अध्याय -४५,देवखात तीर्थ का माहात्म्य

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ 

पुलस्त्य जी बोले– 

॥ देवखातं ततो गच्छेत्सुपुण्यं तीर्थमुत्तमम् ॥ यत्ख्यातिर्विबुधै: सर्वैः स्वयमेव व्यधीयत ॥ १ ॥ 

तत्पश्चात् प्राणी पुण्यवर्धक ‘देवखात’ नामक उत्तम तीर्थ में जाय। जिसकी प्रसिद्धि संसार में स्वयं देवताओं ने की थी।।१।।

तत्र यः कुरुते श्राद्धममावास्यां विशेषतः ॥ 

कन्यागते रवौ राजन्स लभेत्परमं पदम् ॥

 पितृन्स तारयत्येव प्राप्तानपि सुदुर्गतिम् ॥ २ ॥

 

 कन्याराशि पर जब सूर्य हों ऐसी विशेष अमावस्या को यदि कोई श्रद्धालु वहां पर पितरों के उद्देश्य से श्राद्ध करता है। तो वह पितरों का निश्चित ही उद्धार कर देता है। चाहे वे कितनी ही घोर दुर्गति को क्यों न प्राप्त हुए हों। अर्थात् यह श्राद्ध घोर से घोर भयप्रद नरकों से पितरों के उद्धार में सर्वथा समर्थ है। और यह अमावस्या पितृपक्ष में ही आती है। इसलिए पितृपक्ष की अमावस्या को ज्ञात अज्ञात सभी पितरों का श्राद्ध उन्हें घोर से घोर दुर्गति से निकालकर परम गति प्रदान करता है।।।२।।

 

 इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे श्रीदेवखातोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनं नाम पंचचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥ 

 

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” देवखात तीर्थ के माहात्म्य” का वर्णन करने वाला ४५ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

 

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