श्रीरामकृष्णादिमन्त्रों के निन्दापरक श्रीवचनभूषणकार के कथन की समीक्षा”भाग-२

श्रीरामकृष्णादिमन्त्रों के निन्दापरक श्रीवचनभूषणकार के कथन की समीक्षा” लेख की आपत्तियां पूर्ववत् गर्ज रही हैं।

श्रीरामानुजीय विद्वान् प्रो•श्रीकमलाकान्त त्रिपाठी जी के लेख की समीक्षा 
 भाग-

श्रीराम! 25 जुलाई 2024 के लेख में उद्धृत पंक्तियों के एक अंशविशेष को उठाकर जो आपत्ति मेरे मित्रवर प्रो• श्रीकमलाकान्त त्रिपाठी जी ने दी है । उसको प्रस्तुत करके मैं उसका ससाक्ष्य निराकरण करूंगा।

लेख का अंश–

“रामानुज संप्रदाय के मान्य ग्रन्थ श्रीवचनभूषणम् के भाष्य में भगवान् श्रीराम, श्रीकृष्णादि के मन्त्रों को क्षुद्रफल देने वाला कहा गया है-

मेरे लेख का निम्नलिखित अंशविशेष जो श्रीत्रिपाठी जी उठा रहे हैं। देखें-

“श्रीराम, श्रीकृष्णादि के मन्त्रों को क्षुद्रफल देने वाला कहा गया है, इसका क्या अर्थ होगा यह भी विचारणीय है। उनके अनुसार श्रीरामस्य मन्त्र:
श्रीकृष्णस्य मन्त्र: यह षष्ठी तत्पुरुष समास होना चाहिए । इसका यह भी अर्थ होगा- श्रीराम में विनियुक्त, श्रीकृष्ण में विनियुक्त मन्त्र । जैसे ‘लवनमन्त्रो बर्हिर्देवसदनं दामि’ इति। उक्त मन्त्र बर्हिलवन में विनियुक्त है अतः उसे लवन मन्त्र कहा जाता है ।
यदि ऐसा मानेंगे तो श्रीराम मन्त्र और श्रीकृष्ण मन्त्र क्षुद्र फल देने वाला नहीं होगा। श्रीराम और श्रीकृष्ण क्षुद्र फल नहीं है । वे तो साक्षात् भगवान् हैं -कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।”

निराकरण–

आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य —

यदि मेरे वाक्य में “श्रीराममन्त्र: श्रीकृष्णमन्त्र:” ऐसी पदावली होती तो आप मुझसे पूछ सकते थे कि
श्रीराममन्त्र: श्रीकृष्णमन्त्र: में षष्ठी तत्पुरुष समास होना चाहिए। किन्तु वह तो हिंदी भाषा में प्रयुक्त
शब्दसमूह है। विद्वज्जन निम्नलिखित वाक्य पर दृष्टिपात करें। श्रीराम, श्रीकृष्णादि के मन्त्रों को क्षुद्रफल देने वाला कहा गया है-

हिंदी भाषा के इस वाक्य में आपको षष्ठी तत्पुरुष समास की सम्भावना क्यों हो रही है? कादम्बरी प्रभृति ग्रन्थों में समस्त पदों को देखकर ‘इसमें कौन समास होगा?’- ऐसी जिज्ञासा तो व्यक्तियों को होती है । किन्तु असमस्त शब्दों में समास की जिज्ञासा या सम्भावना आश्चर्य है!!!

हिंदी भाषा के-
‘श्रीराम, श्रीकृष्णादि के मन्त्रों को’ इस असमस्त ( समासरहित) पदों ( शब्दों) “में “श्रीरामस्य मन्त्र:
श्रीकृष्णस्य मन्त्र: यह षष्ठी तत्पुरुष समास होना चाहिए ।”- कथन किस उद्देश्य से है ?

 क्या मेरे उक्त वाक्य के वे अंशविशेष—

“श्रीराम, श्रीकृष्णादि के मन्त्रों को क्षुद्रफल देने वाला कहा गया है”-

संस्कृतभाषा के समस्तपद रूप आपको प्रतीत हो रहे हैं ? जिनको लेकर आपने षष्ठी तत्पुरुष समास होना चाहिए- ऐसा कहा ।
इससे कौन सा स्वार्थ सिद्ध करने की कामना है।

समास का विषय तो प्रकृत स्थल में है ही नहीं । फिर भी आप उस असम्बद्ध विषय को अपनी कल्पना से उठा रहे हैं।

और यह अनुचित है; क्योंकि ऐसा करने पर व्यक्ति

न्यायदर्शन के – ” प्रकृतादर्थादप्रतिसम्बद्धार्थमर्थान्तरम्”-
न्यायदर्शन-5/2/7

सूत्रानुसार अर्थान्तरनामक निग्रह स्थान से ग्रस्त हो जाता है। जो पराजय का कारण है। 

इस प्रकार षष्ठीसमासविषयक वक्तव्य के विखण्डित हो जाने से उसे आधार बनाकर श्रीत्रिपाठी जी के द्वारा खड़ा किया गया समग्र कल्पनाप्रासाद ध्वस्त हो गया।

आक्षेप–

मीमांसक तो शब्दसमवायिनी देवता मानते हैं। ऐसे में आदित्य और सूर्य की तरह नारायण, राम, कृष्ण, देवता परस्पर भिन्न हो सकते हैं । नैयायिक जी जिस वेदांत से संबंध रखते हैं उसमें राम कृष्ण परमात्मा है परमात्मा तो नारायण भी हैं । फिर भी रामानुज संप्रदाय में परिगृहीत होने से वे नैयायिक जी के द्वारा आलोचनीय हो गए हैं ।-प्रो•कमलाकान्त त्रिपाठी

निराकरण-

आचार्य सियारामदास नैयायिक —

श्रीत्रिपाठी जी कितनी मार्मिक बात कह रहे हैं कि “मीमांसक तो शब्दसमवायिनी देवता मानते हैं।”
आदित्य और सूर्य में भेद दिखलाते हुए आपने ‘शब्दसमवायिनी देवता’ को ‘शब्दस्वरूप देवता’
अर्थ सुस्पष्ट कर दिया है।

विद्वद्वर! मीमांसकों में भाट्टदीपिका, भाट्टकौस्तुभ और भाट्टरहस्यम् जैसे महनीय ग्रन्थों के रचयिता श्रीखण्डदेव,अध्वरमीमांसा कुतूहलवृत्ति” जैसे महान् ग्रन्थ के प्रणेता श्रीवासुदेव दीक्षित भी आते हैं। इन महापुरुषों ने शब्दमात्र को देवता न मानकर देवता के विग्रहादिपंचक को ससाक्ष्य स्वीकार किया है।

अध्वरमीमांसा कुतूहलवृत्तिकार ने तो शबर स्वामी के देवताविग्रहादिपंचकनिराकरण के कथन को प्रौढिवादमात्र कहा है–

” देवता वा प्रयोजयेत” इत्यधिकरणे देवतानां विग्रहादिपञ्चकं निराकरिष्यते भाष्ये, तत्तु प्रौढिवादमात्रम्।”

वहीं वार्तिककार कुमारिलभट्ट की भी भर्त्सना कर रहे हैं कि इन्होंने देवताओं के विग्रहादिपंचक का आघ्राण तक नहीं किया था–

“अत एव वार्तिके देवतादिविग्रहादिपञ्चकमनाघ्रायैव
तदधिकरणं नवमे प्रवर्तयिष्यते।”

कुतूहलवृत्तिकार कहते हैं कि इन्द्रादि शब्द ही देवता है, न कि पुराणादि में प्रसिद्ध वज्रपाणि पुरन्दर रूपी अर्थ — ऐसा कथन बौद्धों का ही प्रलाप है।-

“शब्द एव देवता नत्वर्थ इति हि बौद्धप्रलपितमेव।”
–अध्वरमीमांसाकुतूहलवृत्ति–

विग्रहादिपंचकरहित पदार्थ देवता है- यह कथन भी प्रच्छन्नबौद्धों का ही प्रलाप है —

तथा च विग्रहादिपञ्चकरहितोSर्थो देवतेत्यपि प्रच्छन्न बौद्धप्रलपितमेव।
–अध्वरमीमांसाकुतूहलवृत्ति

यागविधि के सामर्थ्य से ही देवताओं का विग्रह, हविर्भोक्तृत्व, प्रसादवत्त्व,फलैश्वर्यवत्त्व और फलदातृत्व ये पांच वस्तुयें सिद्ध होती हैं।
याग देवताराधनरूप होता है; क्योंकि देवपूजार्थक ” यज् धातु से यागशब्द की निष्पत्ति होती है।

????फलेच्छुकों के लिए देवाराधन राजा की आराधना जैसे फलप्रद होता है। जैसे राजा प्रसन्न होने पर फल देता है। ऐसे ही याग से आराधित देवता प्रसन्न होकर फल देते हैं।

अप्रसन्न से फल की आशा ही व्यर्थ है। और विना हविष् खाये देवता प्रसन्न नहीं होंगे। इसलिए देवताओं का शरीर, उनसे हवि का ग्रहण, उससे उनका प्रसाद=अनुग्रह, और अनुग्रह से फल देने की सामर्थ्य, और फल का ऐश्वर्य ये विग्रहादिपंचक सिद्ध हो जाते हैं।

वेदों में ” सहस्राक्षो गोत्रभिद्वज्रबाहुरस्मासु देवो द्रविणं ददातु” से देवता इन्द्र का शरीर और आयुध वज्र सुस्पष्ट है।

“तृप्त एवैनमिन्द्र: प्रजया पशुभिश्च तर्पयति” वेदवचन द्वारा कहा गया कि हविष् ग्रहण से प्रसन्न इन्द्र अनुष्ठाता को प्रजा एवं पशु से तृप्त करते हैं–

इससे देवता का फलदातृत्व श्रुति से सुस्पष्ट हो रहा है।

” इन्द्रो राजा जगतश्चर्षणीनां–” श्रौतवचन से इन्द्र को समग्र जगत् का राजा कहकर देवता के फलैश्वर्य को बतलाया गया।

श्रीमद्भगवद्गीता में यज्ञाराधित देवताओं द्वारा प्रसन्न होकर सम्पूर्ण अभीष्ट फलों को देना बतलाया गया है। —
” इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता:।”
-3/12

इस प्रकार देवताओं का विग्रहादिपंचक मन्त्र, अर्थवाद,इतिहास एवं पुराणों में सुस्पष्ट कहा
गया है।

फिर भी शबर स्वामी और कुमारिलभट्ट ने विग्रहादिपंचक का निराकरण किया । यह केवल उनका प्रौढिवादमात्र है। यह कुतहलवृत्तिकार का आशय है।

यदि देवता शब्दमयी ही होती और उसका कोई विग्रह नहीं होता तो कर्मों में जीव मात्र का अधिकार है या अंगवैकल्यशून्य मनुष्यादि का– ऐसा प्रश्न उठाकर देवताओं के अधिकार का खण्डन करने के लिए —

“न देवतानां देवतान्तराभावात्।।–जैमिनिसूत्र- 6/1/2/7

से महर्षि जैमिनि को यह नहीं कहना पड़ता कि इन्द्रादि देवताओं का कोई दूसरा इन्द्रादि देवता ही नहीं होता । इसलिए उनका कर्म में अधिकार नहीं है।

वे सीधे कह देते कि– शब्दस्वरूप देवता विग्रहादि रहित हैं । इसलिए उनका कर्म में अधिकार नहीं है ।-

” न देवतानां विग्रहादिपञ्चकाभावात्”

किन्तु उन्होंने ऐसा न कहकर दूसरे इन्द्रादि का निषेध किया।
अत: देवताओं का विग्रहादिपंचक महर्षि जैमिनि को भी अभिप्रेत है।

अत एव श्रीखण्डदेव भाट्टदीपिका में देवता के विग्रहादिपंचक के निरासक ‘शाबर भाष्य’ पर कटाक्ष करते हुए उसे अनादरणीय कह रहे हैं–

“देवादीनान्तु विग्रहाद्यभावादेव नाधिकार इति भाष्योक्तमनधिकारप्रतिपादनमनादरणीयमेव।”
–भाट्टदीपिका-6/1/2

अत एव श्रीत्रिपाठी जी का ” मीमांसक तो शब्द समवायिनी देवता मानते हैं- – यह कथन धूलिधूसरित हो गया।

यद्यपि श्रीत्रिपाठी जी मीमांसा के विद्वान् हैं- इसमें कोई सन्देह नहीं है। हम दोनों ने मीमांसा का अध्ययन गुरुवर श्रीपट्टाभिराम शास्त्री जी के श्रीचरणों में बैठकर किया है।

तथापि जो विग्रहादिपंचकनिराकरणरूपी मत श्रीखण्डदेवादि द्वारा खण्डित हो चुका है। उसे क्यों प्रस्तुत किये?

 ठीक है। श्रीखण्डदेवादि का ध्यान आपको नहीं रहा। या उनमें अनादरबुद्धि रही हो। अथवा कोई अन्य कारण हो। तो भी जिनके नाम पर श्रीरामानुज सम्प्रदाय प्रसिद्ध है। अपने उन परमाचार्य श्रीरामानुजाचार्य जी महाराज का भी ध्यान आपको नहीं रहा!!!

“वेदार्थसंग्रह” नामक ग्रन्थ में देवता के स्वरूप,गुण और कर्म को स्वीकार करते हुए मन्त्र और अर्थवाद का नाम लेकर उद्घोष किया है–

“एतदुक्तं भवति सर्वो ह्यर्थवादभागो देवताराधनभूतयागादे: साङ्गस्य आराध्यदेवतायाश्च अदृष्टरूपान् गुणान् सहस्रो वदन्
सहस्रश: कर्मणि प्राशस्त्यबुद्धिमुत्पादयति; तेषामसद्भावे प्राशस्त्यबुद्धिरेव न स्यादिति कर्मणि
प्राशस्त्यबुद्ध्यर्थं गुणसद्भावमेव बोधयतीति । अनयैव दिशा सर्वे मन्त्रार्थवादावगता ह्यर्थास्सिद्धा: ।।”

इतना ही नहीं।

भगवान् बादरायण कृष्णद्वैपायन व्यास के ब्रह्मसूत्र में देवताधिकरण के

“तदुपर्यपि बादरायणस्सम्भवात् “-1/3/25

पर श्रीभाष्य में आपके आचार्य श्रीरामानुजाचार्य जी महाराज ने “नह्यशरीराणां देवादीनां–” नहि देवादीनां सशरीरत्वे प्रमाणमुपलभामहे –” से देवताओं के विग्रहाभाव को लेकर उनका ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं है — ऐसा पूर्वपक्ष प्रस्तुत करते हुए मन्त्र,अर्थवादादि द्वारा देवताओं के विग्रहादि को दर्शाया है–

कर्मविधिशेषभूतमन्त्रार्थवादेष्वपि ” वज्रहस्त: पुरन्दर:”
” तेनेन्द्रो वज्रमुदयच्छत्” इत्यादिभि: प्रतीयमानं विग्रहादिमत्त्वं प्रमाणान्तराविरुद्धं तत्प्रमेयमेव।–
श्रीभाष्य-1/3/25

श्रीभाष्यकार भगवान् श्रीरामानुजाचार्य जी की भी उपेक्षा आपने कर दी!!!

एक विद्वान् शास्त्रीय चर्चित करे। यह बहुत ही सुन्दर बात है। पर किसी पक्ष का निराकरण करते समय स्वयं अपने परमाचार्य के विरुद्ध लिख दे। यह अवश्य ही आश्चर्यजनक है।

इस प्रकार अपने आचार्यश्री के विरुद्ध लिखकर आप भक्तजनों को भ्रान्ति सिन्धु में डुबोने का प्रयास क्यों कर रहे हैं ? भगवन्!????

इस प्रकार आपके द्वारा प्रस्तुत आक्षेप उक्तरीत्या ध्वस्त हो गया।

आक्षेप–

नैयायिक जी जिस वेदांत से संबंध रखते हैं उसमें राम कृष्ण परमात्मा है परमात्मा तो नारायण भी हैं । फिर भी रामानुज संप्रदाय में परिगृहीत होने से वे नैयायिक जी के द्वारा आलोचनीय हो गए हैं ।-प्रो•कमलाकान्त त्रिपाठी

आचार्य सियारामदास नैयायिक —
समाधान —

नहीं भगवन्!

“अन्यत्रानिन्दनञ्चैव स्वेशे स्नेहाधिकं तथा ।”
इस मारुतिवचन का पालन करने वाले हम लोग भगवान् नारायण क्या, किसी भी भगवत्स्वरूप की आलोचना नहीं करते हैं। यह आपका भ्रममात्र है।

दूसरी बात यह कि भगवान् नारायण मात्र श्रीरामानुज सम्प्रदाय में परिगृहीत नहीं हैं। शांकर परम्परा में भी वे परिगृहीत हैं —

” नारायणं पद्मभवं वशिष्ठमित्यादि रूपेण शांकर परम्परा में वे अहर्निश स्मृत होते हैं।

हमारे श्रीरामानन्दसम्प्रदाय के परमपूज्य आचार्य श्रीनारायणदास जी महाराज ने “जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय” जयपुर में बनाया है ।

यदि हमारे यहां भगवान् नारायण के प्रति अनादर बुद्धि होती या वे आलोचनीय होते। तो महाराजश्री का नाम ” नारायणदास” क्यों रखा जाता ?

श्रीत्रिपाठी जी! आप स्वयं लिख रहे हैं कि “परमात्मा तो नारायण भी हैं।”

यहां आप भगवान् नारायण का नाम ऐसे ले रहे हैं जैसे वे कोई सामान्य देवता हों। और उनका आलोचक मुझे बतला रहे हैं!!!

क्रमशः

आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य
जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य पीठ, रघुनाथ मन्दिर माउंट आबू, सिरोही, राजस्थान

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