भगवान् श्रीराम शूर्पणखा से विवाहित लक्ष्मण जी को कुआंरा क्यों कहे ?
शूर्पणखा भगवान् राम के पास प्रणय याचना करने आयी और बोली —-
तुम सम पुरुष न मो सम नारी ।—-
—-मानस अ0का017/8।
अब श्रीराम उसके इस भ्रम का निवारण करते हुए कह रहे है ——-
अहइ कुआर मोर लघु भ्राता । 17/11.
इधर भगवान् श्रीराम को वालमीकि रामायण मे मूर्तिमान् कामदेव कहा गया है –
——– कन्दर्प इव मूर्तिमान् ——-
कामाक्रान्त शूर्पणखा को कुमार लक्ष्मण के समीप प्रभु भेज रहे है —–
अहइ कुआर मोर लघु भ्राता—-कहकर ।
यहाँ कुआर शब्द कुमार का अपभ्रंश है।
कुमार का अर्थ है–कु =पृथिवी मार = कामदेव अर्थात् जो भूमण्डल मे साक्षात्
कामदेव है–कौ=पृथिव्यां मारः =कामदेवः।
तुम सम पुरुष न मो सम नारी –इतने का उत्तर राघवेन्द्र ने उसे दे दिया ।
श्रीराम कभी भी मिथ्या भाषण नही करते है —
अनृतं नोक्त पूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन।
रामो द्विर्नाभिभाषते ।। —–ये तथ्य वालमीकि रामायण मे प्रसिद्ध हैं ।
कामाक्रान्त शूर्पणखा को कामवत् सुन्दर पुरुष के पास भेजना ही उचित था ।
लक्ष्मण जी का सौन्दर्य तो काम को भी तिरस्कृत करने वाला है ——
कु =कुत्सितः =मारः = कामदेवो यस्मात् सः कुमारः
अर्थात् कामदेव भी जिसके समक्ष कुरूप लगे ऐसे हैँ लक्ष्
इसलिए रघुनन्दन ने शूर्पणखा से लक्षमणजी को कुमार कहकर भेजा ।
कुमार शब्द के अपभ्रंश कुआर शब्द के अविवाहित अर्थ की शड़्का को इस प्रकार निर्मूल कर दिया गया ।
यद्यपि कुमार 5 वर्ष के बालक को भी कहते हैँ —
” कौमारं पञ्चमाब्दान्तम्” .
तथापि ऐसे कुमार का इस प्रकरण से कोई सम्बन्ध न होने से उसे यहाँ नही
लिया गया ।
अतः उर्मिलापति लक्ष्मणजी के लिए कुआर शब्द के प्रयोग को देखकर श्रीराम पर
मिथ्या भाषण का आरोप उचित नही ।
>>>>>>>>>>जय श्रीराम<<<<<<<<<<<<< >>>>>>>आचार्य सियारामदास नैयायिक <<<<<<<<<<

Gaurav Sharma, Haridwar
