ईशावास्योपनिषद्,मन्त्र-3,निष्काम कर्मयोग की अवहेलना से हानि
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महना जनाः ।।३ ।।
पूर्वमन्त्र में भगवत्प्राप्ति का सहायक निष्काम कर्मयोग बतलाया गया । इसकी चरम परिणति उस समय ज्ञानयोग में हो जाती है । जब कर्मयोगी कर्म के समय यह चिन्तन करता है कि इन्द्रियां तथा शरीरादि सम्पूर्ण प्रकृति अपने अपने कार्यों में संलग्न हैं ।
मैं इन सबसे भिन्न सच्चिदाननदघन हूं । इनके किसी भी क्रियाकलाप से मेरा कोई सम्बन्ध नही है। इस प्रकार कर्तृत्वाभिमान से वह निर्मुक्त होकर वह सभी नित्य नैमित्तिक कर्मों काअनुष्ठान क्रमशः करता है ।
भगवदनुरागी शरीरेन्द्रियादि से अपने को भिन्न सच्चिदानन्द समझते हुए चिन्तन करता है कि शरीरेन्द्रियादि सम्पूर्ण प्रकृति तथा आत्मा भगवान का शरीर है । वे ही इन दृश्यमान अपने करण(इन्द्रिय) कलेवर से सम्पूर्ण कार्य कर रहे हैं मैं इन इन्द्रिय शरीरादि में स्वत्व का आरोप करके मिथ्या अहंकार क्यों करूं ।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः-की व्यापकता ऐसे भक्त के हृदय में अवतरित हो जाती है और वह सम्पूर्ण वस्तुओं को भगवन्मय समझकर उनके कैंकर्य की दृष्टि से भावित होकर सभी कार्य करता है जिससे उसे विलक्षण शान्ति और दिव्य अनुभव होते हैं और वह भगवत्कृपा से संसिक्त होकर आगे बढ़ता जाता है ।
इस प्रकार के कर्मयोग का जो अनुष्ठान नही करते उनका मनुष्य जीवन व्यर्थ हो जाता है । और उन्हे बड़ी भारी हानि उठानी पड़ती है ।
असुर्या-असुरसम्बन्धी , नाम -प्रसिद्ध है, ते-वे, लोकाः-सुख दुःख भोग के स्थान, अन्धेन-प्रगाढ, तमसा -अन्धकार से , आवृताः-आच्छादित हैं, ये २८ प्रकार के अन्धतामिस्र आदि नरक हैं । तान्- लोकों को, ते-वे सब लोग, अभिगच्छन्ति -जाते हैं, ये-जो ,के-कोई, च-भी,जनाः-मानव,आत्महनः-आत्मघाती हैं ।
निष्काम कर्मयोग का अनुष्ठान न करने से ऐसे प्राणी पुण्य और पाप के कारण अपने आपको संसारसागर में डुबो देते हैं-यही उनका आत्मघात है ।
अब यहां प्रश्न यह है कि पाताललोक से ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी लोक प्राणी अपने कर्मों से प्राप्त करता है । और वहां से कर्मफल भोगकर पुनः पुनः लौटता है । यहां तक संसार है ।
जिनमें यमलोक नरक को छोड़कर सर्वत्र पुण्यात्मा ही स्वर्गादि लोकों में जाते हैं वे भी आत्मघाती हैं उनका संग्रह नही हो सकता । ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी लोक सकाम कर्मों से प्राप्त होते हैं -ऐसा भागवत के पञ्चम स्कन्ध-२५/१५में भगवान् व्रह्मविद् शुक ने बतलाया है । ये सब २८ नरकों से बाहर हैं ।
अतः विशेष विचार किया जाता है –
लोक शब्द सुख दुःख के भोगस्थान का कथन करने के लिए जैसे प्रयुक्त होता है वैसे ही शरीर का कथन करने के लिए भी । देखें -नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं -पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा ।-भागवत-११/२०/१७,
देवदत्तमिमं लब्ध्वा नृलोकमजितेन्द्रियः ।
यो नाद्रियेत त्वत्पादौ स शोच्यो ह्यात्मवंचकः । ।-भागवत-६३/१४,
इन दोनों वचनो में प्रथम में मानव शरीर का कथन नृदेह शब्द से और दूसरे में उसी का कथन नृलोक शब्द से किया गया । और पहले में आत्महा तथा दूसरे वचन में आत्मवञ्चक का प्रयोग भी समानार्थकता की ओर संकेत करता है । विषय भी एक ही है । अतः मन्त्र में आया “लोक”शब्द देह का वाचक है ।
अब असुर्या पर विचार
गीता में दो प्रकार के सर्गों की चर्चा है-दैव और आसुर ।
मनुष्यसर्ग का अन्तर्भाव इन्ही दोनो में है । दैवी सम्पद् अभय अन्तःकरण की सम्यक् शुद्धि आदि वाले दैवसर्ग में तथा आसुरी सम्पद् अपवित्रता आचारहीनता ( “बफर”भोजन प्रणाली आदि इसका जीता जागता उदाहरण है ) ईश्वर की सत्ता न मानना आदि आसुरी सम्पद् है । इसके अनुष्ठाता असुर होते हैं ।
आसुरी स्वभाव के मानव आसुर सर्ग में तथा दैवी स्वभाव के दैव सर्ग में अन्तर्भूत हैं । यहां जो मानव भक्ति ज्ञान या निष्काम कर्मयोग का आश्रय नही लेते वे आसुर सर्ग के माने जाने से असुर कहे गये हैं । ये केवल देह को पालने पोसने सजाने में लगे रहते हैं । इन्हे आसुर जन कहा गया है –
जना न विदुरासुराः-गीता-१६/७,
असुभ्यः= प्राणेभ्यः-प्राणरक्षाभ्यः रमन्ते इति असुराः-जो केवल अपने प्राणों की रक्षा के लिए ही लेना देना समस्त व्यवहार करते हैं ये असुर हैं अर्थात् ब्रह्मज्ञानविधुर व्यक्ति ।
इनसे सम्बद्ध लोक ब्रह्मा जी तक का लोक है । और ये सब लोक पुनरावर्ती हैं –
आब्रह्मभुवनाल्लोका ः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।-गीता-८/१६,
अतः असुर्य लोक का तात्पर्य ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी लोकों एवं शरीरो से है । ये सभी शास्त्रों में प्रसिद्ध है-
इसे बताने के लिए नाम शब्द का प्रयोग है -नाम ।
ये योनियां और लोक ब्रह्मज्ञानविधुर को अपने कर्म से मिलते हैं ।
यहां ब्रह्म लोक तक प्राप्त होने वाले सभी शरीर भी नृलोक की भांति लोक शब्द से ग्रहण किये गये है । इस तरह आत्मज्ञानशून्य को मिलने वाले सभी लोकों एवं सभी शरीरों का ग्रहण लोक शब्द से हो गया ।
अन्धेन–इति । ये सभी शरीर एवं लोक माया का कार्य होने से नश्वर एवञ्च देहादि में अहंबुद्धि तथा स्वसम्बन्धी वस्तुओं में ममत्वरूपी प्रगाढ अज्ञानात्मक अन्धकार से आच्छादित हैं । इन्हीं सब शरीरों और लोकों को ब्रह्मज्ञानविधुर मरकर प्राप्त करता है ।
इस विवेचन में पूर्वोक्त आपत्तियां नही हैं ।
आत्महनः-इसका सीधा अर्थ आत्महत्यारा है । यह सबसे बड़ा पाप है ।
ब्रह्महत्यादि में मारने वाले को नरक मिलता है पर आत्महत्या में नरक के साथ ही मरने का असीम कष्ट भी स्वयं को ही भोगना पड़ता है । परमात्मा नही है ऐसा समझकर जो आत्मोद्धार के लिए यत्नशील नही होता वह आत्मघाती है –
असन्नेव स भवति असद् ब्रह्म इति वेद चेत् ।-तै.-२/६/९,
असत् अर्थात् जीते ही अपनी सत्ता समाप्त कर लेता है ब्रह्मज्ञानशून्य होने से संसारसागर में स्वयं को डुबो देता है । अतः आत्मघाती है । इसकी बड़ी निन्दा की गयी है –
नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् ।
मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा । ।
-भागवत -११/२०/१७,
लब्ध्वा कथंचित् नरजन्म दुर्लभं तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम् ।
यस्त्वात्ममुक्त्यै न यतेत मूढधीः स आत्महा स्वं विनिहन्त्यसद्ग्रहात् । ।
अतः हम सभी को संसार से मुक्त होने के लिए अभी से यत्नशील हो जाना चाहिए ।
जय श्रीराम
#आचार्यसियारामदासनैयायिक

Gaurav Sharma, Haridwar
