नरक चतुर्दसी और काली चौदश

नरक चतुर्दसी और काली चौदश

दीपावली के एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी आती है । इसको काली चौदस भी कहते हैं । इस चतुर्दशी से सम्बद्ध अनेक मत हैं । कोई कहते हैं कि इसी दिन भगवान् कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था । कोई कहते हैं कि राजा रन्तिदेव इसी दिन
व्रत पूजा करके नरक जाने से बचे थे । इस चतुर्दशी से नरक का नाम कब और कैसे जुड़ा — इसमें दन्तकथा को छोड़कर कोई पुष्ट प्रमाण नही है ।

रही राजा रन्तिदेव वाली कथा– यह तो एकदम शास्त्रविरुद्ध है । पुराणोत्तम भागवत में रन्तिदेव की कथा है कि वे ४८दिन भूंखे रहे ४९वें दिन भोजन मिला तो उसे एक ब्राह्मण को समर्पित कर दिये । शेष अंश खाने बैठे तो एक भूखे शूद्र के आ जाने पर उसे भोजन दे दिये। पुनः कुत्तों के साथ एक चाण्डाल आया उसे भोजन देने के बाद केवल कुछ जल बचा और उसे भी एक व्यक्ति को देकर प्रार्थना करते हैं–

हे प्रभो ! मैं मोक्ष नही चाहता अपितु दीन दुःखियों की भूख प्यास आदि सभी कष्टों को स्वयं भोगना चाहता हूं जिससे वे सुखी हो जांय । ये महाराज स्वभाव से ही करुणायुक्त थे किसी परिस्थितिवशात् नही –

“निसर्गकरुणो नृपः।”- भागवत पुराण –९/२१/१४,

अतः रन्तिदेवजी यमराज या नरक के भय से ब्राह्मण को भोजन दिये ऐसी कल्पना कोई नही कर सकता । ऐसे रन्तिदेव के विषय में मनगढ़न्त कथा कैसे जुड़ी –यह चिन्तनीय है । ऐसा ही नरकासुर के विषय में है । वह पृथिवी से भगवान् वाराह द्वारा उत्पन्न हुआ पर मारा गया श्रीकृष्ण के हाथों–भागवत ५९/२१,अभी किसी ने लिखा है कि इसकी मृत्यु सत्यभामा से हुई । ऐसे अप्रामाणिक लेखों से बचें ।।

काली चौदश

इसे काली चौदश भी कहते हैं । इस रात्रि को डाइनें एकान्त में विराजमान हनुमान् जी के मन्दिर में अर्धरात्रि में जाकर नग्न नृत्य करती हैं और उनके द्वारा वीर नामक शक्ति प्राप्त करके लोगों पर अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके तान्त्रिकता को कलंकित करती हैं। हनुमत्सहस्रनाम में “डाकिनीवरदाता च डाकिनीप्राणहारकः”-ये दो नाम इस विषय की पुष्टि करते हैं । भक्त पर जब डाइनें शक्ति अजमाती हैं तब हनुमान जी उनका प्राण हरण कर लेते हैं ।

हां इस दीपावली के पूर्व की चतुर्दशी का नाम नरकचतुर्दशी भले शास्त्रीय प्रमाणोंसे रहित हो पर इस दिन दीप लगाने तथा पूजा करने का विशेष फल है । यदि दिन में चतुर्दशी और रात्रि में अमावस्या हो तो लक्ष्मी जी का पूजन विशेष फलदायी है–

अमावस्या यदा रात्रौ दिवाभागे चतुर्दशी । पूजनीया तदा लक्ष्मीर्विज्ञेया सुखरात्रिका ।।

कुबेर, यम आदि का पूजन आज विशेष रूप से करना चाहिए । भगवद्भक्तों को भगवान् का ही पूजन करना

चाहिए । इस दिन किया हुआ स्नान दान आदि सौगुना अधिक फलप्रद है –

महापुण्या तिथिरियं बलिराज्यविवर्धिनी ।
स्नानं दानं शतगुणं कार्तिकेऽस्यां तिथौ भवेत् । ।

आज के दिन किये गये सकरात्मक विचार शुभ कार्य आदि वर्ष पर्यन्त व्यक्ति को प्रभावित रखते हैं –

यो यो यादृशभावेन तिष्ठत्यस्यांयुधिष्ठिर । हर्षदैन्यादिना तेन तस्य वर्षं प्रयाति हि । । –पद्मपुराण

जय श्रीराम

#आचार्यसियारामदासनैयायिक

Gaurav Sharma, Haridwar

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