अध्याय -४२,उद्दालकेश्वर का माहात्म्य

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ 

पुलस्त्य जी बोले– 

ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ लिंगं पापहरं परम् ॥ 

उद्दालकेन मुनिना स्थापितं लोकविश्रुतम् ॥ १ ॥

हे राजेन्द्र! तत्पश्चात् उद्दालक मुनि से स्थापित संपूर्ण लोकों में प्रसिद्ध पापों के विनाशक श्रेष्ठ लिंग के समीप जाय।।१।।

तस्मिन्स्पृष्टेऽथ वा दृष्टे पूजितैश्च विशेषतः ॥ सर्वरोगविनिर्मुक्तो गार्हस्थ्यं प्राप्नुयान्नरः ॥ २ ॥

उस लिंग का स्पर्श करने या दर्शन करने और विशेषरूप से पूजा करने पर प्राणी समस्त रोगों से छूट कर सुंदर गार्हस्थ्य जीवन प्राप्त करता है।।२।।

 सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ॥३॥ 

यदि निष्काम भाव से पूजन किया जाय तो संपूर्ण पापों से मुक्त होकर मनुष्य शिवलोक में पूजित होता है।।३।।

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे वृतीयेऽर्बुदखण्ड उद्दालकेश्वरमाहात्म्यवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ 

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” उद्दालकेश्वर के माहात्म्य” का वर्णन करने वाला ४२ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *