिनस्तेषां विज्ञेयं च तदन्तिके । ।
भगवान् में चित्त लगाने से जो उनमें तन्मय हो चुके हैं ऐसे विषयों में अनासक्त भाग्यशालियों के अति समीपवर्ती हैं वे भक्तानुकम्पी भगवान् ।
परमात्मा का अब द्वितीय वैलक्षण्य बतला रहे हैं –
तद्–वह सर्वव्यापक परमात्मा , अस्य -इन,सर्वस्य–दृश्यादृश्य सभी वस्तुओं के अन्तः –अन्दर है ,और तद्–वही भगवान् ,उ-निश्चित रूप से , अस्य –प्रत्यक्षादि प्रमाणों से परिज्ञात इन, सर्वस्य–सभी वस्तुओं के ,बाह्यतः –बाहर भी हैं । –
अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः । ।
जो वस्तु घर के भीतर है वह बाहर नही रह सकती और जो बाहर है वह घर के भीतर नहीं रह सकती पर परमात्मा की यह विशेषता है कि वे बाहर भीतर सर्वत्र रहते हैं साथ ही आनन्दघन भी हैं ।
मन्त्र की प्रथम पंक्ति से अधिकारी अनधिकारी का दिग्दर्शन कराते हुए सम्पूर्ण वस्तुओं की अन्तरात्मा और सबके नियन्त्रक भगवान् हैं –इस तथ्य को बतलाना मन्त्र का मुख्य प्रयोजन है । जिससे साधक सम्पूर्ण प्राणियों में परमात्मा को देख सके –इसी के लिए –”तदन्तरस्य सर्वस्य” इतना अंश कहा गया है । तथा परमात्मा में सम्पूर्ण प्राणियों को देख सके –इसके लिए –”तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः” अंश है । जैसे समुद्र में बह रही वस्तु अपने बाहर विद्यमान जल के आश्रित रहती है वैसे ही सभी वस्तुओं के बाहर विद्यमान ब्रह्म उन सबका आश्रय है–अत एव सम्पूर्ण वस्तुओं को परमात्मा में देखने का कथन अग्रिम मन्त्र में किया जायेगा ।
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Gaurav Sharma, Haridwar
