अध्याय -५२, ईशानीशिखर तीर्थ का माहात्म्य

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ 

महर्षि पुलस्त्य बोले–

॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ ईशानीशिखरं महत् ॥

 यत्र गौर्या तपस्तप्तं सुपुण्यं लोकविश्रुतम् ॥ १ ॥

हे राजेन्द्र ! तत्पश्चात् प्राणी अति प्रभावशाली, परम पुण्यमय, संसार में विख्यात ईशानीशिखर तीर्थ जाय । जहां पर भगवती गौरी ने कठोर तपश्चर्या की थी।।१।।

 

 यस्य संदर्शनेनापि नरः पापात्प्रमुच्यते ॥

 लभते चातिसौभाग्यं सप्तजन्मान्तराणि च ॥ २ ॥

 

जिस शिखर के सम्यक् दर्शन करने से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं, वह इस जन्म में तथा  अगले सात जन्मों तक सर्वोत्तम सौभाग्य को भी प्राप्त करता है। श्लोकस्थ ‘च’ शब्द से इस जन्म का कथन है ।।२।।

 

 ॥ ययातिरुवाच ॥ 

 

राजा ययाति महर्षि पुलस्त्य से बोले–

 

 कस्मिन्काले तपस्तप्तं देव्या तत्र मुनीश्वर ।।

 किमर्थं च महदेतत् कौतुकं वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥

 

हे मुनीश्वर ! किस समय भगवती गौरी ने उस शिखर पर तप किया था ? और किस लिए यह शिखर महान हुआ? इस विषय में मुझे बड़ा कुतूहल है। आप सब कुछ विस्तार से बतलायें।।३।।

 

 ॥ पुलस्त्य उवाच ॥ 

 

पुलस्त्य जी बोले —

 

 शृणु राजन्कथां दिव्यामद्भुतां लोकविश्रुताम् ॥ यस्याः संश्रवणादेव मुच्यते सर्वपातकैः ॥ ४ ॥

 

हे राजन् ! संसार में सुप्रसिद्ध यह दिव्य अद्भुत कथा सुनें। जिसका सश्रद्धया श्रवण करने से प्राणी समस्त पापों से छूट जाता है।।४।।

 

 पुरा गौर्या समासक्तं ज्ञात्वा देवाः सवासवाः ॥

 मन्त्रं चक्रुर्भयाविष्टा एकान्ते समुपाश्रिताः ॥ ५ ॥ 

 

पूर्वकाल में देवेन्द्र सहित समस्त देवताओं ने भगवान शिव को भगवती पार्वती में अनुरक्त जानकर भयग्रस्त होकर एकान्त में परस्पर मन्त्रणा की।।५।।

 

वीर्यं यदि त्रिनेत्रस्य क्षेत्रे गौर्याः पतिष्यति ॥ 

अस्माकं पतनं नूनं जगतश्च भविष्यति ॥ ६ ॥

 

यदि भगवान् त्र्यम्बक शिव का तेज पार्वती जी के गर्भ में जायेगा। तो हम लोगों और संपूर्ण जगत् का विनाश ही होगा ।।६।।

 

 संततेस्तु विनाशाय ततो गच्छामहे वयम् ॥ ७ ॥ 

 

इसलिए उनकी संतान का जन्म न हो। इसके लिए हम सब वहां चलें।।७।।

 

एवं संमन्त्र्य देवास्ते कैलासं पर्वतं गताः ॥

 ततस्तु नन्दिना सर्वे निषिद्धाः समयं विना ॥ ८ ॥ 

 

ऐसा परामर्श करके वे सब देवता कैलास गये। किन्तु वहां ‘ भगवान् शिव से मिलने का यह समय नहीं है’- ऐसा कहकर नन्दी ने उन सबको रोंक दिया।।८।।

 

॥ नन्द्युवाच ॥

 

शिव जी के गण नन्दी जी बोले–

 

 ॥ एकान्ते भगवानुद्रः सह गौर्या व्यवस्थितः ॥ तस्माद्देवगणाः सर्वे गच्छध्वं निलयं स्वकम् ॥ ९ ॥

 

हे देवताओं ! इस समय भगवान् शिव भगवती पार्वती के साथ एकान्त में विराजमान हैं। इसलिए उनसे आप लोग मिल नहीं सकते। अत: आप सब अपने स्थानों पर लौट जांय ।।९।।

 

 अथ देवगणाः सर्वे वञ्चयित्वा च तं गणम् ॥ प्रैषयंस्तत्र वायुं च गुप्तमुचुर्वचस्त्त्विदम् ॥ १० ॥

 

तत्पश्चात् देवताओं ने छल से नन्दी जैसे गण से बचकर वायुदेव को गुप्त रूप से शिव जी के समीप भेजा और यह वचन कहा ।।१०।।

 

 गत्वा वायो भवं ब्रूहि न कार्या संततिस्त्वया ॥

 एवं देवगणा देव प्रार्थयन्ति भयातुराः ॥ ११ ॥

 

हे पवनदेव ! आप जाकर भगवान् शिव को कहना कि आपको संतान की उत्पत्ति नहीं करनी चाहिए।

समस्त देवगण भयाक्रांत होकर आपसे यह प्रार्थना कर रहे हैं।।११।।

 

 ततो वायुर्द्रुतं गत्वा स्थितो यत्र महेश्वरः ॥ उञ्चैर्जगाद तद्वाक्यं यदुक्तं त्रिदशालयैः ॥ १२ ॥

 

तत्पश्चात् वायुदेव शीघ्रतापूर्वक वहां पहुंचे। जहां भगवान् महेश्वर विराजमान थे। देवताओं ने जो संदेश उनसे भेजा था। उस वाक्य को उन्होंने उच्च स्वर में भगवान् से कहा।।१२।।

 

 ततस्तु भगवाञ्छर्वो व्रीडया परया युतः ॥ 

गौरीं त्यक्ता समुत्तस्थौ वाढमित्येव चाब्रवीत् ॥१३॥

 

उस वाक्य को सुनते ही भगवान् शिव बड़े लज्जित हुए। वे भगवती गौरी को छोड़कर खड़े हो गये। और बोले –‘ ठीक है।।१३‌।

 

 ततो गौरी सुदुःखार्त्ता शशाप त्रिदशालयान् ॥ १४ ।।

 अत्यंत दु:ख से खिन्न भगवती उमा ने उसके बाद समस्त देवताओं को शाप दिया।।१४।।

 

 ॥ गौर्युवाच ॥

 

पार्वती जी बोलीं–

 

यस्मादहं कृता देवैः पुत्रहीना समागतैः ।॥

तस्मात्तेऽपि भविष्यन्ति सन्तानेन विवर्जिताः ॥१५ ॥ 

 

जिस किसी भी कारण से आकर देवगणों ने मुझे पुत्रहीन बना दिया है। इसलिए वे सभी नि: संतान ही रहेंगे।।१५।।

 

यस्माद्वायो समायातः स्थानेऽस्मिञ्जनवर्जिते ॥ तस्मात्कायविनिर्मुक्तस्त्वं भविष्यसि सर्वदा ॥ १६ ॥

 

इस निर्जन स्थान पर आकर वायुदेव तुमने बड़ा अपराध किया है । इसलिए तुम सदा शरीररहित ही रहोगे।।१६।।

 

 एवमुक्ता ततो दीर्घं भर्तुः कोपपरायणा ॥

 त्यक्त्वा पार्श्वं गता राजन्नर्बुदं नगसत्तमम् ॥ १७॥

 

ऐसा शाप देकर भगवती पार्वती पति से अत्यधिक कुपित होकर उनका साथ छोड़कर दीर्घकाल के लिए पर्वतों में श्रेष्ठ आबू पर्वत पहुंचीं।।१७।।

 

 

 सुतार्थं सा तपस्तेपे यतवाक्कायमानसा ॥

 ततो वर्षसहस्रान्ते देवदेवो महेश्वरः ॥ १८॥

 

उन्होंने वहां मन, वचन और शरीर को संयत रखते हुए पुत्रप्राप्ति हेतु दुष्कर तप आरंभ किया। एक हजार वर्ष बीतने के बाद देवों के देव महादेव।।१८।।

 

 इन्द्राद्यैर्विबुधैः सार्द्धं तदन्तिकमुपागमत्।

 अथ शक्रो विनीतात्मा देवीं तां प्रत्यभाषत ॥ १९ ॥

 

इन्द्रादि देवताओं के साथ उनके समीप आये। तत्पश्चात् देवराज इन्द्र विनीतभाव से उन देवी पार्वती से बोले।।१९।।

 

 एष देवः शिवः प्राप्तस्तव पार्श्वं स्वलज्जया ॥ नायाति तत्प्रसादोऽस्य क्रियतां महती भव।।२०।।

 

हे देवि ! ये भगवान् शिव अपने किये गये कर्म से लज्जित होकर आपके पास आये हैं । किन्तु आपके समीप नहीं आ पा रहे हैं। इसलिए इनके ऊपर अनुग्रह कीजिए। आप बहुत बड़ी हैं।।२०।।

 

॥ देव्युवाच ॥

 

भगवती बोलीं —

 

 ॥ त्यक्ताऽहं तव वाक्येन पतिना समयान्विता ॥

 पुत्रं लब्ध्वा प्रयास्यामि तस्य पार्श्वे सुरेश्वर ॥ २१ ॥

 

जिस समय मैं पति के साथ थी। उस समय तुम्हारे वचनों से मेरे पति ने मुझे त्याग दिया था। हे देवराज! अब मैं पुत्र प्राप्त करके ही पति के समीप जाऊंगी।।२१।।

 

तस्यास्तं निश्चयं ज्ञात्वा स्वयं देवः समाययौ ॥ अब्रवीत्प्रहसन्वाक्यं प्रसादः क्रियतामिति ॥ २२ ॥

 

उनके इस दृढ़ निश्चय को समझकर स्वयं भगवान् शिव उनके समीप आये और मुसृकाते हुए बोले कि आप मेरे ऊपर कृपा करें।।२२।। 

 

 दृष्टिदानेन देवेशि भाषणेन वरानने ॥ 

मया देवहितं कार्यं सर्वावस्थासु पार्वति।।२३।।

 

हे सुमुखि! हे देवेशि! हे पार्वति! कृपादृष्टि और सुंदर भाषण से सभी परिस्थितियों में हमें देवताओं की भलाई के लिए ही कार्य करना चाहिए।।२३।।

 

अकाले तेन मुक्तासि निवृत्तिः सुरते कृता ॥

 पुत्रार्थं ते समारम्भो यतश्चासीत्सुरेश्वरि ॥ २४ ॥

 

 हे सुरस्वामिनि! पुत्र प्राप्ति के लिए आपका उद्योग था। जगत् में कोई अनिष्ट न हो जाय- इस आशंका से समागम काल में असमय मैंने आपका त्याग कर दिया था।।२४।।

 

तस्मात्ते भविता पुत्रो निजदेहसमुद्भव: ।।

 मत्प्रसादादसन्दिग्धं चतुर्थे दिवसे प्रिये ॥ २५ ॥

 

इसलिए हे प्रिये !मेरे अनुग्रह द्वारा आज से चौथे दिन 

आपकी देह से एक पुत्र होगा । इसमें कोई संशय नहीं है।।२५।।

 

 निजाङ्गमलमादाय यादृग्रूपं सुरेश्वरि ॥

 करिष्यसि न सन्देहस्तादृग्रूपो भविष्यति।।२६।।

 

हे सुरस्वामिनि! आप अपने अंग के मल को लेकर जिस प्रकार उसका रूप बनायेंगी। वैसा ही आपका पुत्र होगा। इसमें कोई संदेह नहीं है।।२६।।

 

 सद्यो देवगणानां च दैत्यानां च विशेषतः ॥

 तथा वै सर्वमर्त्यानां सिद्धिदो बहुरूपधृक् ॥ २७ ॥

 

वह बालक शीघ्र ही देवगणों और विशेषकर दैत्यों तथा संपूर्ण प्राणियों को सिद्धि देने वाला होगा। वह भिन्न भिन्न कार्यों को संपन्न करने के लिए अनेक रूप धारण करेगा।।२७।।

 

 एवमुक्ता त्रिनेत्रेण परितुष्टा सुरेश्वरी ॥ 

आलापं पतिना चके सार्धं हर्षसमन्विता ॥ २८ ॥

 

इस प्रकार त्रिनेत्र शिव जी के कहने पर सुरशासिका भगवती पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुईं और हर्ष से भरकर पति के साथ वार्तालाप करने लगीं।।२८।।

 

 चतुर्थे दिवसे प्राप्ते ततः स्नात्वा शिवा नृप ॥

 तदोद्वर्तनजं लेपं गृहीत्वा कौतुकात् किल।।

चतुर्भुजं चकाराथ हरवाक्याद्विनायकम् ॥ २९ ॥

 

हे राजन्! जब चौथा दिन आया तब भगवती उमा उबटन से निकले लेप को कुतूहलवशात् ग्रहण करके भगवान् शम्भु के कथनानुसार चार भुजा वाले विनायक का निर्माण किया।।२९।।

 

 ततः सजीवतां प्राप्य हरवाक्येन तं तदा ॥

 विशेषेण महाराज नायकोऽसौ कृतः क्षितौ ।। सर्वेषां चैव मर्त्यानां ततः ख्यातो बभूव ह ।॥ ३० ॥

 

भगवान् शिव के वचनानुसार बनते ही वह सजीव हो उठा। हे महाराज! भगवान् हर ने उसे भूमंडल में समस्त विघ्नों का नायक बना दिया। इससे वह समस्त प्राणियों में प्रसिद्ध हो गया ।।३०।।

 

 विनायक इति श्रीमान्पूज्यस्त्रैलोक्यवासिनाम् ॥ सर्वेषां देवमुख्यानां बभूव हि विनायकः ॥ ३१ ॥

 

वह विनायक, श्रीमान् इत्यादि नामों से तीनों लोकों के निवासियों का पूज्य हो गया। वह संपूर्ण प्रधान देवताओं का विशिष्ट नायक हुआ।।३१।।

 

 ततो देवगणाः सर्वे देवीप्रियहिते रताः ॥ 

तस्मै ददुर्वरान्दिव्यान्प्रोचुर्देवीं च पार्थिव ॥ ३२ ॥

 

हे राजन् ! देवी गौरी के प्रिय उस पुत्र के हितकारी समस्त देवताओं ने उसे श्रेष्ठ वर दिया और भगवती पार्वती से बोले ।।३२।।

 

 ॥ देवा ऊचुः ॥

 

देवताओं ने कहा–

 

 ॥ तवायं तनयो देवि सर्वेषां नः पुरःसरः ॥

 प्रथमं पूजिते चास्मिन्पूजा ग्राह्या ततः सुरैः ॥ ३३ ॥

 

हे देवि! आपका यह पुत्र जो हम सबके समक्ष विराजमान हैं। सबसे पहले इसी की पूजा होगी। तत्पश्चात् हम देवगण पूजा ग्रहण करेंगे।।३३।।

 

 एतच्छृङ्गं गिरे रम्यं तव संसेवनाच्छुभे ॥

 सर्वपापहरं नृणां दर्शनाच्च भविष्यति ॥ ३४ ॥

 

हे सद्गुणसंपन्न जगन्मात: ! आपने आबू के इस रमणीय शिखर का सेवन किया है। अत: मनुष्यों के द्वारा दर्शन मात्र से यह शिखर संपूर्ण पापों का विनाश करने वाला होगा।।३४।।

 

 येऽत्र स्नानं करिष्यन्ति सुपुण्ये सलिलाश्रये ॥

 ते यास्यन्ति परं स्थानं जरामरणवर्जितम् ॥ ३५ ॥

 

जो लोग इसके पुण्यमय जलाशय में स्नान करेंगे। वे जन्म मृत्यु से रहित उत्तम लोक को प्राप्त करेंगे।।३५।।

 

 माघमासे तृतीयायां शुक्लायां ये समाहिताः ॥ सप्तजन्मान्तराण्येव भविष्यन्ति सुखान्विताः ॥ ३६ ॥

 

माघ मास के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को जो एकाग्रचित्त से यहां स्नान करेंगे अथवा इसका दर्शन करेंगे । ( आरंभ के द्वितीय श्लोक से ईशानीशिखर के दर्शन मात्र से सात जन्मों तक सौभाग्य की प्राप्ति कहीं गयी है ) वे सात जन्मों तक सुख ही सुख भोगेंगे।।३६।।

 

 एवमुक्त्वा सुराः सर्वे स्वस्थानं तु ततो गताः ।॥ देवोऽपि सहितो देव्या कैलासं पर्वतं गतः ॥ ३७ ॥

 

इस प्रकार ईशानीशिखर को वर देकर समस्त देवता अपने अपने स्थानों पर चले गये । इधर भगवान् शिव भी भगवती पार्वती के साथ कैलास पर्वत पर पदार्पण किये।।३७।।

 

 इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्ड ईशानीशिखरमाहात्म्यवर्णनं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥

 

इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” ईशानीशिखरतीर्थ” के माहात्म्य का वर्णन करने वाला ५२ वां अध्याय पू‌र्ण हुआ।।

 

व्याख्याता– आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य, जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य पीठ, सर्वेश्वर श्रीरघुनाथ मन्दिर,नक्की लेक,आबू पर्वत, सिरोही, राजस्थान 

 

 

 

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