जाति जन्मना ही है ,कर्मणा नही–शास्त्रीय प्रमाण
वृत्रासुर यदि असुर था तो उसे मारने पर देवेन्द्र को ब्रह्म ह्त्या क्यों लगी ? उत्तर – वह असुर कहने भर को था , वस्तुतः ब्राह्मण था वह, क्योंकि उसकी उत्पत्ति दक्षिणाग्नि से हुई थी | और अग्निदेव “ अग्निर्वै ब्राह्मणः ” इस श्रुतिवाक्य से ब्राह्मण कहे गए हैं | अतः ब्राह्मण से उत्पन्न होने के कारण वह ब्राह्मण था |अत एव उसे मारने पर शचीपति इंद्र को ब्रह्म ह्त्या लगी |इससे यह निश्चित होता है कि वह असुरों के कर्म करने पर भी ब्राह्मण ही रहा, असुर नही | अर्थात जाति जन्मना होती है, कर्मणा नही | यदि कर्मणा जाति व्यास आदि ऋषियों को मान्य होती तो असुरों का कर्म करने वाला वृत्र ब्राह्मण कभी नही माना जाता और उसे मारने पर इंद्र को ब्रह्म ह्त्या की प्रसक्ति नही होती | हुई है ,अतः जाति जन्मना है, कर्मणा नही | “ असुरकर्मकर्तुर्वै वृत्रस्य वधपापतः | ब्रह्महत्या श्रुता शास्त्रे तस्माज्जातिर्हि जन्मना || दार्शनिकगण घटत्व आदि जातियां जन्मना ही मानते हैं | जो लोग कहते हैं कि ब्राह्मण आदि वर्ण हैं, जाति नही | वे शुक्ल आदि गुणों को वर्ण कहा गया है –“ शुक्ल वर्ण, कृष्ण वर्ण आदि, इन शुक्ल वर्ण आदि में शुक्लत्व आदि जातियां जान लें |
शंका -यदि ऐसा मानें तो अग्निकुण्ड से समुद्भूत धृष्टदयुम्न और द्रौपदी आदि को भी ब्राह्मण मानना पडेगा ,क्योंकि वे भी अग्निकुण्ड से उत्पन्न हुए हैं ?
समाधान –नही , क्योंकि उसमे ऋषि का संकल्प बाधक बन गया जो उनके क्षत्रिय होने में कारण बना | कैसे ? जैसे महर्षि कश्यप की १३ पत्नियां सगी बहने थी और दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थी ,पति १ ,फिर भी महर्षि के संकल्प से किसी से देवता ,किसी से दैत्य ,किसी से पशु पक्षी आदि का जन्म हुआ |” असति बाधके सर्वोSपि न्यायः प्रवर्तते ” को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए |-जय श्रीराम
>>>>>आचार्य सियारामदास नैयायिक<<<<<

Gaurav Sharma, Haridwar
