।।पुलस्त्य उवाच ॥
महर्षि पुलस्त्य ययाति से बोले–
॥ रामतीर्थं ततो गच्छेत्पुण्यमृषिनिषेवितम् ॥
तत्र स्नातस्य मर्त्यस्य जायते पापसंक्षयः ॥ १।।
तत्पश्चात् प्राणी पुण्यवर्धक और ऋषियों से सुसेवित रामतीर्थ जाय। वहां स्नान करते ही मनुष्य के संपूर्ण पापों का आत्यन्तिक विनाश अर्थात् पापवासनाओं के साथ विनाश हो जाता है ।।१।।
पितृणां च परा तुष्टिर्यावदाभूतसंप्लवम्।
पुरासीद्भार्गवो राम: सर्वशस्त्रभृतां वर: ।।२।।
वहां पर तर्पण, श्राद्धादि करने पर पितरों को प्रलय काल आने तक संतुष्टि होती है। पूर्वकाल में शस्त्रधारियों में सर्वश्रेष्ठ भृगुवंशी परशुराम जी हुए।।२।।
तेन पूर्व तपस्तप्तं शत्रूणामिच्छता क्षयम् ॥
ततः पाशुपतं नाम तस्यास्त्रं परमं ददौ ॥ ३ ॥
उन्होंने शत्रुओं के विनाश की कामना से यहां तपश्चर्या की थी। उससे प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने उन्हें परम श्रेष्ठ पाशुपतास्त्र प्रदान किया था।।३।।
तपस्तुष्टो महादेवो गते वर्षशतत्रये ॥
अब्रवीद्वरदोस्मीति से वव्रे शत्रुसंक्षयम्।।४।।
तीन सौ वर्ष बीतने पर उनकी कठोर तपस्या से महादेव प्रसन्न हुए और बोले कि मैं वर देने के लिए उपस्थित हूं। इस पर परशुराम जी ने उनसे वरदान के रूप में शत्रुओं का महासंहार मांगा ।।४।।
ततः पाशुपतं नाम तस्यास्त्रं परमं ददौ ॥ स्मरणेनापि शत्रूणां यस्य संजायते शवः ॥ ५॥
इसीलिए भगवान् महेश्वर ने उन्हें शत्रुसंहारक श्रेष्ठ पाशुपतास्त्र दिया। जिसके स्मरण मात्र से शत्रुओं के शव ही शव दिखायी देते हैं अर्थात् पाशुपतास्त्र स्मरण मात्र से रिपुदल को मृतक बना देता है।।५।।
अब्रवीद्वचनं चापि प्रहस्य वृषभध्वजः ॥
जामदग्न्य महाबाहो शृणु से परमं वचः ॥ ६ ॥
भगवान् वृषभध्वज शिव हंसकर परशुराम जी से बोले। हे महाबाहो! जमदग्निनन्दन ! मेरी उत्तम कल्याणकारिणी वाणी को सुनो ।। ६ ।।
अस्त्रेणानेन युक्तस्त्वमजेयः सर्वदेहिनाम् ॥ भविष्यसि न संदेहो मत्प्रसादाद्भृगूद्वह ॥ ७ ॥
इस पाशुपतास्त्र को पाकर तुम संपूर्ण प्राणियों के लिए अजेय हो जाओगे। हे भृगुवंशीय पुत्र! परशुराम ! इसमें कोई संदेह नहीं है। उद्वह= पुत्र ।।७।।
एतज्जलाशयं पुण्यं त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ रामतीर्थमिति ख्यातं मत्प्रसादाद्भविष्यति ॥८॥
यह जलाशय अत्यंत पुण्यवर्धक है। मेरे अनुग्रह से चराचरसहित तीनों लोकों में यह ” राम तीर्थ” के नाम से विख्यात होगा।।८।।
येऽत्र श्राद्धं करिष्यन्ति पौर्णमास्यां समाहिताः ॥ संप्राप्ते कात्तिके मासि कृत्तिकायोगसंयुते ॥ ९ ॥
जो लोग कृतिका नक्षत्र से युक्त कार्तिक मास आने पर एकाग्रचित्त होकर यहां पूर्णमासी तिथि को श्राद्ध करेंगे।।९।।
पितृमेधफलं तेषामशेषं च भविष्यति ॥
तथा शत्रुक्षयो राजन् वासः स्वर्गेषु चाक्षयः॥१०॥
उन्हें पितृमेध यज्ञ का समस्त फल मिलेगा। हे राजन्! उनके शत्रुओं का विध्वंस होने के साथ ही उनका स्वर्गलोक में अनन्त काल तक वास होगा।।१०।।
॥ पुलस्त्य उवाच ॥
महर्षि पुलस्त्य ययाति जी से बोले–
एवमुक्त्वा महादेवस्ततश्चादर्शनं गतः ॥ रामोऽप्यसूदयत् क्षत्रं पितृदुःखेन दुःखितः ॥११॥
ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। परशुराम जी भी पिता की हत्या होने से समुत्पन्न
दु:ख से दु:खी होकर दुष्ट क्षत्रियों का विनाश करने लगे।।११।।
त्रिःसप्त तर्पयामास पितृंस्तत्र प्रहर्षितः ॥
जमदग्नौ मृते तेन प्रतिज्ञातं महात्मना ॥ १२ ॥
उन्होंने हर्षपूर्वक पिता का इक्कीस वार तर्पण किया । पिता महर्षि जमदग्नि की मृत्यु होने पर उन महात्मा ने ऐसी ही प्रतिज्ञा की थी ।।१२।।
दृष्ट्वा मातुः क्षतान्यङ्गे त्रिःसप्त मनुजाधिप ॥ शस्त्रजातानि विप्राणां समाजे समुपस्थिते ॥१३॥
हे राजेन्द्र ! परशुराम जी ने माता के अंग में शस्त्रों से उत्पन्न इक्कीस घाव देखकर समुपस्थित ब्राह्मण समाज में प्रतिज्ञा की थी।।१३।।
पिता मे निहतो यस्मात्क्षत्रियैस्तापसो द्विजः ॥ अयुध्यमान एवाथ तस्मात्कृत्वा त्रिसप्त वै ॥ १४ ॥
कि मेरे तपस्वी पिता को जो युद्ध नहीं कर रहे थे। उनको दुष्ट क्षत्रियों ने मारा है। इसलिए मैं इक्कीस वार।।१४।।
क्षत्रहीनामहं पृथ्वीं प्रदास्ये सलिलं पितुः ॥
तत्सर्वं तस्य संजातं तीर्थमाहात्म्यतो नृप ॥१५॥
पृथ्वी को ऐसे क्षत्रियों से शून्य करके पिता को जल दूंगा। यह सब कार्य इस तीर्थ के माहात्म्य से संपन्न हुआ। अर्थात् यहीं तपश्चर्या करके भगवान् शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त करके उसके द्वारा उन्होंने दुष्ट क्षत्रियों का वध किया।।१५।।
तस्मात्सर्व प्रयत्नेन श्राद्धं तत्र समाचरेत् ॥
क्षत्रियश्च विशेषेण य इच्छेच्छत्रुसंक्षयम् ॥ १६ ॥
इसलिए पूर्ण प्रयत्न से उस “रामतीर्थ” में श्राद्ध करना चाहिए। जो क्षत्रिय विशेषरूप से शत्रुसंहार का इच्छुक हो । उसे वहां श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।।१६।।
इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे रामतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकोनपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” रामतीर्थ” के माहात्म्य का वर्णन करने वाला ४९ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।
व्याख्याता — श्रीमहंत आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य, जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य पीठ, सर्वेश्वर श्रीरघुनाथ मन्दिर, नक्की लेक, आबू पर्वत, सिरोही, राजस्थान

