ईशावास्योपनिषद्,मन्त्र12, केवल निषिद्धकर्मत्याग और केवल उपासना का परिणाम

ईशावास्योपनिषद्,मन्त्र12, केवल निषिद्धकर्मत्याग और केवल उपासना का परिणाम

अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते । 

ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः ।।12।। 

पूर्व मन्त्रमें बतलाया गया कि निष्काम कर्म भगवदुपासना जो अन्ततः समाधिरूपा हो जाती है उसका अंग है । अब यह बतला रहे हैं कि निषिद्धकर्म हिंसा चोरी आदि का त्याग भी उपासना का अंग है । इनमें केवल एक का ही अनुष्ठान करने वाला प्राणी क्या प्राप्त करता है ? सुनें —
ये –जो लोग,असम्भूतिं– समाधि के अंग निषिद्ध कर्मों की निवृत्ति( उन्हे करना) भगवान् का अनुभव जिस गहन एकाग्रता में होता है वही स्थिति यहां सम्भूति शब्द से अभिहित है । छान्दोग्य में ऐसे शब्दों का प्रयोग है —

एवमितः प्रेत्य सम्भवितास्मि-3/14/4, (यहां से जाकर मैं ब्रह्म को प्राप्त करूंगा) ब्रह्मलोकमभिसम्भवामि-8/13/1, (मैं शरीर त्यागकर ब्रह्मलोक को प्राप्त होता हूं )

इन दोनों वाक्यों में क्रमशः सम् तथा अभि उपसर्गपूर्वक भू धातु का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ ब्रह्मप्राप्ति सुस्पष्ट है । दूसरे वाक्य से प्रतीत हो रहा है कि साधक समाधि अवस्था में उन बातों को कह रहा है । यही समाधिरूपी स्थिति निदिध्यासन की चरम सीमा है । इसी के अंगरूप में निष्काम कर्म को करते हैं । इसी समाधि का अंग निषिद्ध (अभिमान, दम्भ,हिंसा ,चोरी आदि ) कर्मों का वर्जन भी है । यही असम्भूति शब्द का अर्थ है । 

उपासते–(निषिद्ध कर्म नही) करते हैं.

अतः जो लोग केवल भगवदुपासना की चरम स्थिति को प्राप्त करने के लिए केवल उसके अंगरूप निषिद्ध हिंसा चोरी आदि कर्मों को नही करते तथा भगवान् की उपासना से दूर रहते हैं । वे लोग, अन्धन्तमः –प्रगाढ अन्धकार, (अनेक कूकर सूकर से लेकर इन्द्रादि योनियों तथा पाताल से लेकर संसार में लौटने वाले ब्रह्मा तक के लोक में)

प्रविशन्ति– जाते हैं । जहां अहन्ता ममतारूपी घोर अज्ञानात्मक अन्धकार छाया रहता है ।)

ध्यातव्य –आजकल के कुछ विचारक जो यह कहते हैं कि बुरा कर्म मत करो और अपने काम से काम रखो । भगवान् से क्या लेना देना है –इन्ही बुद्धिजीवियों के लिए ही इस प्रगाढ अन्धकार का कथन है । 

और, ये–जो लोग, हिंसा चोरी दम्भ आदि का परित्याग किये विना ही केवल, सम्भूत्यां–समाधिरूप उत्कृष्ट स्थिति हेतु ,उ–निश्चिन्त होकर, रताः — प्रयास करते हैं, ते –वे लोग, ततो –उससे भी,भूयः–अधिक, इव–उसी के समान, तमः–प्रगाढ अन्धकार, को प्राप्त होते हैं । अर्थात् जब तक बुरे कर्मों का त्याग नही किया जायेगा तब तक ईश्वर में मन ही नहीं लगेगा। अतः इन निषिद्ध हिंसा आदि कर्मों से वह प्राणी कुत्ता बिल्ली जैसी अधम योनियों में जन्म जन्मान्तर तक भटकता रहेगा ।

जो लोग अधाधुन्ध मांस मदिरा का सेवन हिंसा –दंगा फसाद, आतंकवाद में शामिल हैं और जो नेता आदि बनकर देश को लूट रहे हैं ।और अपने को धर्मरक्षक बनने का ढोंग रच रहे हैं। उनकी दुर्गति का डिमडिम घोष इस मन्त्र की द्वितीय पंक्ति कर रही है । 

»»»»»»»»»जय श्रीराम«««««««««

»»»»»»»»»»»»आचार्य सियारामदास नैयायिक«««««««««««

Gaurav Sharma, Haridwar

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