
ईशावास्योपनिषद् में १८ मन्त्र हैं । जिनमें जीवात्मा और परमात्मा के स्वरूप पर प्रकाश डालने के साथ ही हमारा क्या कर्तव्य है ? जिसके पालन से हम संसारसागर से पार उतर सकते हैं-इस विषय का बड़ा सुन्दर विवेचन है । हमें केवल ज्ञान चाहिए या केवल कर्म अथवा दोनों का सामञ्जस्य? –
इस शंका का उत्तर बड़े सुन्दर ढंग से इस ईशावास्य में प्रदर्शित किया गया है । साथ ही जैसे भगवद्गीता में –”सर्वधर्मान् परित्यज्य–” से भगवान् की शरणागति का निर्देश अर्जुन के लिए हुआ है ठीक उसी प्रकार इसमें भी अन्तिम मन्त्र में प्रभु शरणागति ही जीव के उद्धार का चरम साधन बतलायी गयी है । अतः इसके अर्थ का विचार करके हम अपने अन्तःकरण को आनन्दित कर रहे हैं ।
मन्त्र-
ईशावास्यमिदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद् धनम् ।।1।।
अहन्ता और ममतारूपी पाश में आबद्ध जीव अपने स्वरूप को विस्मृत हो गया है । अतः इसे वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त कराकर इस पाश को छिन्न भिन्न करने के लिए भगवती ईशावास्य मन्त्र की प्रथम पंक्ति से बतला रहीं हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जितनी भी वस्तुएं हैं वे सब तुम्हारी नही अपितु भगवान् की हैं और उन पर प्रभु का ही अधिकार है । ब्रह्म जीव और प्रकृति (माया) ये तीन ही तत्त्व हैं –भोक्ता=जीव,भोग्य=प्रकृति, प्रेरिता=प्रेरक=परमात्मा–
“भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्” -श्वेताश्वतरोपनिषद् -1/ 12,
समस्त जीव और प्रकृति परमात्मा के शरीर हैं –यस्य आत्मा शरीरम् ,यस्य पृथिवी शरीरम्,यस्य तमः शरीरम् –इत्यादिश्रुति वाक्य इस तथ्य की पुष्टि करते हैं । जैसे शरीर शरीरी जीव के अधीन रहता है वैसे ही परमात्मशरीरभूत जीव और प्रकृति परमात्मा के अधीन रहते हैं स्वतन्त्र नहीं । अतः हम सब जीव स्वतन्त्र नही हैं न अपने हैं न किसी अन्य जीव के। यही स्थिति प्रकृति की है वह भी भगवान का शरीर होने के कारण उन्ही की और उन्ही के अधीन है । फिर मेरा क्या है? कुछ नही ।
अर्थात् दृश्यमान या अदृश्यमान कोई भी वस्तु न अपनी है न किसी अन्य की । सब कुछ भगवान का है और उन्ही के अधीन है । अतः उनकी वस्तुओं में ममत्व बुद्धि करना अपराध है जिसका परिणाम है ८४ लाख योनियों में परिभ्रमण । ममत्व का त्याग हो जाने पर सब झगड़ा ही समाप्त हो जायेगा ।
यहां तक कि देहादि से भिन्न आत्मस्वरूप में भी भगवत्-शरीर की बुद्धि हो जाय । तब प्रभु का शरीर मैं एक यन्त्र की भाति हूं । जो हो रहा है सब उनकी इच्छा से हो रहा है । इस स्थिति में अपने और अपनी वस्तुओं की सुरक्षा के चिन्तन तथा रागादि से मुक्ति मिलेगी ।
कुछ लोग कहते हैं कि प्रपञ्च झूंठा है दृश्य होने से स्वप्न के समान । पर यह अनुमान ठीक नही ;क्योंकि वीर्यपात स्वप्न में होता है और वह जागने पर सत्य निकलता है अतः सभी स्वप्नों के मिथ्या न होने से जहां जहां दृश्यत्व है वहां वहां मिथ्यात्व है –ऐसी व्याप्ति नही बन सकती । फलतः प्रपञ्च का मिथ्यात्व नही सिद्ध किया जा सकता ।
यदि किसी को मिथ्यात्व भ्रम हो जाय तब वह भी रागादि से छूट जायेगा-इसमें कोई सन्देह नहीं ।
हमें सर्वप्रथम यह दृढ कर लेना चाहिए कि जीव और प्रकृति परमात्मा के शरीर हैं –यस्यात्मा शरीरम् ,यस्य पृथिवी शरीरम्,यस्याक्षरं शरीरम्–वृहदारण्यकोपनिषद्-5/7/7,सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा–श्वेताश्वतरोपनिषद् -6/11, जगत् सर्वं शरीरं ते( प्रभो!सम्पूर्ण जगत आपका शरीर है ) -वालमीकि रामायण-युद्धकाण्ड-117/25, और उसी के अधीन हैं । जैसे देह देही आत्मा के अधीन रहता है । और जैसे आत्मा सम्पूर्ण देह में व्याप्त रहता है ठीक इसी प्रकार परमात्मा भी सम्पूर्ण चराचर में व्याप्त है—सर्वव्यापी –इसी व्याप्ति को भगवती ईशावास्य बतला रही हैं –यत्किञ्च इस प्रथम पंक्ति से –
इदं = ये, सर्वं= सब, यत् =जो कुछ भी, जगत्यां =पृथिवी आदि समस्त लोकों में, जगत् =नामरूपात्मक वस्तु है वह, ईशा = सम्पूर्ण ऐश्वर्य वाले भगवान् से, वास्यं = निवास के योग्य है । अर्थात् चराचर अनन्त ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी विद्यमान है वह परमात्मा का शरीर है और उसके अधीन है इसीलिए वे भगवान् इन सब जीवों और प्रकृति में निवास कर रहे हैं । तात्पर्य यह कि वे प्रभु ही नानारूपों में विराजमान हैं उनसे भिन्न कुछ है ही नही ।– ऐसा निश्चय करना चाहिए –इसी को गीता में –
वासुदेव ही सब कुछ हैं–
“वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः”–7/19,
कहकर इस भाग्यशाली को दुर्लभ बतलाया गया है ।
अब द्वितीय पंक्ति का अर्थ –तेन = चूंकि सम्पूर्ण वस्तुओं के स्वामी भगवान ही हैं इसलिए, त्यक्तेन = उनकी वस्तु का उनके लिए त्याग करके अर्थात् उन्हे भोग लगा कर, जैसे यज्ञ के समय देवता को उद्देश्य करके हवि के समर्पण को त्याग कहा गया है –”देवतोद्देश्येन द्रव्यत्यागो यागः” ,वैसे ही यहां भी भगवान् को भोग समर्पण त्यक्तेन = त्याग शब्द से कहा जा रहा हैं, भुञ्जीथा = उस भोग को ग्रहण करो । भगवान् को भोग लगाकर खाने से जीव भगवान की दुरत्यय माया पर विजय प्राप्त कर लेता है । उद्धव जी भगवान् से कहते हैं कि आपकी उपभुक्त(भोगा हुआ ) माला गंध वस्त्र और आभूषण से अलंकृत (हमलोग)आपका उच्छिष्ठ खाने वाले हम लोग आपकी माया पर विजय प्राप्त कर ही लेंगे —
त्वयोपभुक्तस्रग्गन्धवासोलंकारचर्चिताः ।
उच्छिष्ठभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि । ।
–भागवतमहापुराण -11/6/46,
सब कुछ भगवान् का ही है अन्य किसी का कुछ भी नही –इसी सत्य को दृढ़ता से कह रहे हैं–मा गृधः –। गृधः =अभिकांक्षा अर्थ में गृध धातु का लुड़ लकार का रूप है । अपने भोग की आकाक्षा, मा = मत करो । अर्थात् जो कुछ भी उपभोग करना चाहो उसे प्रभु को समर्पित करके ग्रहण करो । वह भगवत्प्रसाद है उसे बांट कर सबके साथ ग्रहण करना चाहिए । इससे “सह नाववतु सह नौ भुनक्तु” के आचरण की शिक्षा दी गयी ।
हम ऐसा क्यों करें -इसे और दृढ़कर रहे हैं –कस्यस्विद् धनम् से । धनं = जो भी धन सम्पत्ति दिख रही है वह कस्य =किसी की , है क्या ?अर्थात् किसी की नही –यह अर्थ स्वित् इस आक्षेपार्थक निपात् से निकल रहा है । जब जीव और प्रकृतिमय सम्पूर्ण संसार भगवान् का ही है अन्य किसी का नही तब किसी वस्तु को अपनी मानना अपना भोग्य समझना –सबसे बड़ा अपराध है ।
अतः ममता और भोग्यबुद्धि का त्याग करना चाहिए । इसे इतना विकसित करें कि कोई भी वस्तु न मेरी है न दूसरे की सब कुछ भगवान् का है । और कोई भी वस्तु न हमारी भोग्य है न किसी अन्य जीव की ,सब कुछ भगवान का ही भोग्य है–ऐसा दृढ़निश्चय हटे ही नही ।
यदि ऐसा चिन्तन सबका हो जाय तो यह धरा ही वैकण्ठ बन जाय ।
भगवान् अपरिच्छिन्न हैं । पर वे अणु से भी अणु और महान् से भी महान् हैं–अणोरणीयान् महतो महीयान् –श्वेताश्वतर-3/20, । अतः वे कण कण में रह सकते हैं और परम महान् हैं जिससे अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड उनमें विराजमान है इसलिए उनका एक नाम वासुदेव भी है । उनसे रहित कोई वस्तु है ही नही –
“न तदस्ति विना यत् स्यान्मया भूतं चराचरम् ।।”-गीता-10/39,
इस मन्त्र के जगत् पद से चराचर का ग्रहण होने से उसमें जीव और प्रकृति तथा ईशा से ईश्वर का कथन होने से ब्रह्म जीव और माया ये तीन तत्त्व सिद्ध हो रहे हैं और इन रूपों में भगवान् से अतिरिक्त कुछ है भी नही ।
जय श्रीराम
#आचार्यसियारामदासनैयायिक

Gaurav Sharma, Haridwar
