सोने की चिड़िया भारत

हमारा राष्ट्र भारत सोने की चिड़िया जब था । उस समय भी जातियां थीं। किन्तु जातिवाद नहीं था। इसलिए भामाशाह और महाराणा प्रताप भिन्न जाति के होकर भी राष्ट्रोत्थान हेतु एक हो गये। 

 

सबसे घातक स्वार्थवाद है। जिसके कारण एक ही जाति एक ही परिवार अधिक क्या पति पत्नी,माता पिता,सास बहू भाई भाई भी परस्पर झगड़ते हैं। इसलिए स्वार्थवाद से ऊपर उठना होगा। 

 

स्वार्थ संकीर्णता का जनक है। 

हमारा देश सोने की चिड़िया इसलिए था कि समग्र विश्व को अपना कुटुम्ब समझकर सम्पूर्ण व्यवहार हुआ करता था। यही रामराज्य का भी मूलमंत्र है। स्वार्थरूपी महा असुर ने परस्पर मैत्रीभाव को ग्रस लिया है। 

 

जिन शास्त्रों से स्वर्ग नरक से बचने की प्रेरणा मिलती थी। आज उनकी खिल्ली उडायी जा रही है। मत संग्रह के लक्ष्य से लोगों को बांटकर उल्लू सीधा किया जा रहा है। 

 

बड़े बड़े गुंडे, तस्कर, लुटेरे हिंसक नेता बनकर घूम रहे हैं। इस देश में नेताओं की योग्यता का सही निर्धारण ही नहीं है। दबंग व्यक्ति को टिकट देकर चुनाव जीतना लक्ष्य बन चुका है।

ऐसे लोग राष्ट्र का नहीं अपितु अपना उत्थान करते हैं। चाहे जनता आपस में बांटकर लड़कर मर ही क्यों न जाय।

 

महात्माओं में जगद्गुरुओं की बाढ आ गयी है। अधिकतर महत्वाकांक्षी 5लाख में छत्र चंवर सिंहासन बनवाते हैं। जिससे पुष्कल दक्षिणा मिले। विभिन्न संस्थाओं से जुड़कर उनकी चापलूसी करके अपना उल्लू सीधा करते हैं। भले ही शास्त्र और उनकी मर्यादायें ध्वस्त ही क्यों न हो जायें।

 

जो जितना बड़ा भंडारा करे। वह उतना ही बड़ा सिद्ध है।टकशाल की उपेक्षा करके वेशमात्र की सेवा के सिद्धान्त ने आलसियों की सेना खड़ी कर दी है। ऐसे लोग साधु-समाज को खोखला करते जा रहे हैं।

 

आजकल कुछ लोग स्वयं जगद्गुरु की उपाधि धारण कर लेते हैं। तो कुछ लोग पैसा के बल पर जगद्गुरु बन रहे हैं।

 

ऐसे ही लोगों के संपर्क में अनेक संगठनों के पुरोधा हैं। यही स्थिति गैर हिंदू संगठनों की भी है।

 

संस्थाओं की आवश्यकता तो है ही। पर उनमें भी अयोग्यों की भरमार होती जा रही है। 

 

जहां तक पार्टियों का प्रश्न है। तो इनके नेताओं में सर्वांगीण सोच नहीं है। जो ऐसी सोच रखकर कार्य करते हैं। उनका विरोध चोर उचक्कों जैसे समूह गठित करके किया जा रहा है। 

 

जनता की भी यही स्थिति है। उसे आलू टमाटर और तेल सस्ता चाहिए। भले ही राष्ट्र की सैन्य-शक्ति नगण्य ही क्यों न हो जाय। 

 

इसलिए नेताओं और जनता दोनों को सर्वांगीण सोच रखनी होगी। घरों में भी किसी महत्वपूर्ण कार्य को करने के लिए अन्यत्र कटौती करनी ही पड़ती है।

 

राष्ट्रोत्थान आलू प्याज और गैस सिलेंडर के सस्ते होने से ही नहीं होगा। विकाश के लिए कुछ झेलना पड़ता है। और विकसित होने पर आलू प्याज भी सस्ते होंगे।आज समर्थ गुरु रामदास,संत कबीर जैसे समाजोद्धारक संतों, गुरु गोविंद सिंह,महाराणा प्रताप ,वीर शिवा जी भामाशाह जैसे महापुरुषों के आदर्शों पर चलने की आवश्यकता है। 

 

वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वे भवन्तु सुखिन: का उद्घोष करने वाले जैसे शास्त्रों के साथ ही शिक्षा की आवश्यकता है। तभी भारत विश्वगुरू बनकर समग्र विश्व को सुख शान्ति का पात्र बना सकता है।

 

जय श्रीराम

 

-#आचार्यसियारामदासनैयायिक

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