प्रो• हरिनारायण तिवारी ने ” एतया निषादस्थपतिं याजयेत्” इस श्रुतिवाक्य को लेकर जिस अमर्यादित भाषा में प्रश्न तथा आक्षेप किया है। उसका उत्तर इस वीडियो में उसी भाषा में दिया गया है; क्योंकि वादी अपने प्रश्न का विषय जिस वचोवैचित्री से प्रस्तुत करता है। प्रतिवादी को भी उत्तर रूप में वैसी ही शैली अपनानी चाहिए —
- यथाविधं यं विषयं निजस्य
प्रश्नस्य निर्वक्ति परो ययोक्त्या।
वाच्यस्तथैवोतरवादिनाSपि
तयैव वाचा स तथाविधोSर्थ: ।।
–खण्डनखण्डखाद्यम्-३/१
प्रष्टा ने जिस पदावली में प्रश्न किया है । उस विषय का उत्तर करने में वही पदावली सक्षम हो सकती है। अन्यथा प्रष्टा की आस्था उस पर क्यों होती?–
प्रश्नस्य य: स्याद्विषय: स वाच्यो
वाचा तया चैष भवेन्निरुक्त: ।
इदं त्वयाप्यास्थितमेतयैव
गिरा स्वपृच्छाविषयस्य वक्त्रा ।।
—-खण्डनखण्डखाद्यम्-३/२
इनके द्वारा पूछे गये-” छन्दसि दृष्टानुविधि:” वचन का उत्तर करके, इनसे कथित” तेन छन्दसि सर्वे विधय: विकल्प्यन्ते” परिभाषा में मैंने तेन पद इनके वीडियो में इनके द्वारा घुसेड़ा हुआ सिद्ध कर दिया है;
पण्डित जी से मैंने भी कि “अर्थवदधातुरप्रत्यय: प्रातिपदिकम्” सूत्र में “अधातु:” का परिष्कार प्रस्तुत करते हुए एक प्रश्न भी पूछा है।
सिद्धान्तकौमुदी की लक्ष्मीव्याख्या में “तत्र भेदश्च धातुत्वपर्याप्तावच्छेदकताकप्रतियोगिताको ग्राह्य:, इति न धातुघटोभयभेदमादाय दोष:” कहा गया है; क्योंकि धातुघटोभयन्नेत्याकारकभेद धातुत्वपर्याप्तावच्छेदकताकप्रतियोगिताक नहीं है।वह धातुत्वघटत्वोभयत्वपर्याप्तावच्छेदकताकप्रतियोगिताक है– ऐसा समाधान किया गया है। किन्तु वहां दोष अभी भी है; क्योंकि
” नह्यवयवापर्याप्तस्य समुदाये पर्याप्तिरस्ति” इस न्याय से जो अवयवों में अपर्याप्त है, वह समुदाय में पर्याप्त नहीं है। इसलिए “धातुघटोभयं न” इत्याकारकभेदीयप्रतियोगितावच्छेदकता जो धातुत्वघटत्वोभयत्वरूप समुदाय में पर्याप्तिसंबंध से है। वह तादृशसमुदायघटक धातुत्व में भी रहेगी। अत एव धातुघटोभयभेद भी धातुत्वपर्याप्तावच्छेदकताकप्रतियोगिताक भेद है। इसलिए उसे लेकर पूर्वोक्त दोष अभी भी प्रसक्त है।
तो इस दोष का वारण करके दिखाओ।
साढ़े चार पंक्तियों में शाब्दबोध की कुछ झलक जो इस वीडियो में विशद रूप में 14 पंक्तियों में है–
“अभेदसम्बन्धावच्छिन्नाचार्यत्वावच्छिन्नप्रकारतानिरूपितकर्तृत्वावच्छिन्नविशेष्यत्वावच्छिन्नप्रकारतानिरूपितविशेष्यतासमानाधिकरणाभेदसम्बन्धावच्छिन्ननिषादस्थपतित्वावच्छिन्नप्रकारतानिरूपितकर्मत्वावच्छिन्नविशेष्यत्वावच्छिन्न—”
इत्यादि। यह नव्यन्याय की शैली में है।
इस प्रकार इस वीडियो में अनेक तथ्य प्रस्तुत हुए हैं। मनीषियों के वार वार अनुरोध करने पर यह वीडियो बनाया गया है।
– आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य
जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य वेदान्तपीठ,
रघुनाथ मन्दिर नक्की लेक, माउंट आबू,
सिरोही, राजस्थान

