पत्नी दासीसमा यस्य वासनाशान्तिसाधनम्।
मनुते य: कुलाङ्गार: नरो नैव स राक्षस: ।।१३।।
जो पत्नी को दासी के समान तथा उसे मात्र वासना की शान्ति का साधन है– ऐसा मानता है। वह कुलांगार मनुष्य नहीं राक्षस है।।
पत्नीं पीडयते नित्यं तदीयांश्च विनिन्दति।
यौतुकाय स दुष्टात्मा रौरवं याति निश्चितम्।।१४।।
जो दहेज के लिए प्रतिदिन पत्नी को पीड़ा पहुंचाता है और उसके माता पिता तथा बन्धु बांधवों की निन्दा करता है। ऐसा दुरात्मा निश्चित ही रौरव नरक जाता है।।
भार्यां भूषयते नित्यं भार्यापि सा तथा पतिम्।
देहभेदेप्यभिन्नात्मा दम्पत्ति: दम्पत्ति: मत:।।१५।।
जो पति अपनी भार्या को आभूषण,मधुर वचन आदि से विभूषित करता है। और पत्नी भी पति के लिए ऐसा ही करती है। तो समझना चाहिए कि वे दोनों देह के भिन्न होने पर भी अभिन्न आत्मा हैं। ऐसे ही दम्पत्ति (पति पत्नी) विद्वानों द्वारा दम्पत्ति माने गये
हैं ।।
–#आचार्यसियारामदासनैयायिक

