श्रीसूक्त मन्त्र – १०

श्रीसूक्त मन्त्र — १० की व्याख्या

ॐ मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ||१०||

व्याख्या

इस ऋचा के द्वारा भगवती श्री से अभीष्ट पदार्थ जैसी अनेक वस्तुओं को उपलब्ध करने की प्रार्थना आराधक द्वारा की जा रही है जो इस ऋचा के जापक को उपलब्ध होती हैं श्रीः हे जगन्मातः भगवती श्री आपकी की कृपा से हममनसःमन की कामंकाम्यते कामनाविषयी क्रियते इति कामः तं कामंकामना के विषय जो भी पदार्थ हैं उन्हेंअशीमहिप्राप्त कर लें |

वस्तुतः संसार में जितने भी पदार्थ हैंवे किसी न किसी इन्द्रिय के विषय तो हैं ही इधर यशः की भांति श्रीः शब्द भी प्रथमान्त है अतः श्री शब्द से सम्पत्ति का ग्रहण हो ही जायेगा पशु और अन्न की चर्चा भी ऋचा में है ये सब मन की इच्छा के विषय हैं यही एक सुव्यवस्थित जीवन के लिए आवश्यक हैं किन्तु दुर्लभ मानव तन केवल इन्ही तक सीमित नही है |

परमपुरुषार्थ भगवत्साक्षात्कार केवल शुद्ध मन से ही सम्भव है  मनसैवानुद्रष्टव्यम्«बृहदारण्यक ,४/४/१९ » अतः यहां केवल मन का विषय ही लेना है और वह है परमात्माउसे आपकी कृपा से प्राप्त कर लूं |

आकूतिंसंकल्पंशिवसंकल्पंमन के शुभ संकल्प कोप्राप्त करूं | तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु से प्राप्य जो फल हैउसे मैं प्राप्त करूं अर्थात् मेरा मन कभी किसी के प्रति अशुभ संकल्प न करे,शुभ सङ्कल्प ही करे  सर्वदा वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ओतप्रोत रहूँ |

वाचःवाणी कीसत्यंसत्यता को प्राप्त करूं तात्पर्य यह कि केवल शुभ संकल्प से काम नही चलने वाला है जैसा शुभ संकल्प हो उसे अपनी वाणी से सत्य कर दूंऐसी कृपा मातः आप करें |

अब पशुओं तथा अन्न से उत्पन्न वस्तुओं के प्राप्ति की प्रार्थना की जा रही हैपशूनांपशुओं केऔरअन्नस्यअन्न केरूपंप्रशंसा योग्य पदार्थजैसे पशुओं का प्रशंसनीय पदार्थ उसके दुग्ध आदि हैं तथा अन्न की प्रशंसनीय वस्तुएंभक्ष्यलेह्यचोष्यऔर पेय हैंइन सबको प्राप्त करूं |

“रूप शब्द रू शब्दे धातु से रूयते स्तूयते इति रूपम् अथवा रूप्यते प्रकाश्यते इति रूपम्”इस प्रकार व्युत्पत्ति करके बना है जिसका अर्थ है पशुओं द्वारा प्रकाशित दुग्ध आदि वस्तुएं तथा अन्न द्वारा प्रकाशित भक्ष्य आदि पदार्थ इन्हें प्राप्त करूं सीधा अर्थ करने पर पशुओं तथा अन्न का रूप प्राप्त करूंयह अर्थ निकलेगाजो किसी भी व्यक्ति को अभीष्ट नही है |

श्रीःहे भगवती श्री ! अथवा श्रीःसम्पत्तियशःदिग्दिगन्त व्यापिनी कीर्तिमयिमुझमेंश्रयतांआपकी कृपा से आश्रय ले |

एक भक्त के लिए सम्पत्ति सांसारिक धन धन  नही है अपितु भागवान की स्मृति ही उसके लिए परम धन है-

  विपदो नैव विपदः संपदो नैव संपदः विपद् विस्मरणं विष्णोः संपन्नारायणस्मृतिः ||

भक्तों के लिये विपत्ति विपत्ति नही और सांसारिक संपत्ति संपत्ति नहीउसके लिए भगवान् का विस्मरण ही सबसे बड़ी विपत्ति तथा भगवान् का स्मरण ही सबसे बड़ी संपत्ति है इसलिए हे मातः भगवती श्री आपकी कृपा से मैं प्रभु का तुच्छ सेवक आपके स्वामी श्रीहरि का सतत स्मरण प्राप्त करूं और भगवान् की और जीवों को उन्मुख करके सर्वत्र भक्ति की स्थापना के द्वारा देवर्षि नारद की भांति विपुल यश प्राप्त करूं |

देवर्षि नारद ने भक्ति देवी से कहा था कि कलियुग के समान कोई युग नहीयदि मैं इस युग में आपको घर-घर मेंजन जन में स्थापित न कर दूं तो मैं श्रीहरि का दास नहीं

“कलिना सदृशः कोऽपि युगो नास्ति वरानने | तस्मिंस्त्वां स्थापयिष्यामि गेहे गेहे जने जने ||

अन्यधर्मांस्तिरस्कृत्य पुरस्कृत्य महोत्सवान् तदा नाहं हरेर्दासो लोके त्वां न प्रवर्तये” ||

« भागवतमाहात्म्य, २/१३-१४ »

यह अर्थ “मयि श्रीः श्रयतां यशः”इस अंश का भक्त को इस प्रकार मनन करना चाहिये |

पुरश्चरणसाधक शुद्ध होकर मन वाणी को संयत करके पहले ॐ मैं लं वं इन बीजों से युक्त इस ऋचा से न्यास करने के बाद 

 ध्यान–

समस्त प्राणियों में ज्ञान,बल और क्रिया रूप से प्रसिद्धदुग्ध एवं ओदन प्रिय हैं जिनको ऐसी सत्य संकल्प वाली भगवती लक्ष्मी का ध्यान करे 

“तां ध्यायेत् सत्यसङ्कल्पां लक्ष्मीं क्षीरोदनप्रियाम् | ख्यातां सर्वेषु भूतेषु तत्तज्ज्ञानबलक्रियाम्”||

«मन्त्रकल्पार्णव—पृथ्वीधरभाष्य »

पुनः  इस ऋचा का कुछ दिनों में ८ लाख जप कर ले तो उसे निश्चित ही वाक्सिद्धिभोगसिद्धि और भोग्य वस्तुओं की प्राप्ति अवश्य होती है भक्तों का भोग्य भगवान् का कैंकर्य है अतः उन्हें नित्य कैंकर्य की प्राप्ति होती है |

मनसः काममित्याद्यां श्रीसूक्ते दशमीमृचम् | मनोवाङ्नियतो नित्यमष्टलक्षजपं चरेत् ||

वाक्सिद्धिर्भोगसिद्धिश्च भोग्यलाभो भवेद्ध्रुवम् ||

«मन्त्रकल्पार्णवपृथ्वीधरभाष्य »

जय श्रीराम

आचार्य सियारामदास नैयायिक

Gaurav Sharma, Haridwar

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