महाश्रीमन्त्रविषयकभ्रमभूधरभंग,समीक्षा-भाग-३

आक्षेप

श्रीमान् नैयायिक जी ने अपने लेख में चौदह या पन्द्रह बार ‘नारायणमन्त्र’ के ऊपर आक्षेप करने के लिए नारायणमन्त्र कहा है जब कि श्री वरवरमुनि जी के भाष्य में एक बार भी ‘नारायणमन्त्र’ का प्रयोग नहीं हुआ है। श्रीवरवर महामुनि ने महाश्रीमन्त्र के उपदेष्टा को पूर्ण के आचार्य माना है। नैयायिक जी भी सूत्र का उल्लेख कर रहे हैं। जब कहीं ‘नारायणमन्त्र’ शब्द का उल्लेख आचार्य ने नहीं किया है तो श्रीसियारामदास जी नैयायिक किसी सिद्ध भी महापुरुष के ऊपर इस तरह आक्षेप क्यों कर रहे हैं-

-पीताम्बरामृत-पृष्ठ-22, प्रो•कमलाकान्त त्रिपाठी

समीक्षा–

आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य  –मान्यवर श्रीत्रिपाठी जी ! आपको मीमांसा की भांति मनोयोग से अपने पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों का भी अध्ययन करना चाहिए। प्रतिवादिभयंकर पीठ के परमाचार्य श्रीअनन्ताचार्य जी महाराज ने “मुमुक्षुप्पडि” ग्रन्थ का संस्कृत भाषा में अनुवाद किया है।

श्रीलोकाचार्य जी महाराज ने ” मुमुक्षुप्पडि ” के द्वितीय सूत्र में

” तत्र प्रथमरहस्यं श्रीमन्त्र:” से श्रीमन्त्र का उल्लेख किया है। पुन: 10वें सूत्र -“– व्यापकास्त्रय: श्रेष्ठा:” से 

षडक्षर- ॐ नमो विष्णवे” ,अष्टाक्षर- “ॐ– नारायणाय”, तथा द्वादशाक्षर वासुदेव मन्त्र- “ॐ नो– वासुदेवाय”–इन तीन व्यापक मन्त्रों को श्रेष्ठ बतलाया है । पुन: इन तीनों के मध्य में प्रधान महान् श्रीमन्त्र ही है –ऐसा कहा– 

” एतेषां त्रयाणां मध्ये महान् श्रीमन्त्र: प्रधानभूत:”–

–मुमुक्षुप्पडि–११

विद्वज्जन देख सकते हैं कि “श्रीमन्त्र:” के विशेषण रूप में “महान्” शब्द का प्रयोग श्रीलोकाचार्य जी महाराज ने सूत्र में किया है।

इसे ही वे श्रीवचनभूषणम् के सूत्र में ” महाश्रीमन्त्र” कह रहे हैं–

“साक्षादाचार्य इत्युच्यते संसारनिवर्तकस्य महाश्रीमन्त्रस्योपदेष्टा।।”

-श्रीवचनभूषणम्- सदाचार्यवैभवप्रकरण 335 वां सूत्र

त्रिविध रहस्यों में यही महाश्रीमन्त्र अष्टाक्षर मन्त्रत्वेन श्रीलोकाचार्य जी को अभिप्रेत है। इसीलिए वे आगे लिखते हैं —

“अयं चाष्टाक्षरस्त्रिपद:।।”

-मुमुक्षुप्पडि-28

इसी श्रीमन्त्र को लेकर वि•सं• 1996में इसके हिंदी व्याख्याता इतना सुस्पष्ट लिख रहे हैं कि आपका भ्रमभूधर निश्चित ही विभंग हो जायेगा-

“मूल-अयं चाष्टाक्षस्त्रिपदः ॥२८॥

टी०-अ०-और यह (श्रीमन्त्र) [“ओमित्येकाक्षरं नम इति द्वे अक्षरे नारायणायेति पञ्चाक्षराणि इत्यष्ट्राक्षरं. ओमित्यग्रे ”यह व्याहरेत् नम इति पञ्चान्नारायणायेत्युपरिष्टात्” (नारायणोपनिषद् ३) अर्थात् ‘ॐ’ यह एक अक्षर, ‘नमः’ यह दो अक्षर, ‘नारायणाय’ यह पाँच अक्षर हैं- ये आठ अक्षर हुए.

 ‘ॐ’ यह आगे बोले, ‘नमः’ यह पीछे, ‘नारायणाय’ यह अन्त में होने से इसी कथन प्रकार से ] आठ अक्षर-तीन पद हैं ।॥२८।।

— यह टीका विक्रम संवत् 1996 में प्रकाशित हुई है।और श्रीवरवरमुनि के भाष्यानुरूप लिखी गयी है।

अष्ट सूत्र तीन लर वाले मंगलसूत्र से श्रीमन्त्र की उपमा 

श्रीलोकाचार्य जी महाराज ने दी है–

“अष्टसूत्रं त्रिभागं मङ्गलसूत्रमिव श्रीमन्त्र:”

-मुमुक्षुप्पडि-113″

जिसका कारण आठ अक्षर और तीन पद महाश्रीमन्त्र के हैं। और यह अष्टाक्षर नारायण मन्त्र है- यह भी विद्वज्जनों को सुस्पष्ट हो चुका है।

इसी श्रीमन्त्र को श्रीवरवरमुनि ने ” महाश्रीमन्त्रस्योपदेष्टेति–ऐसा प्रतीक लेकर उसे अष्टाक्षर मन्त्र कहकर मोक्षदायक कहा है–

सर्ववेदान्तसारार्थः संसारार्णवतारकः । 

गतिरष्टाक्षरो नृणामपुनर्भवकांक्षिणाम् ॥

इस विवेचना से यह सिद्ध हुआ कि महाश्रीमन्त्र ही श्रीलोकाचार्य जी के द्वारा “मुमुक्षुप्पडि” में श्रीमन्त्र शब्द से कहा गया है । अत एव वहां उसका विशेषण “महान्” पद रखा गया है। उसके तीन पद और आठ अक्षर स्पष्टतया ऊपर अष्टाक्षर नारायण मन्त्र में दिखाये जा चुके हैं ।

श्रीवचनभूषणम् के सदाचारवैभवप्रकरण में उसी नारायण मन्त्र को श्रीवरवर मुनि ने अष्टाक्षर मन्त्र कहा है । इससे महाश्रीमन्त्र, महान् श्रीमन्त्र श्रीमन्त्र अष्टाक्षर नारायणमन्त्र एक ही वस्तु सिद्ध हुए। महाश्रीमन्त्र के पूर्वपद महत् का लोप करके श्रीमन्त्र शब्द प्रयुक्त हुआ है। 

इसलिए महाश्रीमन्त्र, श्रीमन्त्र, अष्टाक्षर नारायण मन्त्र एक ही हैं– इसमें आपको अब कोई भ्रम नहीं होना चाहिए।  

अत एव आपका —

“श्रीमान् नैयायिक जी ने अपने लेख में चौदह या पन्द्रह बार ‘नारायणमन्त्र’ के ऊपर आक्षेप करने के लिए नारायणमन्त्र कहा है जब कि श्री वरवरमुनि जी के भाष्य में एक बार भी ‘नारायणमन्त्र’ का प्रयोग नहीं हुआ है। श्रीवरवर महामुनि ने महाश्रीमन्त्र के उपदेष्टा को पूर्ण के आचार्य माना है। नैयायिक जी भी सूत्र का उल्लेख कर रहे हैं। जब कहीं ‘नारायणमन्त्र’ शब्द का उल्लेख आचार्य ने नहीं किया है तो श्रीसियारामदास जी नैयायिक किसी सिद्ध भी महापुरुष के ऊपर इस तरह आक्षेप क्यों कर रहे हैं।”  – यह कथन निर्मूल हो गया।

इस प्रकार 22वें पृष्ठ से लेकर 33वें पृष्ठ तक श्रीत्रिपाठी जी ने नारायण मन्त्र को लेकर जो आक्षेप ओर समाधान द़ेने का प्रयास किया है । वह पूर्वोक्तरीत्या पूर्ण भ्रामक है।

आक्षेप–

हमें नहीं समझ में आता कि जो आचार्य ‘श्रीवचनभूषण’ ग्रन्थ के पुरुषकारवैभवप्रकरण में,

‘वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे ।

 वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षात् नारायणात्मना’ ।।

तथा ‘लक्ष्या इत्यनुक्त्वा ‘कारागृहवासकर्त्या’ इत्युक्तं तस्या दयातिशयं प्रकाशयितुम्’ से भगवान् राम को नारायण और भगवती लक्ष्मी को भगवती सीता कह रहे हैं वे रामादि के मन्त्रों के ऊपर विद्वेष क्यों करेंगे? तो अवश्य नैयायिक जी आचार्य के आशय को नहीं समझे हैं या समझ कर भी जानबूझ कर उलटा दुष्प्रचार कर रहे हैं। 

— पीताम्बरामृत,पृष्ठ-23-प्रो•कमलाकान्त त्रिपाठी

  • समीक्षा
  • आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य —

 

मित्रवर! आपके परमाचार्य के ग्रन्थ मुमुक्षुप्पडि को उद्धृत कर रहा हूं—

“नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्” (तै० ना० १) इस वेदोक्त विष्णु गायत्री के अनुसार नारायण, विष्णु और वासुदेव मन्त्र इन तीन मन्त्रों को मुमुक्षुप्पडि में व्यापक कहकर श्रेष्ठ कहा गया है–॥१०॥

 षडष्टद्वादशमनुः व्यापकः परिकीर्तितः ॥

( हयग्रीव संहिता) षट् (ॐ नमो विष्णुवे), अष्ट ( ॐ नमो नारायणाय ) और द्वादश (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) मन्त्र व्यापक कहे गये हैं।

वेदोक्त विष्णु गायत्री के अनुसार पाञ्चरात्र तथा हयग्रीव संहिता ग्रन्थ भी नारायण-विष्णु-वासुदेव तीनों मन्त्रों को व्यापक कह रहे हैं। यद्यपि “पञ्चैते व्यापका मन्त्राः पञ्चरात्रे प्रतिष्ठिताः” इस लक्ष्मी तन्त्र के प्रमाणानुसार पांच मन्त्र व्यापक कहे गये हैं, तथापि साक्षात् श्रुति विष्णु गायत्री आदि के अनुसार सूत्र-प्रणयन कर्त्ता ग्रन्थकार ने तीन ही मन्त्रों के विषय में यहाँ उल्लेख किया है।”

-यह टीका विक्रम संवत् 1996 में प्रकाशित हुई है।और श्रीवरवरमुनि के भाष्यानुरूप लिखी गयी है।

और इन तीन मन्त्रों में मात्र अष्टाक्षर नारायण मन्त्र को ही प्रधान बतलाया गया। शेष दोनों षडक्षर विष्णुमन्त्र तथा द्वादशाक्षर वासुदेवमन्त्र को श्रीलोकाचार्य जी ने अशिष्टों द्वारा परिगृहीत कहा–

अन्ययोरशिष्टपरिग्रहोऽपूर्तिश्चास्ति ॥

– मुमुक्षुप्पडि-१२॥

जब भगवान् की गायत्री में ही उनके नारायण, वासुदेव और विष्णु ये तीन नाम आ रहे हैं। और नारायण, वासुदेव तथा विष्णु में स्वरूपत: भेद भी नहीं है। तब आपके परमाचार्य श्रीलोकाचार्य जी ने भगवान् विष्णु और भगवान् वासुदेव के मन्त्रों को अशिष्टों से परिगृहीत क्यों कहा??  

क्या नारद जी से द्वादशाक्षर मन्त्र की दीक्षा लेने वाले ध्रुव जी अशिष्ट हैं?? आज तक द्वादशाक्षर वासुदेव मन्त्र तथा विष्णुमन्त्र की दीक्षा जिन्हें मिली है। वे सब अशिष्ट हैं? अपने आचार्य जी से पूछिये  विद्वद्वर!

यद्यपि एक ही भगवान् नारायण के नाम नारायण, वासुदेव और विष्णु हैं। तथापि उनके दो नाम वाले मन्त्रों को जो श्रीलोकाचार्य जी अशिष्टों द्वारा परिगृहीत कह सकते हैं। वे श्रीराम श्रीकृष्णादि के मन्त्रों को क्षुद्र कह दें तो क्या आश्चर्य है? और यह विद्वेष नहीं तो क्या प्रेम है?

इसीलिए मैंने लिखा कि —

श्रीलोकाचार्य जी की दृष्टि में संसारवर्धक क्षुद्र फलों को देने वाले श्रीरामकृष्णादि के मन्त्रों के उपदेष्टा श्रीरामानन्दाचार्य,श्रीनिम्बार्काचार्य, श्रीबल्लभाचार्य आदि जगद्गुरुरूपेण प्रसिद्ध महापुरुष साक्षात् आचार्य नहीं हो सकते । इन महानुभावों में आचार्यत्व पूर्णतया विद्यामान नहीं है । वह तो केवल अष्टाक्षर नारायण मंत्र के उपदेशकों में ही है । – ऐसा रामानुजीय आचार्य श्रीलोकाचार्य जी का मानना है । 

लोकाचार्यकृत आचार्य लक्षण में दोष-

लोकाचार्य जी का “साक्षादाचार्य इत्युच्यते संसारनिवर्तकस्य महाश्रीमन्त्रस्योपदेष्टा।”

(श्रीवचनभूषणम्- सदाचार्यवैभवप्रकरण,335 सूत्र)

वचन सदोष है; क्योंकि बालक ध्रुव को द्वादशाक्षर वासुदेव मन्त्र के उपदेष्टा देवर्षि नारद में यह लक्षण नहीं जा रहा है। जो कि द्वादश महाभागवतों के मध्य परिगणित भक्तिसूत्रों के रचयिता महान् आचार्य हैं।

मुमुक्षुप्पडि में तो लोकाचार्य जी ने यहां तक कह दिया कि वासुदेव और विष्णु मन्त्र भी अशिष्टों द्वारा परिगृहीत हैं–

” अन्ययोरशिष्टपरिग्रहोSपूर्तिश्चास्ति।।

-मुमुक्षुप्पडि-१/१२,

वासुदेव मन्त्र देवर्षि नारद ने भक्तप्रवर ध्रुव को दिया । तो इस मन्त्र के गृहीता ध्रुव जी लोकाचार्य जी की दृष्टि में अशिष्ट हैं। और उस मन्त्र के उपदेष्टा देवर्षि नारद आचार्य नहीं। धन्य हैं रामानुजीय आचार्य!!!”

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दूसरी बात यह कि

‘श्रीवचनभूषण’ ग्रन्थ के पुरुषकारवैभवप्रकरण में

‘वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे ।

वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षात् नारायणात्मना।।’

पीताम्बरामृत-पृष्ठ-23

में आपने श्रीवरवरमुनि के भाष्य-

‘वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे ।

वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद् नारायणात्मना।।’

 में ‘रामायणात्मना’को “नारायणात्मना” लिख दिया है। जो श्रीवरवरमुनि के भाष्य का समादर नहीं है। इसका क्या प्रयोजन है? आपने ऐसा क्यों किया? विद्वद्वर! ?

आक्षेप

आचार्य ने जब उक्त प्रकरण में ‘नारायण’ शब्द का प्रयोग ही नहीं किया है तो नैयायिक जी कैसे कह सकते से हैं कि आचार्य श्रीवरवरमुनि जी ने नारायणमन्त्र को ही श्रेष्ठ माना है और रामकृष्णादिमन्त्रों की निन्दा करके रामकृष्णादिमन्त्रों के उपदेशक जगद्‌गुरु आचार्यों को पूर्ण आचार्य नहीं माना है। -पीताम्बरामृत-पृष्ठ-23-प्रो•कमलाकान्त त्रिपाठी 

समीक्षा 

आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य 

मान्यवर! मैंने सप्रमाण सिद्ध कर दिया है कि अष्टाक्षर नारायण मन्त्र ही महाश्रीमन्त्र है। अत: आपका पूर्वोक्त समाधान भ्रमभूधरमात्र है।

मुझपर व्यक्तिगत आक्षेप करते हुऐ मेरे मित्र कह रहे हैं कि–

किसी आचार्य से श्रीभगवत्कैर्य को प्राप्त करने के लिए मन्त्रराज की दीक्षा लेने वाले किसी साधू के द्वारा किया जाने वाला यह कार्य तो सर्वथा विगर्हित है।” 

इतना ही नहीं। विद्वद्रर आगे लिखते हैं कि 

“द्वेषमहाभूधर नैयायिक जी में दिखायी दे रहा है और आरोप उनके ऊपर लगा रहे हैं जिनके अन्दर द्वेष का परमाणु भी नहीं है।

समीक्षा–

आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य 

समादरणीय त्रिपाठी जी ! आप लिख रहे हैं कि

“द्वेषमहाभूधर नैयायिक जी में दिखायी दे रहा है”

भगवन्! आपके द्वारा दिये गये समाधानों को धूलिधूसरित मैंने नहीं अपितु आपके परमाचार्य श्रीलोकाचार्य जी महाराज से रचित “मुमुक्षुप्पडि” के वचनों ने किया है। 

अत: स्वपूर्वाचार्यप्रोक्तमुमुक्षुप्पडिप्रभृतिग्रन्थप्रतिपाद्यतथ्यविषयकाज्ञानदोषमहाभूधर आपमें परिलक्षित हो रहा है या नहीं — विचार अवश्य कीजियेगा।

हमने शास्त्रीय तथ्यों की छाया में आपत्तियां उठायी हैं। उनका समाधान देने का प्रयास करें बन्धुवर ! 

विद्वद्धौरेय ! किसी के भी द्वारा किया व्यक्तिगत आक्षेप असामर्थ्य या शिष्टत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताक भेद का द्योतक है, समाधान नहीं। 

–#आचार्यसियारामदासनैयायिक वैष्णवाचार्य 

जगद्गुरु श्रीरामानन्दपीठ, रघुनाथ मन्दिर ,

माउंट आबू,सिरोही, राजस्थान

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