मित्रं सखे सदा ग्राह्यं
यत्ते लक्ष्यं प्रसाधयेत्।
लक्ष्यघ्नञ्चेद्भवेज्ज्ञातं
तदा त्याज्यं मनीषिणा ।।५।।
हे मित्र ! मित्र का संग्रह सदा करना चाहिए। यदि वह मित्र आपके लक्ष्य को ही नष्ट करने वाला है- ऐसा ज्ञात हो जाय। तब मनीषी को उसे त्याग देना चाहिए।।५।।
–#आचार्यसियारामदासनैयायिक


यत्ते लक्ष्यं प्रसाधयेत्।
इमे नीतिश्लोकाः मनोहराः।
सीताराम दण्डवत प्रणाम गुरु देव, यह रचना अद्भुत शिक्षा प्रदान करने वाली है, मन द्वन्द मुक्त हुआ आज