करमाला की विधि तथा शक्ति एवं देवों के जप में करमाला का रहस्य
करमाला की विधि तथा शक्ति एवं देवों के जप में करमाला के भेद
माला के अभाव में करमाला द्वारा जप किया जाता है । इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जरा सी असावधानी हुई कि करमाला द्वारा जप खण्डित हो जाता है । इसमें साधक अधिक जागरूक रहता है । ब्रह्मगायत्री के लिए करमाला को प्रशस्त बताया गया है । हम कोई भी जप करमाला से कर सकते हैं ।
देवियों के मन्त्रजप में करमाला जैसी होगी उससे भिन्न प्रकार की करमाला देवों के मन्त्रजप में बतलायी गयी है ।
यहाँ हम यह बतलाना चाहते हैं कि करमाला से जप जब आरम्भ करें तो किस अंगुली के किस पर्व से शुरु करें और कहाँ तक करें । उस जप में किस अंगुली में सुमेरु होगा जिसका जपकाल में लंघन निषिद्ध है ।
करमाला का अर्थ
कर की अंगुलियों से माला की भाँति जप करने से इसे करमाला कहा जाता है ।अथवा कर की अंगुलियाँ ही माला की तरह कार्य करने से भी इसे करमाला कहते हैं । चूँकि कर की अंगुलियों के पर्वों द्वारा माला की भाँति जप किया जाता है । इसलिए भी इसका करमाला नाम पड़ा –
करांगुलिभिर्मालयेव जपनात् कररूपा माला, करांगुल्य: माला इव करमाला, करपर्वरूपमाला इत्यर्थ: .
मुण्डमाला तन्त्र में सामान्यतया करमाला का निरूपण इस प्रकार है-
अनामिकात्रयं पर्व कनिष्ठात्रितयं तथा । तर्जनीमूलपर्यन्तं करमाला प्रकीर्तिता ।।
अनामिका के तीनों पर्व तथा कनिष्ठिका के तीनों पर्व और तर्जनी का मूल अर्थात् अध: पर्व ( सबसे नीचे वाला पर्व )
पर्यन्त को करमाला कहते हैं । यह शक्ति और उनसे भिन्न सभी देवों के लिए है । पर जप क्रम में पर्वों का भेद होगा । जो आगे सुस्पष्ट करेंगे ।
शक्ति के विषय में करमाला की विधि
इसमें जप अनामिका के मध्य पर्व से आरम्भ करके अध: पर्व से चलते हुए कनिष्ठिका के अध:पर्व, मध्यपर्व, ऊर्ध्वपर्व से अनामिका के ऊर्ध्व पर्व पर होते हुए मध्यमा के ऊर्ध्व पर्व से नीचे उतरते हुए तर्जनी के मूल पर्व तक जायें । तर्जनी का मध्य और ऊर्ध्व पर्व सुमेरु माना गया है । इसका लंघन न करें । अर्थात् उन दोनों पर्वों का जप में उपयोग नहीं लेना है । पुन: तर्जनी के मूल पर्व से वहाँ जैसे गये हैं वैसे ही लौटकर अनामिका के मध्य पर्व पर आकर रुकें । इस प्रकार ५ वार करने से १०० की संख्या में जप हो जायेगा । पुन: अन्त में अनामिका के मूल पर्व से पूर्ववत् मध्यमा के मूल पर्व तक जप करने से १०८ वार जप की संख्या पूर्ण हो जायेगी–
अनामिकात्रयं पर्व कनिष्ठा च त्रिपर्विका । मध्यमायाश्च त्रितयं तर्जनीमूलपर्विका ।।
करमाला समाख्याताआरभ्यानामिकान्तरात् ।-इति शक्तिविषये मुण्डमालातन्त्रम्
तर्जनी के ऊपर एवं मध्य पर्व पर जप करके संख्या की पूर्ति नहीं करनी चाहिए । ऐसा करना निषिद्ध है। इसलिए ऐसे जापक को पापी कहा गया है ।
तर्जन्यग्रे तथा मध्ये यो जपेत् स पापकृत् ।।
-इति शक्तिविषये मुण्डमालातन्त्रम्
शक्ति के मन्त्रों में शेष ८ संख्या का जप
अनामिका के मूल पर्व से शुरु करके पूर्वोक्त क्रम से कनिष्ठिका के पर्वों से होते हुए मध्यमा के मूल पर्व तक जप करें –
अनामामूलमारभ्य प्रादक्षिण्यक्रमेण तु । मध्यमामूलपर्यन्तं जपेदष्टषु पर्वषु।।
–श्यामारहस्यम्
शक्ति से भिन्न देवों के लिए करमाला की विधि
अनामिका के मध्य पर्व से आरम्भ करके पूर्ववत् जप करते हुए मध्यमा के ऊर्ध्व पर्व से ( नीचे न उतरें ) तर्जनी के ऊर्ध्व पर्व से मूल पर्व तक आयें । यहाँ मध्यमा के मध्य और अध: पर्व सुमेरु माने गये हैं । इसका लंघन नहीं करना है । पुन: तर्जनी के मूल पर्व से लौटकर क्रमश: अनामिका के मध्य पर्व तक जप करें । २० वार जप हुआ । इस प्रकार ५वार करने पर १०० संख्या पूर्ण हुई । पुन: अनामिका के मूल ( सबसे नीचे वाले पर्व ) से तर्जनी के मध्य पर्व तक जप करने से ८ संख्या हो जायेगी । इस प्रकर १०८ जप हो जायेगा–
तर्जनी मध्यमाSनामा कनिष्ठा चेति ता: क्रमात् ।तिस्रोSङ्गुल्यस्त्रिपर्वाणो मध्यमा चैकपर्विका ।।
पर्वद्वयं मध्यमाया मेरुत्वेनोपकल्पयेत् ।–इति शिवरहस्यीयं शक्तिभिन्नविषयम्
सनत्कुमार संहिता में भगवती से भिन्न देवों के १०० संख्या तक पूर्वोक्तरीत्या जप सम्पन्न हो जाने पर, शेष ८ वार का जप इस प्रकार कहा गया—
अनामामूलमारभ्यकनिष्ठादिक्रमेण तु । तर्जनीमध्यपर्यन्तमष्टपर्वषु संजपेत् ।
अनामिका के मूल पर्व से आरम्भ करके तर्जनी के मध्य पर्व तक जप करके ८ संख्या पूर्ण कर लेनी चाहिए ।
विशेष–शक्ति और विभिन्न देवों की करमाला सभी में १००संख्या के बाद शेष ८ संख्या का जप अनामिका के मूल पर्व से ही करना है, मध्य पर्व से नहीं ।
इस प्रकार करमाला का सप्रमाण विवेचन किया गया ।
जय श्रीराम
#आचार्यसियारामदासनैयायिक

Gaurav Sharma, Haridwar
