॥ पुलस्त्य उवाच ॥
पुलस्त्य जी बोले–
ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ सुपूर्णं गौतमाश्रमम् ॥
यत्र पूर्वं तपस्तप्तं गौतमेन महात्मना ॥१॥
हे राजेन्द्र! व्यास तीर्थ के बाद श्रद्धालु लता,वृक्ष फल फूलादि से परिपूर्ण गौतमाश्रम में जाय । जहां पुराकाल में महर्षि गौतम ने उग्र तप किया था।।१।।
पुराऽऽसीगौतमो नाम मुनिः परमधार्मिकः ॥
स भक्त्याऽऽराधयामास देवदेवं महेश्वरम् ॥२॥
बहुत पहले एक परमधार्मिक गौतम नाम के महर्षि हुए हैं। जिन्होने भक्तिपूर्वक देवों के देव भगवान् शिव की निश्छल भक्ति से आराधना की थी।।२।।
भक्त्याऽऽराधयमानस्य निर्भिद्य धरणीतलम् ॥ समुत्तस्थौ महल्लिङ्गं परं माहेश्वरं नृप ॥ ३ ॥
हे राजन्! भक्तिपूर्वक की गयी आराधना से भगवान् शिव का एक महान् लिंग धरती को विदीर्ण करता हुआ महर्षि गोतम के समक्ष प्रकट हुआ।।३।।
एतस्मिन्नेव काले तु वागुवाचाशरीरिणी ।। पूजयैतन्महल्लिङ्गं त्वद्भक्त्या समुपस्थितम्॥
वरं वरय भद्रं ते यत्ते मनसि वर्तते ॥४॥
उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे गौतम ! तुम्हारी भक्ति से ही यह महान लिंग प्रकट हुआ है। इसलिए तुम इसकी भक्तिभाव से पूजा करो। और हे महर्षे! तुम्हारे मन में जो हो वह वर मुझसे मांग लो।।४।।
॥ गौतम उवाच ॥
महर्षि गौतम बोले–
अत्राश्रमपदे देव त्वया शम्भो जगत्पते ॥
सदा कार्य हि सान्निध्यं यदि तुष्टो मम प्रभो ॥ ५ ॥
हे प्रभो! हे महादेव! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे शम्भो! आप इसी आश्रम प्रदेश में सदा सन्निहित रहें।।५।।
यस्त्वां पश्यति सद्भक्त्या ब्रह्मलोकं स गच्छतु ॥ ६ ॥
जो प्राणी श्रद्धा और भक्ति से आपका दर्शन करे । वह मृत्यु के बाद ब्रह्मलोक को प्राप्त करे।।६।।
॥ आकाशवाण्युवाच॥
आकाशवाणी ने कहा–
माघमासे चतुर्दश्यां योऽत्र मां वीक्षयिष्यति ॥ कृष्णायां ब्राह्मणश्रेष्ठ स यास्यति परां गतिम् ॥७॥
हे विप्रवर! माघ मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को जो यहां मेरा दर्शन करेगा । वह परमोच्च गति को प्राप्त होगा ।।७।।
एवमुक्त्वा ततो वाणी विरराम महीपते ॥
तत्रास्ति कुण्डमपरं पवित्रं जलपूरितम् ॥
तत्र स्नातो नरः सद्यः कुलं तारयतेऽखिलम् ॥ ८॥
ऐसा कहकर वह आकाशवाणी विरत हो गयी। वहां पर स्वच्छ जल से परिपूर्ण एक दूसरा पुनीत कुंड है। जिसमें स्नान करने मात्र से मनुष्य सदस्य: संपूर्ण कुलों का उद्धार कर देता है।।८।।
यस्तत्र कुरुते श्राद्धं विशेषादिन्दुसंक्षये ॥
गया श्राद्धफलं तस्य सकलं जायते ध्रुवम् ॥ ९ ॥
जो मानव वहां चंद्रमा का पूर्ण क्षय होने पर अर्थात् अमावस्या को श्राद्ध करता है। उसे गया में श्राद्ध करने का संपूर्ण फल निश्चित ही मिल जाता है।। ९।।
तत्र दानं प्रशंसंति तिलानां मुनिपुङ्गवाः ॥ तिलसंख्यानि वर्षाणि दानात्स्वर्गे वसेन्नृप ॥१०॥
हे राजन्! श्रेष्ठ मुनिजनों ने वहां किये जाने वाले तिलों के दान की बहुत प्रशंसा की है। तिलों की जितनी संख्या है। उतने वर्ष तिलों का दान करने वाला मनुष्य स्वर्ग में निवास करता है।।१०।।
अर्बुदे गौतमी यात्रा सिंहस्थे च बृहस्पतौ ॥
अमायां सोमवारेण द्विषड्गोदावरीफलम् ॥ ११ ॥
जब सिंह राशि पर वृहस्पति हों। और अमावस्या का सोमवार अर्थात् सोमवती अमावस्या हो । उस समय आबू में विराजमान गौतमाश्रम की यात्रा करने पर १२वार गोदावरी में स्नान का फल प्राप्त होता हे।।११।।
षष्टिवर्षसहस्राणि भागीरथ्यवगाहने ॥
सकृद्गोदावरी स्नानात् सिंहस्थे च वृहस्पतौ ॥१२॥
साठ हजार वर्षों तक गंगा जी में स्नान करने का जो फल होता है। वही फल सिंहराशि में वृहस्पति के स्थित होने पर एक वार गोदावरी के स्नान से मिलता है।।१२
इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे गौतमाश्रमतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में “गौतमाश्रम तीर्थ” के माहात्म्य का वर्णन करने वाला ४७ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

