शिवलिंगमाहात्म्यपूर्वक सत्तू के दान का माहात्म्य

अध्याय-३९

।।ययातिरुवाच ॥

ययाति जी बोले —

 ॥ यत्त्वया कीर्तितं ब्रह्मन्पूर्वं देवः प्रसादितः ॥

 लिङ्गं संस्थापयामास स्थिररूपो महेश्वरः ॥ १ ॥

हे विप्रवर! आपने जो यह कहा कि पूर्वकाल में देवताओं द्वारा प्रसन्न किये जाने पर कूटस्थ भगवान् आशुतोष ने आबू पर्वत के शिवलिंग कुण्ड में लिंग की स्थापना की।।१।।

 कस्मात्तत्पातितं लिङ्गं वालखिल्यैर्महात्मभिः ॥ कस्मात्तत्राचलो जातो देवदेवो महेश्वरः ॥ २ ॥

आप यह बतलायें कि वालखिल्य महात्माओं ने उस शिवलिंग क्यों गिरा दिया था? और वहां भगवान् महेश्वर अचल कैसे हुए।।२।।

 एतन्मे कौतुकं सर्वं यथावद्वक्तुमर्हसि ॥ 

तस्मिन्दृष्टे च किं पुण्यं नराणां तत्र जायते ॥३॥ 

मेरे हृदय में बड़ा कुतूहल हो रहा है। इस विषय में आप सब कुछ विस्तार से बतलायें। और यह भी बतलायें कि उस शिवलिंग का दर्शन करने पर प्राणियों को कौन सा पुण्य उत्पन्न होता है ।।३।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले– 

 ॥ महेश्वरस्य माहात्म्यं शृणु पार्थिवसत्तम ।।

अत्र ते कीर्तयिष्यामि पुरावृत्तं कथान्तरम्।।४।।

हे नृपश्रेष्ठ! भगवान् शिव का माहात्म्य सुनें। इस विषय में मैं आपको पूर्वकाल में घटे रहस्यों की एक दूसरी कथा सुना रहा हूं।।४।।

 यदा पञ्चत्वमापन्ना सती सत्यपराक्रमा।अपमानेन दक्षस्य यज्ञे न च निमंत्रिता ॥ ५ ॥

जब दक्षयज्ञ में निमंत्रण के विना ही पहुंची हुई त्रिकालाबाधित पातिव्रत्यादि शक्तियों से सम्पन्न भगवती सती ने भगवान् शिव के अपमान से दु:खी होकर अपने शरीर का परित्याग कर दिया ।।५।।

तदा कामो द्रुतं गृह्य पुष्पचापं तमभ्यगात् ॥ कन्दर्पं सहसा दृष्ट्वा सन्धितेषु सुदुर्जयम् ॥ ६ ॥

तब शीघ्र ही कामदेव ने अपने पुष्प धनुष को लेकर भगवान् शिव का पीछा किया। भगवान् भव अचानक महादुर्जय बाण का संधान किये हुए काम को देखकर ।।६।।

आपतन्तं भयात्तस्य प्रणष्टस्त्रिपुरान्तकः ॥स तदा भ्रममाणश्च इतश्चेतश्च पार्थिव ॥ ७ ॥

उसके भय से अन्तर्ध्यान हो गये। यद्यपि वे त्रिपुरान्तक हैं। तथापि (फिर भी) उन्होंने ऐसी लीला की। हे राजन्! उस समय वे इधर उधर भ्रमण करते हुए।।७।।

वालखिल्याश्रमं प्राप्तः पुण्यं सद्वृक्षशोभितम् ॥स तत्र भगवांस्तेषां दारैर्दृष्ट: सुरूपवान्।।८।।

वाल्खिल्य ऋषियों के आश्रम पहुंचे। वह आश्रम बड़ा पुण्यमय तथा सुंदर वृक्षों से सुशोभित था। वहां पर उन ऋषियों की पत्नियों ने सुंदर रूप वाले भगवान् शिव को देखा।।८।।

दिग्वासाः सुप्रियालापस्ततस्ताः काममोहिताः । त्यक्त्वा पुत्रगृहाद्यं च सर्वास्तत्पृष्ठसंस्थिताः ॥ बभूवुश्चानिशं राजन् मां भजस्वेति चाब्रुवन् ॥ ९ ॥

मधुरभाषी दिगम्बर भगवान् सतीपति को देखकर मुनिपत्नियां काम से उन पर मोहित हो गयीं। और घर द्वार तथा पुत्रादि को छोड़कर दिन रात उनके पीछे लग गयीं । हे राजन्! उन मुनि की नारियों ने भगवान् शिव से प्रार्थना की कि आप हम लोगों का सेवन करें।।९ ।।

 चक्रुरालिङ्गनं काश्चिच्चुम्बनं च तथापराः ।॥ अन्यास्तस्य हि लिङ्गं तत्स्पृशन्ति च मुहुर्मुहु: ॥३०॥

उनमें कुछ तो उनका आलिंगन करने लगीं तो कुछ चुंबन लेने लगीं। कुछ नारियां तो मर्यादा की सीमा तोड़कर उनके शिश्नेन्द्रिय को वार वार स्पर्श करने लगीं ।।३०।।

 स चापि भगवाञ्छम्भुर्निष्कामः परमेश्वरः ॥ जगद्व्याप्तिं समाश्रित्य सर्वप्राणिषु वर्तते ॥ ११ ॥

भगवान् शिव तो समस्त जीवों के स्वामी और प्राकृत कामादि विकारों से शून्य हैं। वे सम्पूर्ण संसार में अपनी व्यापकता का आश्रय लेकर सभी प्राणियों में विराजमान हैं।।।११।।

स चापि भगवाञ्छम्भुस्तासां सरति प्राङ्मुखः ॥ भ्रान्तस्तत्राश्रमे तेषां दारान् कामेन पीडयन् ॥ १२ ॥

उस आश्रम में भगवान् शिव अपने सुंदर रूप के कारण उन महिलाओं को काम से पीड़ित करते हुए उनके सामने से चल रहे थे।।१२।‌

अथ ते मुनयो दृष्ट्वा विकृतिं दारसंभवाम् ॥ अजानन्तो महादेवं रुष्टास्तस्य महात्मनः ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् उन वाल्खिल्य मुनियों ने अपनी अपनी पत्नियों में उत्पन्न कामविकार को देख क्रुद्ध होकर महात्मा भगवान् शिव को न जानने के कारण।।१३।।

ददुः शापं सुसंतप्ताः कलत्रार्थे परंतप ॥ पततां पततां लिङ्गमेतत्ते पापकृत्तम ॥ १४ ॥

हे राजन्! क्रोध से संतप्त होकर पत्नियों के लिए शिव जी को शाप दे दिया कि हे महापापिन् ! तेरा यह लिंग शीघ्र ही धरती पर गिर जाय।।१४।।

विडम्बयसि नो दारानजस्रं चास्य दर्शनात् ॥ ततश्चैवापतल्लिङ्गं तत्क्षणात्तत्पुरद्विषः ॥ १५ ॥

क्योंकि इसके दर्शन द्वारा तुम हमारी पत्नियों के साथ अन्याय कर रहे हो। शाप देते ही त्रिपुरान्तक भगवान् शिव का लिंग पृथ्वी पर गिर पड़ा।।१५।।

ब्रह्मवाक्येन राजर्षे चकम्पे वसुधा ततः ॥शीर्णानि गिरिशृंगाणि चुक्षुभुर्मकरालयाः॥ १६ ॥

हे राजर्षे! उन ब्राह्मणों के शाप से पृथिवी हिलने लगी। पर्वत शिखर टूट टूट कर गिरने लगे और बड़ी बड़ी मछलियों के आश्रय सारे समुद्र क्षुब्ध हो उठे।।१६।।

 ततो देवगणाः सर्वे भयत्रस्ता नराधिप ॥अकाले प्रलयं मत्वा त्रैलोक्ये पर्यवस्थितम् ॥ १७ ॥

हे राजेन्द्र! तत्पश्चात संपूर्ण देवगण भय से संत्रस्त होकर तीनों लोकों में असमय आया हुआ प्रलय मानकर ।।१७।।

ततः पितामहं जग्मुस्तस्मै सर्व न्यवेदयन् ॥ प्रलयस्येव चिह्नानि दृश्यन्ते परमेश्वर ॥ १८ ॥

पितामह ब्रह्मा के पास पहुंचे और उनसे सब कुछ बतलाये। देवों ने कहा कि– हे परमेश्वर ! इस समय तीनों लोकों में प्रलय के समान लक्षण दिखाई दे रहे हैं।।

किं निमित्तं सुरश्रेष्ठ न जानीमो वयं प्रभो ॥तेषां तद्वचनं श्रुत्वा चिरं ध्यात्वा पितामहः ॥ १९ ॥

हे देवपूज्य पितामह! इसका क्या कारण है? हे प्रभो! हम लोग इसे नहीं जानते हैं । उन देवताओं की बात सुनकर पितामह ब्रह्मा ने दीर्घकल तक ध्यान करके ।।१९।।

 अब्रवीत्पातितं लिंगं वालखिल्यैः पिनाकिनः ॥तेनैते दारुणोत्पाताः संजाता भयसूचकाः ॥ २० ॥

 कहा। कि बालखिल्य मुनियों ने शाप देकर भगवान शिव के लिंग को गिरा दिया है । इसीलिए इस समय भयसूचक अनेक प्रकार के भयंकर उत्पात उत्पन्न हो रहे हैं ।।२०।।

तस्मान्मया समायुक्ताः सर्वे तत्र दिवौकसः ॥ब्रजन्तु येन तल्लिंगं स्थाने संस्थापयेच्छिवः ॥२१॥

इसलिए संपूर्ण देवता मेरे साथ मिलकर चलें। जिससे भगवान शिव उचित स्थान पर उस लिंग की स्थापना कर सकें ।।२१।।

यावन्नो जायते लोके प्रलयोऽकालसम्भवः ॥एवं संमंत्र्य ते सर्वे ततोऽर्बुदमुपाययुः ॥ २२॥

यह कार्य तब तक हो जाना चाहिए जब तक संसार में असमय में होने वाला प्रलय न आ जाय। इस प्रकार विचार करके ब्रह्मा जी के साथ वे सब देवगण आबू पर्वत पर आये ।।२२।।

वालखिल्याश्रमे यत्र तल्लिङ्गं निपपात ह ।। तुष्टुवुर्विविधैः सूक्तैर्वेदोक्तैर्विनयान्विताः ॥ २३ ॥

वालखिल्य मुनियों के आश्रम पर जहां वह लिंग गिरा था । वहीं पर विनीतभाव से अनेक वेदोक्त सूक्तों से उन लोगों ने शिवजी की स्तुति किया।।२३।।

 ॥ देवा ऊचुः ॥

देवगण बोले–

 ॥ नमस्ते देवदेवेश भक्तानां चाभयंकर ॥ नमस्ते सर्ववासाय सर्वयज्ञमयाय च ॥ २४ ॥

हे देवों के देव ! हे परमेश्वर ! हे भक्तों को अभय देने वाले ! हे सर्वत्र निवास करने वाले! हे सर्वयज्ञमय भगवन्! आपको नमस्कार है । नमस्कार है।।२४।।

 सर्वेश्वराय देवाय परमज्योतिषे नमः ।। नमः स्थूलाय सूक्ष्माय ज्ञानगम्याय वेधसे ॥ २५ ॥

सर्वेश्वर ! महादेव ! परम ज्योतिस्वरूप ! आपको नमन है। स्थूल ! सूक्ष्म ! ज्ञानैकप्राप्य ! भगवन् ! आपको प्रणाम है।।२५।।

 त्र्यम्बकाय च भीमाय पिनाकवरपाणये ॥ त्वयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ २६ ॥

हे त्रिनेत्र ! काल के लिए भयंकर ! श्रेष्ठ धनुष पिनाक हाथ में धारण करने वाले परमात्मन् ! आपको वार वार नमन है। जैसे सूत्र में मणियों का समूह पिरोया रहता है। ठीक वैसे ही यह संपूर्ण संसार आप में पिरोया हुआ है। अर्थात् आप सबमें व्याप्त हैं।।२६।।

 संसारे विबुधश्रेष्ठ जगत्स्थावरजंगमम् ॥ न तदस्ति त्रिलोकेऽस्मिन्सुसूक्ष्ममपि शंकर ॥ यत्त्वया न प्रभो व्याप्तं सृष्टिसंहारकारणात् ॥ २७ ॥

हे देवश्रेष्ठ ! संसार में जितनी भी स्थावर जंगमात्मक वस्तुएं हैं। उन सबमें आप व्याप्त हैं। हे जगत् का कल्याण करने वाले प्रभो! तीनों लोकों में ऐसी कोई भी सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तु नहीं है। जो विश्व की सृष्टि और संहार करने वाले आप से व्याप्त न हो।।२७।।

 पृथिव्यादीनि भूतानि त्वया सृष्टानि कामतः ॥ यास्यन्ति तानि भूयोऽपि तव काये जगत्पते ॥ २८ ॥

आपने अपने संकल्प से पृथिवी जल आदि महाभूतों की सृष्टि की है। हे जगत् के स्वामिन् ! वे सब प्रलयकाल में आपके दिव्य विग्रह में ही लीन हो जायेंगी।।२८।।

प्रसीद भगवंस्तस्माल्लिङ्गमेतत्सुरेश्वर ॥स्थाने स्थापय भद्रं ते यावन्न स्यात्प्रजाक्षयः ॥ २९ ॥

इसलिए हे भगवन्! आप हम सब पर प्रसन्न हों। और हे देवेश्वर! इस लिंग को तब तक किसी स्थान पर स्थापित कर दें। जब तक प्राणियों का विनाश नहीं हो जाता है।।२९।।

॥ श्रीभगवानुवाच ॥ 

श्रीभगवान् बोले —

निर्विकारञ्च मे लिङ्गं वाल्खिल्यै: प्रपातितम् ।।कथं भूयः प्रगृह्णामि यावच्छुद्धिर्न जायते ॥ ३० ॥

समस्त विकारों से शून्य मेरे लिंग को वाल्खिल्य मुनियों ने शाप से गिरा दिया है। जब तक इसकी शुद्धि नहीं हो जाती तब तक मैं इसे कैसे ग्रहण कर सकता हूं? ।।३०।।

शक्तोऽहं वालखिल्यानां निग्रहं कर्तुमञ्जसा ।किन्तु मे ब्राह्मणा मान्याः पूज्याश्चसुरसत्तमा:॥३१॥

 हे श्रेष्ठ देवताओं! यद्यपि इस अपराध के कारण मैं वाल्खिल्य मुनियों का शीघ्र ही दंड द्वारा निग्रह कर सकता हूं। फिर भी ब्राह्मण मेरे मान्य एवं पूज्य हैं। इसलिए ऐसा नहीं कर रहा। इससे सिद्ध होता है कि ब्राह्मण के अपराध को जहां तक हो सके सह लेना चाहिए।।३१।।

अचलं लिङ्गमेतद्धि नोद्धर्तुं शक्यते विभो ।एक एवात्र निर्दिष्ट उपायो नापरः स्मृतः ॥ ३२ ॥

मेरा यह लिंग अचल है। इसलिए इसे यहां से उठाकर हटाया नहीं जा सकता है। मैं एक ही उपाय का निर्देश कर रहा हूं। दूसरा कोई भी उपाय नहीं है।।३२।।

यदि मे त्वं पुरा लिङ्गं पूजयेथा: पितामह।

ततो  देवगणा: सर्वे ततो विप्रास्ततोSपरे।।३३।।

यदि इस लिंग की पूजा तुम सब देवता करो और ब्रह्मा जी भी करें। सभी देवगण और समस्त वाल्खिल्य विप्र एवम् अन्य लोग इस लिंग की पूजा करें।।३३।।

ततो वै शान्तिमागच्छेज्जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥३४॥

तत्पश्चात् ही स्थावर जंगमात्मक समस्त जगत् शान्ति को प्राप्त करेगा।।३४।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले– 

॥ एवमुक्तः स भगवाञ्छंकरेण नृपोत्तम ।ततस्तं पूजयामास ब्रह्मा पूर्वं सुभक्तितः ॥ ३५ ॥

हे राजेन्द्र! इस प्रकार भगवान् शंकर के द्वारा कहे जाने पर सबसे पहले ब्रह्मा जी ने भक्तिपूर्वक उस लिंग की पूजा की ।।३५।।

ब्रह्मणोऽनन्तरं विष्णुस्ततः शक्रस्ततोऽपरे ॥ वालखिल्यादयो विप्रा मन्त्रैश्च शतरुद्रियैः ॥ ३६ ॥

ब्रह्माजी के बाद भगवान विष्णु तत्पश्चात् देवराज इन्द्र और उसके बाद वाल्खिल्यादि विप्रों ने शतरुद्रिय के विविध मन्त्रों से उस लिंग की अर्चना की।।३६।।

ततस्ते दारुणोत्पाता उपशान्ताश्च तत्क्षणात् ॥ अभवत्सुसुखो लोको वृत्तो गन्धवहो मृदुः ॥ ३७ ॥

उसके बाद शीघ्र ही सभी भयंकर उत्पात शान्त हो गये। संसार पहले से भी अधिक सुखी हो गया।और मंद मंद सुगंधित वायु बहने लगी।।३७।।

 अथोवाच महादेवः सर्वांस्तांस्त्रिदशालयान् ॥ वृणुध्वं सुवरं सर्वे मत्तो यन्मनसीप्सितम् ॥ ३८ ॥ 

उस पूजन से प्रसन्न भगवान् शिव समस्त देवों से बोले कि तुम लोगों के मन को जो अभीष्ट सुंदर वर लगे। उसे मुझसे मांग लो।।३८।।

॥ देवा ऊचुः ॥

देवगण बोले–

 ॥ तव लिङ्गस्य संस्पृशादपि पापकृतो नराः ॥ स्वर्गं यास्यंति देवेश नाशं यास्यति किल्विषम् ॥ व्रतदानानि सर्वाणि तीर्थयात्रायुतानि च ॥ ३९ ॥

हे देवेश!आपके लिंग का स्पर्श करने से भी पापी पुरुष स्वर्ग जाएंगे ; क्योंकि आपके लिंग के स्पर्श से भी पाप नष्ट होता है । यहां ” संस्पृशादपि” घटक ” अपि” शब्द से कैमुत्य का प्रदर्शन है । जब आपके लिंग का स्पर्श करने से भी पाप नष्ट होता है तो पूजनादि करने से पाप का नाश सुतरां सिद्ध है-यही “अपि”इस शब्द से ध्वनित हुआ। संपूर्ण व्रत, दान और १०हजार तीर्थयात्रायें इन सबका फल इस लिंग के स्पर्श मात्र से प्राप्त हो जायेगा।।३९।।

तस्माद्वज्रेण देवेन्द्रस्तवैतल्लिङ्गमुत्तमम् ॥ छादयिष्यति सर्वत्र यदि त्वं मन्यसे प्रभो ॥ ४० ॥

ऐसी स्थिति में लोग स्वर्ग एवं पापनाश हेतु विहित समस्त श्रौत एवं स्मार्त कर्मकलाप से विमुख हों जायेंगे। तब वेदोक्त धर्म का विनाश हो जायेगा। इसलिए हे प्रभो! यदि आपकी अनुमति हो तो देवेंद्र अपने वज्र से इस उत्तम लिंग को आच्छादित कर दें।‌।४०।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ 

पुलस्त्य जी बोले– 

॥ ततः संछादयामास वज्रेण त्रिदशाधिपः ॥ तल्लिङ्गं सर्वमर्त्यानां यथाऽदृश्यं व्यजायत ।।४२॥

भगवान् भव की अनुमति मिलते ही देवेन्द्र ने अपने वज्र से उसे आच्छादित कर दिया। इसलिए वह लिंग मरणधर्मा प्राणियों के लिए अदृश्य हो गया।।४२।।

अद्यापि वज्रसंस्पर्शात्तत्सान्निध्यं गतो नरः ॥ आजन्ममरणात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः॥॥ ४३॥

यद्यपि वज्र से आच्छादित होने से उस लिंग का स्पर्श न होकर केवल वज्र का ही स्पर्श होता है। तथापि लिंग के ऊपर वर्तमान वज्र के स्पर्श से ही मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत किये गये समस्त पापों से छूट जाता है। अर्थात् उस दिव्य लिंग की पापप्रक्षालन सामर्थ्य से वज्र भी सीमित मात्रा में लोगों को पापमुक्त करने लगा।।४३।।

 माहात्म्यं कीर्तितं यस्मात्तल्लिंगे शंकरेण तु ॥ वज्रेणाच्छादितं चैव शक्रेणैव धरातले ॥४४॥ 

भगवान् शंकर ने उस लिंगविषयक माहात्म्य का वर्णन किया और देवराज इन्द्र ने धरातल पर वज्र से उसे आच्छादित किया ।।४४।।

ततः प्रभृति लिङ्गस्य मर्त्त्ये पूजा व्यजायत । पुरासीच्छंकर: पूज्यो यथान्ये त्रिदशालयाः॥४५॥

उसके बाद ही मनुष्यों मे लिंग की पूजा आरंभ हुई। उससे पहले जैसे अन्य देवताओं की पूजा होती थी। वैसे ही भगवान् शंकर की भी पूजा होती थी।।४५।।

 एवमेतत्पुरावृत्तमर्बुदे पर्वतोत्तमे ॥ 

लिङ्गस्य पतनात्पूजां यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥४६॥

पर्वतों में श्रेष्ठ आबू में वालखिल्य मुनियों के शाप से लिंग का पतन और मृत्युलोक में उसकी पूजा – इसका यही इतिहास है। जो तुमने मुझसे पूछा है।।४६।।

फाल्गुनान्तचतुर्दश्यां नैवेद्यं नूतनैर्यवैः ।।

यो ददात्यचलेशाय स भूयो नेह जायते ॥ ४७ ॥

फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को जो नये जव से बना नैवेद्य अचलेश्वर शिवलिंग को समर्पित करता है। उसका इस संसार में पुनर्जन्म नहीं होता।।४७।।

ब्राह्मणान्भोजयेद्यस्तु भक्त्या तस्मिन्नवैर्यवै: ॥ यवसंख्याप्रमाणानि युगानि दिवि मोदते ॥ ४८॥ 

उन अचलेश्वर के समीप जो भक्तिपूर्वक नूतन जवों से बना भोजन ब्राह्मणों को करवाता है। वह जितनी संख्या जवों की प्रमाणित है। उतने युगों तक स्वर्ग में आनंदित होता है।।४८।।

तत्र दानं प्रशंसन्ति सक्तूनां मुनिसत्तमाः ॥ नूतनानां महाराज यतः प्रोक्तं पुरारिणा ॥४९॥

 हे महाराज ! उन अचलेश्वर के निकट नये जव से बने सत्तू के दान की प्रशंसा भी सभी मुनिवर करते हैं; क्योंकि भगवान् त्रिपुरान्तक शिव ने भी सबसे यही कहा था।।४९।।

किं दानैर्विविधैर्दत्तै: किं यज्ञैश्च सुविस्तरैः ॥ किं तीथैर्विविधैहोमैस्तपोभिः किं च कष्टदैः ॥५०॥

अनेक प्रकार के दान देने से क्या प्रयोजन है? बडे विस्तार वाले विविध यज्ञों से क्या? अनेक तीर्थ, होम और कष्टप्रद तपश्चर्या से भी क्या??५०।।

फाल्गुनान्तचतुर्दश्यां सुमहेश्वरसन्निधौ ॥ धर्माण्येतानि सर्वाणि कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥५१॥

फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि में सुंदर भगवान् अचलेश्वर महादेव की सन्निधि में कराये गये विप्रभोजन और सत्तू के दान की सोलहवीं कला के बराबर भी सभी धर्म नहीं हैं।।५१।।

शृणु राजन् पुरावृत्तं तत्राश्चर्यं यदुत्तमम् ॥कश्चित्पापसमाचारः कुष्ठी क्षामतनुर्नरः ॥ ५२ ॥

हे राजन्! वहां का एक इतिहास सुनो। जो अत्युत्तम और आश्चर्यजनक है। कोई पापपरायण कोढ़ी मनुष्य जो कृश शरीर वाला था।।५२।।

भिक्षार्थमागतस्तत्र लोकैरन्यैः समन्वितः ॥ तेन भिक्षार्जितं तत्र सक्तूनां कुडवं नृप ॥ ५३ ॥

वह अन्य लोगों के साथ वहां भिक्षा के लिए आया।। हे भूपते! वहां उसने भिक्षा से एक कुडव अर्थात् लगभग १०० ग्राम सत्तू अर्जित किया।।५३।।

ततो रोगपरिक्लेशाद्भोजनं न चकार सः ॥ दाघार्दितो जले तस्मिन् स्नातो भक्तिविवर्जितः ॥ सक्तून्कृत्वोपधाने तान्स च सुप्तो निशागमे ॥५४॥ 

वह रोग से बड़े कष्ट में था। इसलिए उसने भोजन नहीं किया। धूप से पीड़ित होने के कारण भक्तिभाव से शून्य उसने वहां के जल में स्नान किया।और रात्रि आने पर वह सतुओं की पोटली को तकिया बनाकर सो गया।।५४।।

ततो निद्राभिभूतस्य सारमेयो जहार च ॥ भक्षयामास युक्तोऽन्यैः सारमेयैर्बुभुक्षितः ।।५५।।

तत्पश्चात् निद्रा से अभिभूत उस भिखारी के सत्तू को एक भूखे कुत्ते ने चुरा लिया और अन्य कुत्तों के साथ मिलकर उसे खाया।।५५।।

अथासौ विस्मयाद्राजन्पंचत्वं समुपस्थितः ॥ ततो जातिस्मरो जातो विदर्भाधिपतेर्गृहे ॥ ५६ ॥

हे राजन्! सत्तू के चले जाने से उसका घमंड नष्ट हो गया। और उसकी मृत्यु हो गयी। तत्पश्चात् उसने विदर्भ देश के राजा के घर में जन्म लिया और उसे अपने पूर्वजन्म का ज्ञान हो गया।।५६।।

भीमो नाम नृपश्रेष्ठ दमयन्तीपिता हि य: ॥तं प्रभावं हि विज्ञाय सक्तूनां तत्र पर्वते।।५७।।

हे राजेन्द्र! उसका नाम भीम था। वहीं सुप्रसिद्ध महारानी दमयन्ती का पिता बना। अनजान में अपने सत्तू से कुत्तों की क्षुधा से तृप्ति का ऐसा अद्भुत फल जानकर वह भीम नामक राजा आबू पर्वत में विराजमान अचलेश्वर महादेव के यहां।।५७।।

 फाल्गुनान्ते चतुर्दश्यां वर्षे वर्षे जगाम स: ।कृत्वा चैवोपवासं तु रात्रौ जागरणं तथा ।।५८।।

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को प्रतिवर्ष जाता रहता था और वहां उपवास करते हुए रात्रि में जागरण करता था।।५८।।

अचलेश्वरसान्निध्ये ददौ सक्तूंस्ततो बहून्।सहिरण्यं द्विजेन्द्राणां पशुपक्षिमृगेषु च।।५९।।

वह राजा अचलेश्वर भगवान् के सन्निकट स्वर्णसहित अत्यधिक सतुओं का दान ब्राह्मणों को करता था।साथ ही वहां के गोप्रभृति पशु,पक्षी और मृगों को भी सतुआ खिलाता था।।५९।।

अथ ते मुनयः सर्वे गालवप्रमुखा नृप।

पप्रच्छु: कौतुकाविष्टा सक्तुदानकृते नृपम्।।६०।।

हे नृप! इससे वहां पर निवास करने वाले गालव प्रमुख हैं जिनमें ऐसे उन ऋषियों ने कुतूहलवशात् राजा से सत्तूदान के विषय में पूछा।।६०।।

॥ ऋषय ऊचुः ॥ 

ऋषियों ने कहा–

॥ हस्त्यश्वरथदानानां शक्तिरस्ति तवाद्भुता ॥ कस्मात्सक्तून्प्रमुक्त्वा त्वं नान्यं दातुमिहेच्छसि ॥६१ ॥ 

राजन्! आपके पास हाथी, घोड़े और रथों का दान करने की अद्भुत शक्ति है। तो भी आप सत्तू को छोड़कर किसी दूसरी वस्तु का दान करना क्यों नहीं चाहते हैं?।।६१।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ 

पुलस्त्य जी बोले– 

॥ अथाऽसौ कथयामास पूर्वमेतत्समुद्भवम् ॥ सक्तुदानस्य माहात्म्यं मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ६२ ॥ 

तत्पश्चात् महाराज भीम ने शुद्धान्त: करण वाले उन मुनियों को पूर्वजन्म में घटित इस सत्तू के दान का माहात्म्य बतलाया।।६२।।

पूर्वं भक्त्या विहीनस्य शुना वै सक्तवो हृताः ॥ तत्प्रभावादियं प्राप्तिर्मम जाता द्विजोत्तमाः ॥६३॥

हे मुनीश्वरों ! पूर्वजन्म में भक्तिविहीन मुझ भिक्षुक के सतुओं को एक कुत्ते ने चुरा लिया था। हे ब्राह्मणों! उसी के प्रभाव से हम विदर्भ देश के महाराज के घर जन्में और हमें ये सब ऐश्वर्य मिला है।।६३।।

सांप्रतं भक्तिदत्तानां किं स्याज्जानामि नो फलम् ॥ एतस्मात्कारणाद्दानं सक्तूनां प्रकरोम्यहम् ॥ तीर्थेऽस्मिन्भक्तिसंयुक्तः सत्येनात्मानमालभे ॥६४।।

इस समय भक्तिपूर्वक दान दिये गये इन सत्तुओं का कितना अधिक फल होगा?–इसे हम नहीं जानते। इसलिए हम भक्तिसहित इन सतुओं का दान इस तीर्थ में कर रहे हैं। यह बात मैं सत्य की सौगंध खाकर आप सबसे कह रहा हूं।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ 

पुलस्त्य जी बोले– 

ततस्ते मुनयो हृष्टाः साधुसाध्विति चाब्रुवन् ॥ चक्रुश्चैवात्मशक्त्या ते सक्तूनां दानमुत्तमम् ॥ ६५॥

तत्पश्चात् वे मुनिगण प्रसन्न होकर महाराज कै वार वार साधुवाद देने लगे। उन महर्षियों ने भी अपनी अपनी शक्ति के अनुसार वहां सत्तुओं का उत्तम दान दिया।।६५।।

 एष प्रभावो राजर्षे सक्तुदानस्य कीर्त्तितः ॥ महेश्वरस्य माहात्म्यं सत्त्यं चापि प्रकीत्तितम् ॥ ६६ ॥

हे राजर्षे! अचलेश्वर में सत्तू के दान का यह प्रभाव मैंने आपको बतलाया और भगवान् अचलेश्वर का यथार्थ माहात्म्य भी आपसे कहा ।।६६।।

यश्चैतच्छृणुयाद्भक्त्या कथ्यमानं द्विजाननात् ॥ अहोरात्रकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ६७ ॥

जो प्राणी ब्राह्मण के मुख से यह प्रभाव और माहात्म्य भक्ति से सुनता है। वह दिन रात में किये गये समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।।६७।।

 इति श्रीस्कान्द महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डेशिवलिंगमहेश्वरमाहात्म्यवर्णनपुरःसरसक्तुदानमाहात्म्यवर्णनं नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ ॥ ६ ॥ 

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” शिवलिंगमहेश्वरमाहात्म्यपूर्वकसत्तू के दान का माहात्म्य का वर्णन करने वाला ३९ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

 

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