देहादिषु त्वहंबुद्धि: विचारेण निवर्तते।
मोक्षाय साधनं सर्वं व्यर्थं हि निर्विचारकम्।।६।।
देह आदि में जो अहंबुद्धि है । वह सम्यक् विचार से ही निवृत्त होती है। मोक्ष के लिए किये जाने वाले वे सभी साधन व्यर्थ हैं। जो विचार रहित हैं।।६।।
विचार का स्वरूप —
नाहं स्थूलशरीरं वै स्वप्ने चास्य अदर्शनात् ।
दर्शनं त्वहमर्थस्य अतो देहात् पृथक् त्वहम्।।७।।
मैं स्थूल शरीर नहीं हूं ; क्योंकि स्वप्नावस्था में इस स्थूल शरीर का अनुभव नहीं होता । किन्तु अहमर्थ मैं मैं इस प्रकार अनुभव होता है। इसलिए मैं स्थूल देह से भिन्न हूं।। इस प्रकार साधना के समय साधक को चिंतन करना चाहिए। इससे शरीर से अहंबुद्धि हटने लगती है।।७।।
स्वप्नावस्था में दृष्ट स्वरूप से भिन्नता का विचार
यत्स्वरूपं मया स्वप्ने दृष्टं तस्मात् पृथग् ह्यहम्।
सुषुप्तौ गाढनिद्रायां त्वहमस्मि न तत् तदा।।८।।
स्वप्नावस्था में जो स्वरूप मैं मैं का मैंने अनुभव किया था। वह मैं नहीं हूं। उससे मैं पृथक् हूं ; क्योंकि सुषुप्ति में प्रगाढ़
निद्रा के समय तो मैं रहता हूं किन्तु उस समय यह स्वप्नावस्था वाला स्वरूप नहीं रहता है।।८।।
-#आचार्यसियारामदासनैयायिक


जय सिताराम। पूर्व के श्लोक पोस्ट करने के लिए विनती 🙏🏻
अद्भुत जय श्री सीताराम
सादर दंडवत प्रणाम !! सर्वेश्वर भगवान श्रीरघुनाथ जी की जय !! जय जय श्रीसीताराम !!
जय जय श्रीसीताराम आदरणीय श्रीकृपाशंकर जी।
जय जय श्रीसीताराम आदरणीय श्रीकृपाशंकर जी।