।।पुलस्त्य उवाच।।
पुलस्त्य जी बोले–
॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ जम्बूतीर्थमनुत्तमम् ॥
तत्र स्नातो नरः सम्यगिष्टं फलमवाप्नुयात् ॥ जम्बूद्वीपसमुत्थानां तीर्थानां नृपसत्तम ॥ १ ॥
हे नृपश्रेष्ठ! तत्पश्चात् मनुष्य अत्युत्तम जंबू तीर्थ जाय। हे राजेन्द्र! वहां स्नान करने से प्राणी जंबूद्वीप में विराजमान संपूर्ण तीर्थों के अभीष्ट फलों पूर्णतया को प्राप्त कर लेता है।।१।।
आसीत्पुरा निमिर्नाम क्षत्रियः सूर्यवंशजः ॥
वयस: परिणामे स पर्वतं चार्बुदं गतः ॥ २ ॥
पूर्वकाल में सूर्यवंश में समुत्पन्न निमि नामक एक क्षत्रिय थे। वृद्धावस्था आने पर वे आबू पर्वत गये।।२।।
प्रायोपवेशनं कृत्वा स्थितस्तत्र समाहितः ॥ अथाजग्मुर्मुनिगणास्तस्य पार्श्वे सहस्रशः ॥ ३ ॥
वे वहां आमरणांत अनशन करके एकाग्रचित्त से बैठ गये। तब उनके समीप हजारों की संख्या में मुनिगण आये।।३।।
चक्रुर्धर्मकथां पुण्यां राजर्षीणां महात्मनाम् ॥ देवर्षीणां पुराणानां तथान्येषां महात्मनाम् ॥ ४ ॥
वे साधु पुरुष राजर्षि महात्माओं, देवर्षियों तथा अन्य प्राचीन महात्माओं की धर्ममयी कथा करने लगे।।४।।
ततः कश्चित्कथान्ते च लोमशो नाम सन्मुनिः ॥ कीर्त्तयामास माहात्म्यं सर्वतीर्थसमुद्भवम् ॥ ५॥
कथा पूर्ण होते ही वहां लोमश नाम के एक सत्यनिष्ठ महामुनि पधारे। और उन्होंने समस्त तीर्थों के सेवन से समुत्पन्न फलों का महत्त्व बतलाया।।५।।
तच्छ्रुत्वा पार्थिवो राजन्निमिः परमदुर्मनाः ॥
बभूव न कृतं पूर्व यतस्तीर्थावगाहनम् ॥ ६ ॥
हे राजन्! उन तीर्थों का माहात्म्य सुनकर महाराज निमि बड़े खिन्न हुए ; क्योंकि उन्होंने इससे पहले किसी भी तीर्थ में जाकर स्नान नहीं किया था।।६।।
ततः प्रोवाच तं विप्रमस्त्युपायो द्विजोत्तम ।। कश्चिद्येन च सर्वेषां तीर्थानां लभ्यते फलम् ॥ ७ ॥
उन्होंने उन ब्राह्मण से कहा कि हे द्विजश्रेष्ठ! कोई ऐसा उपाय है कि जिसके करने से सभी तीर्थों का फल प्राणी को प्राप्त हो जाय ? ।।७।।
॥ ॥ लोमश उवाच ॥
महर्षि लोमश बोले–
॥ दया मे नृप सञ्जाता त्वां दृष्ट्वा दुःखितं भृशम् ॥ तीर्थयात्राकृते यस्मात्करिष्येऽहं तव प्रियम् ॥ ८ ॥
हे राजन् ! तीर्थयात्रा के लिए आपको दु:खी देखकर मेरे हृदय में बड़ी दया उत्पन्न हो रही है। इसलिए मैं आपका प्रिय अवश्य करूंगा।।८ ।।
अत्रैव चानयिष्यामि जम्बूद्वीपोद्भवानि च ॥ सर्वतीर्थानि राजेन्द्र मन्त्रशक्त्या न संशयः ॥ ९ ॥
हे राजेन्द्र! मैं मन्त्रों की शक्ति से जम्बूद्वीप में प्रकट हुए सभी तीर्थों को यहां आबू में ले आऊंगा। इसमें कोई संशय नहीं है।।९।।
स्रानं कुरु महाराज ह्येकीभूतेषु तत्र च ॥ अस्मिञ्जलाशये पुण्ये सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम् ॥१०॥
हे महाराज! इस पुण्यमय जलाशय में एकत्र हुए सभी तीर्थों में आप स्नान करें। मैं आपसे यह सत्य बात कहता हूं।।१०।।
एवमुक्त्वा स विप्रर्षिर्ध्यानं चक्रे समाहितः ॥ ततस्तीर्थानि सर्वाणि तत्रायातानि तत्क्षणात् ॥११॥
ऐसा कहकर उन ब्रह्मर्षि लोमश ने एकाग्र होकर ध्यान किया। उनके ध्यान करते ही तत्क्षण वहां सभी तीर्थ आ गये।।११।।
प्रत्ययार्थं च राजर्षे जम्बूवृक्षो व्यजायत ।
तत्र स्रानं नृपश्चक्रे सर्वतीर्थमये ध्रुवे ॥ १२ ॥
राजा के विश्वास हेतु वहां जलाशय के समीप एक जामुन का वृक्ष उत्पन्न हो गया। यह वृक्ष जंबूद्वीप से आये समस्त तीर्थों का विश्वास दिला रहा था। तब उस सर्वतीर्थमय स्थिर सरोवर में उन महाराज ने स्नान किया।।१२।।
सदेहश्च गतः स्वर्गे तीर्थस्नानादनन्तरम् ॥
ततः प्रभृति तत्तीर्थं जम्बूतीर्थमनुस्मृतम्॥१३ ॥
सर्वतीर्थमय उस जलाशय में स्नान करते ही वे महाराज तीर्थस्नान के फलस्वरूप सदेह स्वर्ग चले गये। उसी समय से वह तीर्थ जम्बूतीर्थ के नाम से ऋषियों द्वारा स्मरण किया जाने लगा।।१३।।
कन्यागते रवौ तत्र यः श्राद्धं कुरुते नरः ॥ गयाशीर्षसमं तस्य पुण्यमाहुर्महर्षयः ॥ १४ ॥
कन्या राशि पर सूर्य के आने पर जो प्राणी वहां श्राद्ध करता है। उसे गयाशीर्ष ( फल्गु नदी के तट की मुख्य वेदी पर ) में श्राद्ध करने का पुण्य मिलता है– ऐसा महर्षियों ने कहा है।।१४।।
इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे जम्बूतीर्थप्रभाववर्णनं नाम षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥
इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” जम्बूतीर्थ के माहात्म्य” का वर्णन करने वाला ६० वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

