किसी वाक्य के विपरीत अर्थ की कल्पना करके प्रयोक्ता के वाक्य का विरोध छल कहा जाता है–
“वचनविघातोSर्थविकल्पोपत्त्या छलम् “–न्यायदर्शन, अध्याय-१, आह्निक-२, सूत्र-१०,
महर्षि गौतम ने छल का निरूपण ८ सूत्रों में किया है । जिसका विस्तार भगवान् वात्स्यायन ने मनोरम ढंग से विभिन्न उदाहरणों द्वारा वात्स्यायन भाष्य में किया है । यह छल तीन प्रकार का होता है —
१-वाक्छल
२-सामान्य छल
३–उपचारच्छल
१-वाक्छल– सामान्यरूप से कहे गये वक़्ता के अभिप्राय से विपरीत अर्थ की कल्पना वाक्छल कही जाती है । जैसे ” नवकम्बलोSयं माणवक:” यह वाक्य “नव:=नवीन:, कम्बलो अस्य” इस अर्थ में किसी ग़रीब ब्रह्मचारी के नये कम्बल को बताने हेतु प्रयुक्त किया गया । अब प्रतिवादी ने नवार्थक नव शब्द का अर्थ “नया” न लेकर नवसंख्या वाला अनभिमत ९ अर्थ को लेकर प्रतिषेध किया कि इसके पास तो एक ही कम्बल है । ९ नहीं । आप इसे नवकम्बल कह रहे हैं । यह वाक्छल है ।
ध्यातव्य है कि “नवकम्बल:” इस समास में ” नव:=नवीन: और नव:=नवसंख्याक: ये दोनों अर्थ लेकर विपरीत अर्थ की उद्भावना की जा सकती है । वादी से विपरीत “नव कम्बला: यस्य” ऐसा विग्रह करके दोष दिया कि इसके पास नौ कम्बल कहाँ हैं ? एक ही तो है । इस प्रकार सामान्यतया प्रयुक्त वाक्य में छल वाक्छल कहा जाता है —
“अविशेषाभिहितेSर्थे वक्तुरभिप्रायादर्थान्तरकल्पना वाक्छलम् ॥”
–न्यायदर्शन,१/२/१३ सूत्र
वस्तुस्थिति यह है कि सामान्य अर्थ में कुछ शब्द प्रयुक्त होते हैं तो कुछ विशेष अर्थ में । जैसे “अजां ग्राम नय”, ( बकरी को गाँव ले जाओ) सर्पिराहर”( घी लाओ ), “ब्राह्मणं भोजय” ( ब्रह्मण को भोजन कराओ ) यहाँ अजा, सर्पि:, ब्राह्मण ये सामान्य शब्द हैं जैसे अजा शब्द सांख्यों के यहाँ प्रकृति अर्थ में तो लोक में बकरी अर्थ में प्रसिद्ध है । अब “अजां नय:” प्रयोग होने पर यदि कोई प्रकृति अर्थ लेकर उसके आनयनक्रिया की असम्भाव्यता बतलाता है तो यह उसका छल है; क्योंकि समाज में बकरी लाने के लिए उस शब्द का प्रयोग दृष्टिचर है । आनयनक्रिया का अन्वय एक बकरी में सुलभ है । और बकरी के तात्पर्य से अजा शब्द प्रयुक्त हुआ है । यहाँ अर्थान्तर की कल्पना छल होगा । ठीक ऐसे ही “नवकम्बलोSयं माणवक:” इस स्थल में भी नूतनार्थ में प्रसिद्ध नव शब्द का अर्थ लेकर उक्त प्रयोग अनुभूत है । अत: वहाँ उससे विपरीत अर्थ की कल्पना
अनुचित है ।—क्रमश:
जय श्रीराम
#आचार्यसियारामदासनैयायिक

