अध्याय-५३, ब्रह्मपद के प्राकट्य का माहात्म्य

  • ॥ पुलस्त्य उवाच ॥ 

महर्षि पुलस्त्य बोले–

 

॥ ततो गच्छेद् ब्रह्मपदं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।।

 यत्र पूर्वं पदं न्यस्तं ब्रह्मणा लोककारिणा ॥ १ ॥

 

तत्पश्चात् प्राणी तीनों लोकों में प्रसिद्ध ब्रह्मपद तीर्थ जाय। जहां बहुत पहले लोकस्रष्टा ब्रह्मा जी ने पद की स्थापना की थी। यहां पद का अर्थ चरण नहीं अपितु भगवद्विग्रह श्रीरघुनाथ जी हैं। इस तथ्य का निरूपण हम सप्रमाण १० वें श्लोक की व्याख्या में करेंगे।।।१।।

 

 पुरा ब्रह्मादयो देवास्तत्र सर्वे समाहिताः ॥

 अर्बुदे पर्वते रम्ये ऋषयश्च सुनिर्मलाः ॥ २ ॥

 

पूर्वकाल में ब्रह्मादि समस्त देवता तथा निष्पाप ऋषिगण रमणीय आबू पर्वत पर एकत्र हुए।।२।।

 

 

 अचलेश्वरयात्रायां सुभक्त्या भाविता नृप ॥ 

अथ ते मुनयः सर्वे प्रोचुर्देवं पितामहम् ॥ ३ ॥ 

 

वे लोग भक्तिपूर्वक अचलेश्वर महादेव की यात्रा में आये थे। वहां उन मुनियों ने पितामह ब्रह्मा जी से कहा।।३।।

 

॥ ऋषय उचुः ॥

 

ऋषिगण बोले–

 

 ॥ प्रभूतनियमैहोमैर्व्रतस्नानैश्च नित्यशः ॥

 उपवासैश्च निर्विण्णा वयं सर्वे पितामह ॥ ४ ॥

 

हे पितामह! हम लोग प्रतिदिन अत्यधिक नियम,होम,व्रत,स्नान और उपवास के कारण संसार से अत्यंत उदासीन हो चुके हैं।।४।।

 

 तस्मात्सदुपदेशं त्वं किंचिद्दातुमिहार्हसि ॥

 तरामो तेन देवेश दुर्गं संसारसागरम् ॥ ५ ॥

 

इसलिए आप हम लोगों को अधिकारी समझकर यहां कुछ सदुपदेश देने की कृपा करें। हे देवेश ! जिससे हम सब उसके द्वारा दुस्तर संसारसागर से पार हो जायें।।५।।

 

 अयाचितोपचारैश्च जपहोमैः सुदुष्करैः ॥ मन्त्रैर्व्रतैस्तथा दानैः स्वर्गप्राप्तिं वदस्व नः ॥ ६॥ 

 

विना याचना से प्राप्त सामग्रियों से एवम् अत्यंत कठिन जप,होम,मन्त्र,व्रत तथा दानों से अविनाशी स्वर्ग की प्राप्ति के विषय में बतलायें। स्वर्ग की परिभाषा श्रीकुमारिल भट्ट ने की है कि जो दु:ख से मिश्रित न हो, और भोगने के बाद भी दु:ख से ग्रस्त न हो। संकल्प मात्र से प्राप्त हो । ऐसे सुख को वास्तविक स्वर्ग कहते हैं–

 

“यन्न दु:खेन सम्भिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम्।

अभिलाषोपनीतं च तत्सुखं स्व:पदास्पदम्।।

– श्लोकवार्तिक

 

यह स्वर्ग संसार की आत्यंतिकनिवृत्तिपूर्वक भगवत्प्राप्तिरूप है।

 

 

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा तदा देवः कृपान्वितः ।॥ चिंतयामास सुचिरमिह किंचित्प्रहस्य च ॥७॥

 

उन ऋषियों की वाणी सुनकर कृपालु ब्रह्मा जी जो आबू पर्वत पर आये हुए थे। दीर्घकाल तक ध्यान किया और कुछ हंसकर बोले ।।७।।

 

 ततः स्वकं पदं त्यक्त्वा रम्ये पर्वतरोधसि ॥

 अथोवाच मुनीन् सर्वान् ब्रह्मा संलक्ष्णया गिरा ॥ ८ ॥

 

उसके बाद ब्रह्मा जी अपने आसन( पद का एक अर्थ आसन भी है ) हंस को छोड़कर रमणीय पर्वत के प्रान्त भाग में स्थित होकर मधुर वाणी से उन सब मुनियों को बतलाया।।८।।

 

 ॥ ब्रह्मोवाच ॥

 

ब्रह्मा जी बोले–

 

 ॥ एतन्महापदं रम्यं सर्वपातकनाशनम् ॥

 स्पृशन्तु ऋषयः सर्वे ततो यास्यथ सद्गतिम् ॥ ॥९॥

 

संपूर्ण पापों को नष्ट करने वाला अत्यंत रमणीय यह महापद नामक स्थान है। हे ऋषियों! आप लोग इसका स्नान,गंध,माल्य,पूजन,शिर आदि से प्रणाम करते हुए स्पर्श करें। जिससे आप सबकी सद्गति हो जायेगी।।९।।

 

 

 विना स्नानेन दानेन व्रतहोमजपादिभिः।।

 हितार्थं सर्वलोकानां मया न्यस्तं पदं शुभम्॥१०॥

 

स्नान, दान,व्रत, होम, जपादि के विना ही यहां सद्गति होती है। संपूर्ण प्राणियों के हित की भावना से ही मैंने यहां शुभ पद स्थापित किया है। यहां पद का अर्थ चरण नहीं, अपितु “पद्यते गम्यत इति पदं प्राप्यम्– भगवद्गीता-श्रीधरी-८-११, ( जो सबका प्राप्य हो उसे पद कहते हैं । संपूर्ण जीवों के प्राप्य मात्र परमात्मा ही हैं ) इस व्युत्पत्ति के अनुसार पद का अर्थ भगवान् हैं ।।१०।।

 

श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय के चौथे श्लोक में पद की अन्वेषणीयत्वेन चर्चा करके वह पद पुरुषात्मक परमात्मा ही बतलाया गया है–

 

” तत: पदं तत् परिमार्गितव्यं 

यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूय: ।

तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये 

यत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी ।।

 

उस पद का अन्वेषण करना चाहिए। जिस पद में प्रविष्ट होने पर पुनरागमन नहीं होता है। उसका अन्वेषण कैसे करें? – इस पर कहते हैं–तमेव चाद्यं। जो “यस्मिन्” घटक यत् शब्द से पद कहा गया है । वह पद किसी व्यक्तिविशेष का चरण नहीं अपितु परमात्मा ही हैं। इस तथ्य के उद्घाटन हेतु पदशब्दबोध्य परमात्मा को ध्यान में रखकर कह रहे हैं कि मैं उस पुरुष की शरण ग्रहण करता हूं। अर्थात् उसकी शरण ग्रहण ही उसके ज्ञान का एक मात्र उपाय है। इसी परमपुरुष को अक्षर ,पद ( भगवद्गीता–८/११ ) आदि शब्दों से अभिहित किया गया है।

 

यदि पद और पुरुष में भेद होता तो यच्छब्द से निर्दिष्ट पद को ग्रहण करने के लिए ” तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये” वाक्य घटक तत् शब्द का प्रयोग नहीं करते । ” यत्तदोर्नित्यसम्बन्धात्”।

 

 भगवत्पाद शंकराचार्य जी ने भी इस तथ्य को स्पष्टतया लिखा है –” तमेव च य: पदशब्देनोक्त आद्यमादौ भवं पुरुषं प्रपद्य इत्येवं परिमार्गितव्यं तच्छरणतयेत्यर्थ:”।।–श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्यम्-१५/४,

 श्वेताश्वतरोपनिषद् में ” तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये”-६/१८, से आत्मविषयकबुद्धि की प्रकाशिका इसी शरणागति 

का निर्देश है। 

 

इसलिए पद और परमात्मा एक ही हैं। अत: आत्मसाक्षात्कार हेतु उस परमात्मा की शरणागति करनी ही चाहिए।

 

यहां १८वें-१९वें और २० वें श्लोक में कतयुग आदि चोरों युगों में इस पद के रंग का वर्णन क्रमश: शुक्ल, रक्त ,श्याम ( कपिल ) और कृष्णरूप में किया जायेगा।

 

 यही चर्चा श्रीमद्भागवत महापुराण के ११वें स्कंध के ५वें अध्याय में आयी है–

 

कृते शुक्ल:-२१वां श्लोक- कृतयुग में शुक्लवर्ण के भगवान् का ध्यान।

 

त्रेतायां रक्तवर्णोSसौ–२४वां श्लोक– त्रेतायुग में रक्तवर्ण के भगवान् का यजन।

 

द्वापरे भगवाञ्छ्याम:–२७वां श्लोक– द्वापरयुग में श्यामवर्ण के भगवान् की अर्चना और 

 

कलावपि यथा शृणु।।३१।।कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णम्।।–३२वां श्लोक– कलियुग में कृष्ण वर्ण अर्थात् काले वर्ण के भगवान् की पूजा होती है। 

 

इस प्रकार कृष्ण वर्ण के भगवान् के स्वरूप का वर्णन करके श्रीशुकदेव जी ने उसे और स्पष्ट करते हुए उस रूप की वंदना भी की है–

 

ध्येयं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं 

तीर्थास्पदं शिवविरिंचिनुतं शरण्यम् ।

भृत्यार्तिहं प्रणतपाल भवाब्धिपोतं 

वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम् ॥ ३३।।

 

 हे महापुरुष! मैं आपके चरणकमल की वंदना करता हूं। वे पादपद्म सदा ध्यान के योग्य हैं; क्योंकि वे ध्यान करने से कामक्रोधादिमय संसार को नष्ट करने वाले और उनसे अभीष्ट वस्तुओं का दोहन होता है। अर्थात् अभिलषित पदार्थों को देने में साक्षात् कामधेनु हैं। वे समस्त तीर्थों के आश्रय तथा ब्रह्मा एवं शिव जी से नमस्कृत हैं। वे ही शरण्य अर्थात् भय के विनाशक , तथा सबके रक्षक हैं–

 

“शृणाति भयमिति । शॄ हिंसायाम् + “शॄरम्योश्च ।” उणा० ३ । १०१ । इतिअन्यः । यद्वा शरणमिव । शरण + “शाखादिभ्यो यः ।” ५ । ३ । १०३ । इति यः ।) रक्षाकर्त्ता । 

 

वे सेवकों के समस्त दु:खों को दूर करने वाले , नमस्कार करने वालों के पालक और भवसागर को पार करने के लिए जहाज हैं। 

अब ये महापुरुष कौन हैं?– इसे इनके चरित का उल्लेख करके सुस्पष्ट कर रहे हैं–

 

त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं 

धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम् ।

मायामृगं दयितयेप्सितमन्वधावद् 

वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम् ॥ ३४।।

 

हे प्रभो! आप अपने पिता की आज्ञा से देवताओं को भी अभिलषित राज्य रूपी लक्ष्मी जो अत्यंत दुस्त्यज थी। उसे त्यागकर वन में चले गये; क्योंकि आप में धर्म की चरम सीमा हैं। इतना ही नहीं। अपनी प्रियतमा सीता से अभिलषित मायामृग के पीछे पीछे दौड़े। इसलिए आप प्रेम की भी चृरम सीमा हैं। इसलिए हे महापुरुष! मैं आपके चरणकमल की वंदना करता हूं।।३४।।

 

यहां श्रीशुकदेव जी ने योगीश्वर करभाजन के द्वारा कलियुग में कृष्णवर्ण भगवान् श्रीराम की उपासना का सुस्पष्ट निर्देश दिया है।

 

इधर ब्रह्मा जी अपने द्वारा स्थापित पद का चारों युगों के अनुसार शुक्ल,रक्त,श्याम और कृष्ण वर्ण बतलाकर उसकी अर्चना,गंध माल्य,स्नानादि क्रियारूप स्पर्श से भवसागर पार होकर ब्रह्मलोक अर्थात् भगवद्धाम की प्राप्ति बतलाते हैं; क्योंकि ऋषियों ने संसार सागर से तरने का उपाय पूछा है–

 

“तरामो तेन देवेश दुर्गं संसारसागरम् ॥ ५ ॥”

 

इसलिए ब्रह्मलोक से भगवद्धाम ही लेना है,ब्रह्मा जी का लोक नहीं; क्योंकि वह संसार के अंतर्गत ही है। वहां से संसार में लौटना पड़ता है–

 

” आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोSर्जुन।।”

 

से भगवान् ने यही बात कही है।

 

इससे यह निर्णीत है कि अर्बुद ( आबू ) में ब्रह्मा जी द्वारा स्थापित पद स्वयं भगवान् ही हैं। यही भगवान् सत्ययुग में शुक्लवर्ण, त्रेता में रक्त ,द्वापर में कपिल अर्थात् नील+ पीत का मिश्रण केकीकंठाभनील अर्थात् श्याम और कलियुग में कृष्ण अर्थात् काले वर्ण के हैं– 

 

और ये ब्रह्मा जी द्वारा स्थापित पद= भगवान् है– सर्वेश्वर श्रीरघुनाथ जी महाराज । जो कलियुग में कृष्ण वर्ण के अभी भी दर्शन देते हैं। इन्हें ही माण्डूक्योपनिषद् में सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, सर्वांतर्यामी तथा संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति और लय का स्थान कहा गया है—

 

” एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोSन्तर्याम्येष योनि: ह्रस्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ।।६।।

 

ब्रह्मा जी से स्थापित इन भगवान् सर्वेश्वरश्रीरघुनाथ जी की पूजादि सेवा सत्ययुग से ऋषि मुनि करते चले आ रहे थे । कलियुग में जब श्रीरामावतार श्रीरामानन्दाचार्य जी महाराज नक्की झील ( चक्र तीर्थ ) के तट पर तपश्चर्या करने आये । तो यहां मिलिन्दसून ऋषि ने उन्हें सर्वेश्वर श्रीरघुनाथ जी का यह विग्रह प्रदान किया। तबसे अद्यावधि ये सर्वेश्वर श्रीरघुनाथ मन्दिर में नक्की झील के तट पर विराजमान हैं। जहां इनकी विधिवत् अर्चना हो रही है। इससे पूर्व ये भगवान् मंदिर की प्राचीन ध्यानी गुफा में थे। जो वर्तमान मंदिर के अति सन्निकट है।

 

निष्कर्ष–

अर्बुदखण्ड में वर्णित ब्रह्मपद कोई मात्र चरणचिह्न या आसन नहीं है, अपितु “पद्यते गम्यते प्राप्यते इति पदम्” इस व्युत्पत्ति के अनुसार स्वयं परमप्राप्य भगवान् का स्वरूप है। वही भगवान् युगभेद से अपने वर्ण को प्रकट करते हैं—कृतयुग में शुक्ल, त्रेतायुग में रक्त, द्वापरयुग में कपिल अर्थात् नील-पीत के संयोग से उत्पन्न श्याम, और कलियुग में कृष्ण वर्ण। इस प्रकार ब्रह्मा द्वारा स्थापित यह पद स्वयं सर्वेश्वर श्रीरघुनाथ का विग्रह है, जिसकी उपासना से संसारसागर से निश्चित ही तरण होता है।

इनके समीप अर्चना वंदना करते हुए यदि आत्मानुसंधान किया जाय तो स्वरूप का साक्षात्कार भी शीघ्र होता है। जिससे प्राणी भवसागर से पार हो जाता है।

 

परमहंस श्रीदामोदरदास जी महाराज को यहां आत्मस्वरूप का साक्षात्कार हुआ था। जिनका साकेतवास १४-१-१९४३ गुरुवार को हुआ।

 

 अस्मिन्पदे मया न्यस्ते यान्ति लोकाः सहस्रशः॥ स्पृशन्तु ऋषयः सर्वे देवाश्वापि पदं मम ॥ ११ ॥

 

इस आबू पर्वत पर मैंने अपने इस पद अर्थात् परमात्मा के विग्रह को स्थापित किया है। जिसके स्नान,पूजन,प्रणामादि रूप स्पर्श मात्र से हजारों लोग सद्गति को प्राप्त होते हैं। आप सब ऋषिगण और देववृंद इस पद अर्थात् भगवद्विग्रह का स्नान, पूजन, गंधलेपन आदि के द्वारा स्पर्श करें।

 

ध्यातव्य है कि यहां स्पर्श शब्द केवल दैहिक स्पर्श का वाचक नहीं ,अपितु स्नान, पूजन, गंधानुलेपन, प्रणाम रूप से भगवदुपासनात्मक स्पर्शविशेष का वाचक है।

 

“पदं मम” इस अंश से यह अर्थ प्रतीत होता है कि “ब्रह्मा जी का पद” है — ऐसी शंका का उठ सकती है। ऐसी ही शंका ” मामेव विजानीहि” ( मुझे ही जानो) ” मामुपास्स्व” ( मेरी उपासना करो ) इस इन्द्रवाक्य को सुनने पर भी होती है; क्योंकि उपास्य सर्वजगत्कारण भगवान् हैं, इन्द्र नहीं।

 

 इसका उत्तर ब्रह्मसूत्रकार भगवान् व्यास देते हुए कहते हैं–

” शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्” –ब्र•सूत्र–१/१/३१,

 

जैसे वामदेव ऋषि ने–” अहं मनुरभवं सूर्यश्च”बृहदारण्यकोपनिषद-१/,मैं ही मनु हुआ था मैं ही सूर्य – ये वाक्य कहा । किन्तु मनु और सूर्य तो वे नहीं हुए। तब कैसे कहा कि मैं ही मनु ,सूर्य हुआ– इसका उत्तर है कि शास्त्र दृष्टि से कहा । परमात्मा सबकी आत्मा और सबका अन्तर्यामी है। इसलिए परमात्म दृष्टि से कह दिया कि मैं ही मनु हुआ और सूर्य हुआ। इसी शास्त्र दृष्टि ने देवराज इन्द्र ने भी कह दिया कि मेरी उपासना करो। यहां मेरी अर्थात् मेरी आत्मा मेरे अन्तर्यामी परमात्मा की उपासना करो। यही तात्पर्य है।

 

जैसे वामदेव–इन्द्रादि अहं प्रयोग अन्तर्यामी-दृष्टि से करते हैं, वैसे ही यहाँ ब्रह्मा का “मम” अहंकारवाचक नहीं, आत्मान्तर्यामिवाचक सिद्ध हो जाता है।

 

ऐसे ही ” पदं मम” में ब्रह्मा जी भगवान् को अपनी अन्तरात्मा मानकर कह रहे हैं कि मेरा पद है अर्थात् मेरे अन्तर्यामी परमात्मा श्रीरघुनाथ जी का पद है।।

११।।

 

 

 एकैवात्र प्रकर्त्तव्या श्रद्धा वाऽव्यभिचारिणी ॥

 यश्च श्रद्धान्वितः सम्यक्पदमेतन्मुनीश्वराः ॥ १२ ॥

 

भगवान् राम के इस विग्रह में अविचल श्रद्धा करनी चाहिए।हे मुनीश्वरों ! जो पूर्ण श्रद्धा से इस पद की।।१२।।

 

 पूजयिष्यति संप्राप्ते कार्तिके पूर्णिमादिने ॥

 तोयैः फलैश्च विविधैर्गंधमाल्यानुलेपनैः ॥ १३ ॥

 

कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन जल,फल और अनेक प्रकार की गंध माला चंदन से पूजा करेगा।।१३।।

 

 ब्राह्मणान्भोजयित्वा तु मिष्टान्नेन स्वशक्तितः ॥

 स यास्यति न सन्देहो मम लोकं सुदुर्लभम् ॥१४॥

 

और अपनी शक्ति के अनुसार मिष्टान्न से ब्राह्मणों को भोजन करायेगा। वह अत्यंत दुर्लभ मेरे प्रभु के लोक को प्राप्त करेगा। ‘प्रभुलोकम् ” में ” विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्य:”वार्तिक से पूर्व पद प्रभु का लोप हो गया है। 

 

 इस श्लोक में लोक शब्द सृष्टि के अन्तर्गत विद्यमान ब्रह्मा जी के लोक का वाचक नहीं, अपितु परब्रह्मस्वरूप भगवान् के धाम का वाचक है ।।१४।।

 

 ॥ पुलस्त्य उवाच ॥

 

महर्षि पुलस्त्य पुनः ययाति जी से बोले–

 

 ॥ ततो मुनिगणाः सर्वे सम्यक्छ्रद्धासमन्विताः ॥ पूजयित्वा पदं तत्र ब्रह्मलोकं समागताः ॥ १५ ॥

 

तत्पश्चात् श्रद्धापूर्वक सांगोपांग विधान से उस सर्वप्राप्य आबूपर्वतस्थ सर्वप्राप्य सर्वेश्वर श्रीरघुनाथरूपी पद का पूजन किया और ब्रह्मलोक चले गये। यहां भी ब्रह्मलोक शब्द वस्तुत: भगवद्धाम का ही वाचक है; क्योंकि ऋषियों ने संसार सागर से तरने का उपाय पूछा था। और ब्रह्मा जी का लोक संसार के अन्दर होने से उसे भी पार करने की इच्छा व्यक्त हुई थी ।।१५।।

 

 तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पदं पूज्यं नरोत्तम ॥

 पितामहपदं सम्यक्छ्रद्धया स्वर्गदायकम् ॥ १६ ॥

 

इसलिए हे नरश्रेष्ठ ! पूर्ण प्रयास करके उस उत्तम पदस्वरूप श्रीरघुनाथ जी का पूजन करना चाहिए। पितामह द्वारा स्थापित उस श्रीरघुनाथविग्रहरूप उत्तम पद का पूजन स्वर्ग को देने वाला है। स्वर्ग का तात्पर्य मोक्ष से है। जो हम पूर्व में वर्णित कर चुके हैं।।१६।।

 

 अन्यत्कौतूहलं राजन् महदृष्टं महाद्भुतम् ॥

 पदस्य तस्य यच्छ्रुत्वा जायते विस्मयो महान् ॥ १७ ॥

 

हे राजन्! उस पद का एक और महाद्भुत महान् आश्चर्यजनक प्रभाव देखा हूं।जिसे सुनकर मन में महान् आश्चर्य होता है।।१७।।

 

 आयामविस्तरेणाऽपि प्राप्ते कृतयुगे नृप ॥

 न संख्या ज्ञायते राजञ्छुक्लवर्णस्य मानवैः ॥ १८ ॥

 

कृतयुग आने पर वह पद शुक्ल वर्ण का होता है। उस पद का आयाम अर्थात् लंबाई चौड़ाई का विस्तार होने पर भी मनुष्यों द्वारा उसके परिमाप की संख्या नहीं जानी जा सकती है। जैसे ब्रह्मा और भगवान् विष्णु दिव्य शिवलिंग का पार नहीं पा सके वैसे ही इस दिव्य भगवद्विग्रह के विषय में समझना चाहिए । तात्पर्य यह कि कृतयुग में इसका चमत्कार और दिव्यता इतनी अधिक थी कि कोई इसका परिमाप निर्धारित नहीं कर सकता था ।।१८।।

 

 ततस्त्रेतायुगे प्राप्ते रक्तवर्णं प्रदृश्यते ॥

 सुव्यक्तं संख्यया युक्तं सर्वलोकनमस्कृतम् ॥ १९ ॥

 

तत्पश्चात् त्रेता युग आने पर जब रजोगुण की मात्र बढ़ने लगी तो संपूर्ण लोकों से नमस्कृत वही पद रक्त वर्ण का दिखता है। उस समय उसका आयाम सुस्पष्ट संख्या से युक्त होता है।।१९।।

 

 द्वापरे कपिलं तच्च लघु मात्रं प्रदृश्यते ॥

 कलौ कृष्णं सुमूक्ष्मं च रम्ये पर्वतरोधसि ॥ २० ॥

 

और् द्वापर युग आने पर जब तमस् का प्रवेश हुआ तब वह कपिल वर्ण का रघुनाथविग्रह पहले से लघु दिखता है। पुन: कलियुग आने पर और सूक्ष्म होकर वह कृष्ण विग्रह अर्थात् काले रंग का आबू पर्वत पर अभी भी दिखता है। यही सर्वेश्वर श्रीरघुनाथ जी हैं जो वर्तमान में सर्वेश्वर श्रीरघुनाथ मन्दिर आबू पर्वत में विराजमान हैं ।।२०।।

 

 इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे ब्रह्मपदोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥ 

 

इस प्रकार

81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” ब्रह्मपद के प्राकट्य के माहात्म्य का वर्णन करने वाला ५३ वां अध्याय पू‌र्ण हुआ।।

 

 

 

 

 

 

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