॥ पुलस्त्य उवाच ॥
महर्षि पुलस्त्य बोले–
कुलसन्तारणं गच्छेत्तत्र तीर्थमनुत्तमम् ॥
यत्र स्नातो नरः सम्यक्कुलं तारयतेऽखिलम् ॥१॥
हे राजन् ! तत्पश्चात् प्राणी कुलसन्तारण तीर्थ की ओर प्रस्थान करें। जहां स्नान मात्र से संपूर्ण कुल का पूर्णतया उद्धार कर देता है। ।१।।
दश पूर्वान् भविष्यांश्च तथात्मानं नृपोत्तम ॥
उद्धरेच्छ्रद्धया युक्तस्तत्र दानेन मानव: ।।२।।
हे नृप श्रेष्ठ ! उस तीर्थ में यदि मनुष्य श्रद्धा से दान करे तो वह स्वयं के साथ दश पूर्व की और दश बाद की पीढ़ियों का पूर्णरूप से उद्धार कर देता है।।२।।
आसीदप्रस्तुतो नाम राजा पूर्वं स पापकृत् ॥
नापि दानं तथा ज्ञानं न ध्यानं न च सत्किया ॥३॥
हे महाराज ! पूर्वकाल में अप्रस्तुत नाम का एक राजा हुआ। जो बड़ा पापी था। वह कभी भी दान, ज्ञान,ध्यान और सत्कर्म नहीं करता था।।३।।
तस्मिंश्ञ्छासति लोकानां नासीत्सौख्यं कदाचन ॥ परदाररुचिर्नित्यं महादण्डपरश्च सः ॥ ४ ॥
उसके शासनकाल में प्राणियों को कभी भी सुख नहीं मिला। वह नित्य पराई पत्नियों में रुचि रखने वाला और छोटे अपराधों पर भी भीषण दंड देता था।।४।।
न्यायतोऽन्यायतो वापि करोति धनसङ्ग्रहम् ॥
स घातयति लोकांश्च निर्दोषान्पापकृत्तमः ॥५॥
वह न्याय अथवा अन्याय जैसे भी संभव हो वैसे ही धन का संग्रह करता था । वह महापापी था और निर्दोष प्राणियों की हत्या करवाता रहता था।।५।।ततो वार्धक्यमापन्नस्तथापि न शमं गतः ।॥ कस्यचित्त्वथ कालस्य पितृभिः प्रतिबोधितः ॥
तं प्रसुप्तं समासाद्य नारकेयैः सुदुःखितैः ॥६॥
वह बूढ़ा हो गया। फिर भी पाप कर्मों से शांत नहीं हुआ। कुछ समय बाद जब वह सो रहा था तो स्वप्न में उसे नरक में पड़े हुए अत्यंत दु: खी उसके पितरों ने बतलाया।।६।।
॥ पितर ऊचुः ॥
पितर लोग बोले–
वयं शुद्धसमाचारा नित्यं धर्मपरायणाः ॥ दानयज्ञतपःशीलाः स्वदारनिरतास्तथा ॥ ७ ॥
अरे कुलांगार! हम लोग शुद्ध सदाचारी नित्य धर्मपरायण थे। यज्ञ,दान और तप ही हमारा स्वभाव था। और अपनी पत्नियों में ही रुचि रखते थे।।७।।
स्वकर्मभिः कुलांगार दिवं प्राप्ता यथार्हतः ॥
कुपुत्रं त्वां समासाद्य नरकं समुपस्थिताः ॥ तस्मादुद्धर नः सर्वान्कृत्वा किंचिच्छुभार्चनम् ॥८॥
हम सब अपने वर्णाश्रमोचित वेद शास्त्रानुमोदित कर्मों से स्वर्ग प्राप्त किये।किन्तु तुझ जैसे कुपुत्र को प्राप्त करके आज नरक भोग रहे हैं। इसलिए हे कुलांगार! तू कुछ शुभ पूजा अर्चना आदि करके हम लोगों का शीघ्र ही नरक से उद्धार कर।।।८।।
कर्मभिस्तव पापात्मन् वयं नरकमाश्रिताः ॥
नरकं दश यास्यन्ति भविष्याश्च तथा भवान् ॥ ९ ॥
अरे पापात्मन् ! तेरे कुकर्मों से हम सब नरक चले गये। और तू भी नरक जायेगा। और तेरी आने वाली दश पीढ़ियां भी नरक जायेंगी।।९।।
एवमुक्त्वा च ते सर्वे पितरस्तु सुदुःखिताः ॥
याताश्च नरकं भूयः प्रबुद्धः सोऽपि पार्थिवः ॥१०॥
हे महाराज! ऐसा कहकर दु:खमग्न उसके सभी पितर पुनः नरक को चले गये । तत्पश्चात् वह राजा जगा।।१०।।
ततो दुःखमनुप्राप्तः पितृवाक्यानि संस्मरन् ॥
रुरोद प्रातरुत्थाय तं भार्या प्रत्यभाषत ॥ ११॥
पितरों के वाक्यों का स्मरण करते हुए उसे बड़ा दु:ख हुआ।प्रात:काल उठते ही वह जोर जोर से रोने लगा। तब उसकी पत्नी उससे बोली।।११।।
॥ इन्दुमत्युवाच ॥
पत्नी इन्दुमती ने कहा–
किमर्थं राजशार्दूल त्वं रोदिषि महास्वनम् ॥
कथं ते कुशलं राज्ये शरीरे वा पुरेऽथवा ॥ १२ ॥
हे नृपश्रेष्ठ !आप इतनी चिग्घाड़ मारकर क्यों रो रहे है ? आपके राज्य,शरीर और नगर में कुशल तो है न? ।।१२।।
॥ राजोवाच ॥
राजा बोला–
॥ मया दृष्टोऽद्य मया स्वप्ने पिता हाथ पितामहः ॥ अपश्यं दुःखितान्देवि ताभ्यामथाग्रजान्पितॄन् ॥१३॥
हे देवि ! आज मैंने स्वप्न में अपने पिता और पितामह को देखा। उन दोनों के साथ उनसे भी पूर्व में उत्पन्न पितरों को अत्यंत दु:खी देखा।।१३।।
उपोलब्धोऽस्मि तैः सर्वैस्तव कर्मभिरीदृशैः ॥
दारुणे नरके प्राप्ता अधर्मादिविचेष्टितैः ॥ १४ ॥
उन लोगों ने मुझे उपालम्भ दिया कि हम लोग तुम्हारे इन्हीं अधर्ममय कुत्सित कर्मों के कारण भयंकर नरक में पहुंच गये हैं।।१४।।
अथान्ये दश यास्यन्ति भविष्याश्च भवानपि ॥
तस्मात् कृत्वा शुभं कर्म दुर्गतेश्चोद्धरस्व नः ॥१५॥
तुम्हारे इन्हीं कुकर्मों के कारण तुम भी नरकगामी होंगे। इतना ही नहीं, आगे की तुम्हारी दश पीढ़ियां भी नरक जायेंगी।।१५।।
एवमुक्तः प्रबुद्धोऽहं पितृभिर्वरवर्णिनि ॥
तेनाहं दुःखमापन्नस्तद्वाक्यं हृदि संस्मरन् ॥ १६ ॥
हे अत्युत्तमे प्रिये ! उन पितरों के द्वारा ऐसा कहे जाने के बाद मैं जग गया। उन लोगों की बातों का मन में स्मरण होते ही मैं दु:खमग्न हो जाता हूं।
१६।।
॥ इन्दुमत्युवाच ॥
इन्दुमती ने कहा–
॥ सत्यमेतन्महाराज यदुक्तोऽसि पितामहैः ॥
न त्वया सुकृतं कर्म संस्मरेऽहं कृतं पुरा ॥ १७ ॥
हे महाराज! जो पितामहों ने आपसे कहा है। वह सत्य ही है। मुझे याद नहीं है कि आपने पहले कोई सत्कर्म किया हो। तात्पर्य यह कि आपके द्वारा पूर्व में सारे दुष्कर्म ही किये गये हैं।।१७।।
यथा सुपुत्रमासाद्य तरन्ति पितरो नृप ।।
कुपुत्रेण तथा यान्ति नरकं नात्र संशयः ॥ १८॥
महाराज! जैसे सुपुत्र को प्राप्त करके पितर तर जाते हैं। वैसे ही कुपुत्र से नरकगामी होते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है।।१८।।
स त्वमाहूय विप्रेन्द्रान्धर्मशास्त्रविचक्षणान् ॥
पृष्ट्वा तान्कुरु यच्छ्रेयः पितृणामात्मना सह ॥१९॥
इसलिए आप धर्मशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वानों को बुलाकर वह उपाय पूछें। जिससे आपका अपना और पितरों का कल्याण हो ।।१९।।
आनयामास राजाऽसौ ततो विप्राननेकशः ।॥ वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञान्धर्मशास्त्रविचक्षणान् ॥
उवाच विनयोपेतो भार्यया सहितो हितान् ॥२०॥
तत्पश्चात् राजा ने वेद वेदांग के तत्त्वज्ञ और धर्मशास्त्र के विचक्षण विद्वानों को बुलवाया। और अपनी पत्नी के साथ विनयपूर्वक उन सबसे बोला।।२०।।
॥ राजोवाच ॥
राजा ने पूछा–
कर्मणा केन पितरो निरयस्था द्विजोत्तमाः ॥
स्वर्ग यान्ति सुपुत्रेण तारिताः प्रोच्यतां स्फुटम् ॥२१ ॥
हे द्विजवरों ! किस कर्म के कारण मेरे सभी पितर नरकगामी हुए हैं? सुपुत्र के द्वारा तारे जाने पर वे स्वर्ग चले जायें । इसका कोई सुस्पष्ट साधन आप सब हमें बतलायें।।२१।।
॥ ब्राह्मणा ऊचुः ॥
विप्रवरों ने उत्तर दिया —
॥ पितृमेधेन राजेन्द्र कृतेन विधिपूर्वकम् ॥
निरयस्था दिवं यान्ति यद्यपि स्युः सुपापिनः ॥२२॥
हे राजेन्द्र ! यदि विधिपूर्वक पितृमेध कर्म किया जाय। तो नरक में विद्यमान पितर भी स्वर्ग चले जाते हैं। भले ही वे महापापी ही क्यों न हों।।२२।।
॥ राजोवाच ॥
राजा ने कहा–
॥ दीक्षयन्तु द्विजाः सर्वे तदर्थं मां धृतव्रतम् ॥ यत्किचिदत्र कर्त्तव्यं प्रोच्यतामखिलं हि तत् ॥ २३ ॥
हे ब्राह्मणों! आप लोग मुझे व्रत धारण करवाकर पितृमेध यज्ञ की दीक्षा दीजिए। इस विषय में जो कुछ करना हो । वह सब आप लोग मुझे बतलायें।।२३।।
तथोक्तास्ते नृपेन्द्रेण ब्राह्मणाः सत्यवादिन: ।
समग्रा: पार्थिवं प्रोचुर्यदुक्तं यज्ञकर्मणि ।।२४।।
जब इस प्रकार राजा ने कहा तो वे सत्यवादी ब्राह्मण जो कुछ विधि विधान यज्ञ में कहा गया है। वह सब उस राजा को बतलाया ।।२४।।
दीक्षाग्राह्या नृपश्रेष्ठ! पुरश्चरणमादित: ।।
कृत्वा कायविशुद्ध्यर्थं तत्: श्रेयस्करी भवेत्।।२५।।
हे नृपश्रेष्ठ! आपको पितृमेध यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए। किन्तु उससे पहले शरीर की शुद्धि के लिए आपको प्रायश्चित्त कर्म का अनुष्ठान करना होगा। उसके बाद ही यज्ञदीक्षा कल्याणकारिणी होगी।।३५।।
स त्वं पापसमाचारो बाल्यात्प्रभृति पार्थिव ।।
असंख्यं पातकं तस्मात्तीर्थयात्रां समाचार।।२६।।
ब्राह्मणों ने कहा। हे राजन्! आप पापपरायण ही रहे हैं। बाल्यावस्था से लेकर आज तक आपने असंख्य पापों को कमाया है। इसलिए उनके नाश हेतु आप तीर्थों की यात्रा करें।।२६।।
सर्वतीर्थाभिषिक्तस्त्वं यदा स्या नृपसत्तम।।
प्रायश्चित्तेन योग्य: स्यास्ततो यज्ञस्य नान्यथा।।२७।।
हे नृपेन्द्र ! जब आप समस्त तीर्थों में स्नान कर लेंगे। तभी आप प्रायश्चित्त कर्म के योग्य होंगे,अन्यथा नहीं । प्रायश्चित्त के बाद ही आपका पितृमेध यज्ञ में अधिकार होगा।।२७।।
प्रभासादीनि तीर्थानि यानि सन्ति धरातले ॥
गन्तव्यं तेषु सर्वेषु स्नानं कुरु समाहितः ॥ २८ ॥
प्रभास आदि जितने भी तीर्थ धरातल पर हैं। आपको उन सभी तीर्थों में जाकर एकाग्रचित्त से स्नान करना चाहिए।।२८।।
मनसा गच्छ दुर्गाणि ददद्दानमनुत्तमम् ॥ नश्येत्तेनाशुभं किंचिदपि ब्रह्मवधोद्भवम् ॥
यन्न याति नृणां राजंस्तीर्थस्रानादिना भुवि ॥ २९ ॥
हे राजन् ! जो दुर्गम स्थान के तीर्थ हैं। वहां भी सर्वोत्तम दान देते हुए आपको मनोयोग पूर्वक जाना चाहिए। इससे भी आपके कुछ पाप नष्ट हो जायेंगे। जो ब्राह्मणों की हत्या से हुए हैं। हे राजन् ! भूमंडल में विद्यमान तीर्थों के स्नान से ब्रह्महत्या जैसे पाप नष्ट नहीं होते हैं। इसलिए आपको पर्वतों पर स्थित दुर्गम तीर्थों में जाना होगा।।२९।।
॥ पुलस्त्य उवाच ॥
महर्षि पुलस्त्य ने ययाति जी से कहा–
विप्राणां वचनं श्रुत्वा स राजा श्रद्धयाऽन्वितः ॥ तीर्थयात्रापरो भूत्वा परिबभ्राम मेदिनीम्। ॥ ३० ॥
उन तपस्वी विद्वान् ब्राह्मणों के वचन सुनकर वह राजा अप्रस्तुत श्रद्धापूर्वक तीर्थयात्रापरायण होकर पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा।।३०।।
नियतो नियताहारो ददद्दानानि भूरिशः ॥
राज्ये पुत्रं प्रतिष्ठाप्य वसुं सत्त्यपराक्रमम् ॥ ३१ ॥
वह अपने अमोघ पराक्रमी पुत्र वसु को राजसिंहासन पर बिठाकर एकाग्रतापूर्वक आहार पर संयम रखते हुए तीर्थयात्रा करने लगा। वह राजा प्रचुर मात्रा में दान देते हुए तीर्थयात्रा में लगा रहा।।३१।।
कस्यचित्त्वथ कालस्य तीर्थयात्रानुषंगतः ॥
यातोऽसौ नृपतिश्चैव ह्यर्बुदे निर्मलोदकम् ॥ ३२ ॥
कुछ समय बाद वह राजा तीर्थयात्रा के प्रसंग से आबू पर्वत पहुंचा। जहां एक सुन्दर निर्मल जलाशय था ।।३२।।
स स्रानमकरोत्तत्र श्रद्धापूतेन चेतसा ॥
स्नातमात्रस्य तस्याथ तस्मिन्नेव जलाशये ॥ ३३ ॥
वहां श्रद्धा से पवित्र चित्त वाले उस राजा ने स्नान किया। उस जलाशय में उसका मात्र स्नान होते ही ।।३३।।
विमुक्ताः पितरो रौद्रान्नरकात्सुप्रहर्षिताः ॥
ततो दिव्यविमानस्था दिव्यमाल्याम्बरान्विताः ॥ ३४ ॥
उसके संपूर्ण पितर भयप्रद नरक से छूट गये और वे बड़े प्रसन्न हुए। वे सब दिव्य माला और वस्त्रों से अलंकृत दिव्य विमान में बैठे हुए थे।।३४।।
तमुचुस्तारिताः सर्वे वयं पुत्र त्वयाऽधुना ॥ तीर्थस्यास्य प्रभावेण भविष्याश्च तथा दश ॥ ३५ ॥
पितरगण अप्रस्तुत राजा से बोले । हे पुत्र ! इस समय हम लोग तुम्हारे द्वारा भयंकर नरक से तार दिये गये हैं। इतना ही नहीं। इस तीर्थ के प्रभाव से आगे आने वाली तुम्हारी दश पीढ़ियों का भी उद्धार हो जायेगा।।३५।।
आत्मा च पार्थिवश्रेष्ठ स्नानाच्च जलतर्पणात् ॥ यस्मात्कुलं त्वया पुत्र तीर्थेऽस्मिंस्तारितं ततः ॥ ३६ ॥
हे नृपेन्द्र ! यहां स्नान और जल के तर्पण से तुमने स्वयं को भी समस्त पापों से मुक्त कर लिया है। हे पुत्र ! इस तीर्थ में स्नान करने से तुमने अपने कुल को तार दिया है। इसलिए।।३६।।
कुलसन्तारणं नाम तीर्थमेतद्भविष्यति ॥
तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र सहाऽस्माभिर्दिवं प्रति ॥ आगच्छानेन देहेन तीर्थस्यास्य प्रभावतः ॥ ३७ ॥
यह तीर्थ ” कुलसन्तारण ” नाम से भूतल पर प्रसिद्ध होगा। इसलिए हे राजेन्द्र! इस तीर्थ के विशेष प्रभाव से तुम भी इसी शरीर से हम लोगों के साथ स्वर्ग की ओर प्रस्थान करो।।३७।।
॥ पुलस्त्य उवाच ॥
महर्षि पुलस्त्य ययाति से बोले–
एवमुक्तः स राजेन्द्रो दिव्यकान्तिवपुस्तदा ॥
तं विमानमथारुह्य गतः स्वर्गं च तैः सह ॥ ३८ ॥
हे राजेन्द्र ! पितरों के ऐसा कहते ही उस राजा का देह दिव्य कांति से सम्पन्न हो गया। और वह उन्हीं पितरों के साथ विमान में बैठकर स्वर्ग चला गया।।३८।।
एष प्रभावो राजर्षे कुलसन्तारणस्य च ॥
मया ते वर्णितः सम्यग्भूयः किं परिपृच्छसि ॥ ३९॥
हे राजर्षे! कुलसन्तारण तीर्थ के इस अनुपम प्रभाव का सम्यक् वर्णन मैंने तुमसे कर दिया है । अब आगे क्या प्रश्न करना चाहते हो?।।३९।।
॥ ययातिरुवाच ॥
महाराज ययाति बोले–
स किंप्रभावो राजा स तथा पापसमन्वितः ॥
स्वदेहेन गतः स्वर्गमेतन्मे कौतुकं महत् ॥ ४० ॥
वह अप्रस्तुत राजा कितने प्रभाव वाला था !! वह तो ब्रह्महत्या जैसे महान् पापों से युक्त था। फिर वह सदेह स्वर्ग कैसे चला गया? इस विषय में मुझे महान् आश्चर्य है।।४०।।
॥ पुलस्त्य उवाच ॥
महर्षि पुलस्त्य ने ययाति से कहा–
॥ राकासोमव्यतीपातसमकाले नृपोत्तम ॥
स स्नातो यत्र भूपालस्तन्महच्छ्रेयसे परम् ॥ ४१
हे राजेन्द्र ! सोमवार,पूर्णिमा और व्यतीपात योग ये तीनों जब एक समय में पड़े । तब उस राजा अप्रस्तुत ने जहां आबू पर्वत के जलाशय में स्नान किया था। उसी से वह सदेह स्वर्ग गया। इसलिए इस विषय में आश्चर्य मत करो । सोमवार, पूर्णिमा, व्यतीपात योग और आबू पर्वत का वह जलाशय — इन सबका एक समय में योग ही उस राजा के सदेह स्वर्ग गमनरूपी महाकल्याण में श्रेष्ठ साधन बना।।४१।।
इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे कुलसन्तारणतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में “कुलसन्तारण तीर्थ” के माहात्म्य का वर्णन करने वाला ४८ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।
व्याख्याता — श्रीमहंत आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य, जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य पीठ, सर्वेश्वर श्रीरघुनाथ मन्दिर, नक्की लेक, आबू पर्वत, सिरोही, राजस्थान


आबू एक पवित्र पर्वत है। जहां अनेक तीर्थ हैं । उनका निरूपण स्कंद महापुराण के प्रभास खण्ड के अन्तर्गत अर्बुद खण्ड में है। जिसमें 63 अध्याय हैं। उनकी हिंदी व्याख्या क्रमश: जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य पीठ, सर्वेश्वर रघुनाथ मन्दिर, नक्की लेक, आबू पर्वत के वर्तमान गादीपति श्रीमहंत आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य द्वारा प्रस्तुत की जा रही है।