श्रीराम जय राम जय जय राम मन्त्र का पुरश्चरण
रामरहस्योपनिषद् में बतलाया गया है कि “श्रीराम जय राम जय जय राम” 13अक्षरों का मन्त्रराज है-
श्रीरामेति पदं चोक्त्वा जयरामपदं तत: ।
जयद्वयं वदेत् प्राज्ञो रामेति मनुराजक: ।।
–रामरहस्योपनिषद्-2/56-57
श्रीराम ऐसा पद बोलकर बाद में जय राम पद बोले।तत्पश्चात् 2वार जय जय, पुन: राम पद बुद्धिमान् बोले । इस प्रकार “श्रीराम जय राम जय जय राम”
यह (“मनुराजक:”=) मन्त्रराज होगा । यह 13अक्षरों का मन्त्रराज है । इसके ऋषि आदि पूर्ववत् हैं । और यह सम्पूर्ण फलों को देने वाला है ।–
” त्रयोदशार्ण ऋष्यादि पूर्ववत् सर्वकामद: ।
–रामरहस्योपनिषद्-2/57,
ऋष्यादि पूर्ववत् –इससे पहले द्वादशाक्षर राममंत्र(ॐ
ह्रीं भरताग्रज राम क्लीं स्वाहा ) की चर्चा है। जिसका छन्द “जगती” बतलाया गया है । उसके समान इसके भी ऋषि, छन्द, ध्यान आदि हैं ।
द्वादशाक्षर राम मन्त्र के ऋषि भगवान् राम और जगती छन्द तथा देवता भी श्रीराम ही कहे गये हैं।
इससे यह सिद्ध हुआ कि 13दशाक्षर “श्रीराम जय राम जय जय राम” मन्त्रराज के ऋषि भी भगवान् राम, छन्द जगती और देवता भी श्रीराम ही हैं।
पुरश्चरण का नियम
आचमन करके आसन और देहशुद्धि करें । पुन:
विनियोग–अस्य त्रयोदशाक्षर श्रीरामजयरामजयजयरामेति मन्त्रराजस्य श्रीराम: ऋषि: जगती छन्द: श्रीरामो देवता चतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थे अथवा भगवद्दर्शनार्थे जपे विनियोग: ।
ऋष्यादिन्यास–
श्रीरामाय ऋषये नमः शिरसि
जगतीछन्दसे नमो मुखे
श्रीरामदेवतायै नमो हृदि
चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धये जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे।
अङ्गन्यास–
श्रीराम जय श्रीराम जय अङ्गुष्ठाभ्यां नम:
राम जय राम जय तर्जनीभ्यां नमः
जय राम जय राम मध्यमाभ्यां नम:
श्रीराम जय श्रीराम जय अनामिकाभ्यां नम:
राम जय राम जय कनिष्ठिकाभ्यां नम:
जय राम जय राम करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:
हृदयादिन्यास–
श्रीराम जय श्रीराम जय हृदयाय नम:
राम जय राम जय शिरसे स्वाहा
जय राम जय राम शिखायै वषट्
श्रीराम जय श्रीराम जय कवचाय हुं
राम जय राम जय नेत्राभ्यां वौषट्
जय राम जय राम अस्त्राय फट्
दिग्बन्धन–
रां रक्षतु प्राच्यां
रां रक्षतु आग्नेय्यां
रां रक्षतु दक्षिणे
रां रक्षतु नैर्ऋत्ये
रां रक्षतु प्रतीच्यां
रां रक्षतु वायव्यां
रां रक्षतु उदीच्यां
रां रक्षतु ईशान्यां
रां रक्षतु उर्ध्वं
रां रक्षतु अधो माम्
इस प्रकार छोटिका मुद्रा से दिग्बन्धन करके भगवान् श्रीराम का ध्यान करें–
ध्यान–
कालाम्भोधरकान्तिकान्तमनिशं वीरासनाध्यासितं
मुद्रां ज्ञानमयीं दधानमपरं हस्ताम्बुजं जानुनि ।
सीतां पार्श्वगतां सरोरुहकरां विद्युन्निभां राघवं
पश्यन्तं मुकुटाङ्गदादिविविधाकल्पोज्जवलाङ्गं भजे ।।
नीलमेघ के समान कान्ति वाले, सर्वांग सुन्दर, वीरासन से विराजमान ज्ञानमुद्रा को धारण किये हुए और वाम करकमल को बाये घुटने पर रखे हुए तथा अपने वाम भाग में सुशोभित कमलपुष्प हाथ में ली हुई श्रीजानकी जी पर प्रेममयी दृष्टि वाले, मुकुट, बाजूबंद आदि अनेक आभूषणों से अलंकृत, शृंगाररसस्वरूप एवं स्वयं प्रकाश श्रीराम का मैं भजन करता हूं ।
इसके बाद रां इस बीज से प्राणायाम करें और तीन वार आचमन करके मन्त्र जप आरम्भ करें।
इस मन्त्र में जो ध्यान बतलाया गया है । उससे धन सम्पत्ति एवं दाम्पत्यप्रेम विना संकल्प के ही प्राप्त
होता है । इसका पुरश्चरण 13 लाख जप का है।
इसका संकीर्तन करने का उल्लेख नृसिंह पुराण
में है ।
दिन में सर्वप्रथम इसका विनियोग आदि करके 1माला जप लें । उसके बाद अन्यत्र भी जप किया जा सकता है ; क्योंकि इस मन्त्र के 13 अक्षर भगवान् के नाम हैं ।
श्रीराम= श्री अर्थात् सीता सहित राम
चराचर जगत् में रमण करने वाले भगवान्
जय= जयति संसारम् इति जय:, जो सम्पूर्ण संसार पर विजय प्राप्त कर चुके हैं । ऐसे भगवान् (राम)
राम= योगिजन जिन सच्चिदानन्दघन परब्रह्म में रमण करते हैं। ऐसे राम।
जय= जयति जापक हृदयस्थ सर्वविकारानिति जय:
जो जापकों के हृदय में वसे हुए कामादि विकारों पर जय प्राप्त करते हैं। अर्थात् भक्तों के समग्र दोषों को नष्ट कर देते हैं। ऐसे रक्षक राम।
जय= जयति भक्तमनांसि इति जय: । जो भक्तों के मन को ही जीतकर अपना बना लेते हैं। ऐसे भक्तहृदयकमलविहारी भगवान् राम ।
राम= रामो रमयतां वर:, भक्तों को रमण कराने वाले अर्थात् आनन्द देने वाले राम । “आनंद हू के आनंददाता” ।
इस प्रकार अनुसन्धान करते हुए
जप करें ।
जय श्रीराम
–#आचार्यसियारामदासनैयायिक

