दयानन्दीयभ्रान्तिगिरि-भङ्ग,पृष्ठ-५,
स्वामी दयानन्द जी का तर्क है कि “ द्वितीया ब्राह्मणे ”-२/३/६०,
और “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ”-२/३/६२, इन सूत्रों में वेद तथा
ब्राह्मण ग्रन्थ का भेदतया प्रतिपादन होने से वेद और ब्राह्मण
भिन्न हैं |–ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका-पृष्ठ- ८६-८७,
समाधान—
आचार्य सियारामदास नैयायिक—
स्वामिप्रवर ! तब तो आपको अपने इसी तर्क के अनुसार “ मन्त्रे
श्वेतवहोक्थशस्पुरोडाशो ण्विन् ”-३/२/७१, ”
विजुपेच्छन्दसि ”-३/२/७३, इन सूत्रों में भी मन्त्र और वेद का
भेदेन प्रतिपादन होने से वेद और मन्त्र भिन्न हैं—ऐसा भी
मानना पड़ेगा |
इसे स्वीकार कर नही सकते क्योंकि आपने मन्त्रभाग को वेद
मानकर व्याख्या लिखी है |
दयानन्देन यस्तर्कः दत्तः वेदत्वखण्डने |
तेन तर्कप्रहारेण दयानन्दो दिवङ्गतः ||

Gaurav Sharma, Haridwar
