॥ पुलस्त्य उवाच ॥
पुलस्त्य जी बोले–
ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ गजतीर्थमुत्तमम् ॥
यत्र पूर्व तपस्तप्तं दिग्गजैर्भावितात्मभिः ॥ १ ॥
हे राजश्रेषृठ ! तत्पश्चात् प्राणी अत्युत्तम गजतीर्थ जाय। जहां पर पूर्वकाल में शुद्धान्त: करण वाले दिग्गजों ने कठोर तपश्चर्या की थी।।१।।
भूभारधारणैश्चान्यैरैरावतमुखैर्नृप ।॥
तत्र स्नातो नरः सम्यग्गजदानफलं लभेत्।।२।।
उन तपस्वी साधकों में पृथिवी का भार धारण करने वाले ऐरावत आदि बड़े बड़े दिग्गज थे। वहां पर स्नान करने मात्र से मनुष्य को हाथी के दान का फल अनायास प्राप्त हो जाता है।।२।।
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहख्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखंडे तृतीयेऽर्बुदखण्डे गजतीर्थप्रभाववर्णनंनाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” गए तीर्थ के माहात्म्य” का वर्णन करने वाला ४४ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

