संस्कृत भाषा में पुण्यजनकता

भाषा कोई भी हो उसका प्रयोजन समस्त व्यवहारों का सम्पादन है । हम ” घटम् आनय” के स्थान पर “गगरी या घड़ा ले आओ” का प्रयोग करके काम चला सकते हैं । भले ही गगरी या घड़ा संस्कृत का शब्द नहीं है । तो संस्कृत भाषा का प्रयोग करने से क्या विशेष लाभ है ? और इसे देवभाषा क्यों कहा जाता है ?

 व्याकरण से साधु शब्दों के प्रयोग का ज्ञान होता है । जैसे घड़ा के स्थान पर “घटः” । यहाँ व्याकरण की दृष्टि से “घटः” शब्द साधु और घड़ा असाधु । अर्थात् वह व्याकरण से नहीं बनता । जब व्यवहार का सम्पादन असाधु घड़ा शब्द से हो सकता है। तब “घटः” जैसे संस्कृत शब्दों का प्रयोग करने से क्या लाभ ?

इस पर महाभाष्यकार भगवान् पतञ्जलि कहते हैं कि व्याकरण से जो शब्द सिद्ध नहीं हैं वे “अपशब्द” हैं । “घटः” इत्यादि शब्दों से तथा “घड़ा” इत्यादि अपशब्दों से भले ही समान अर्थ प्रतीत हो । किन्तु अपशब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए ;क्योंकि उनसे अधर्म की उत्पत्ति होती है और व्याकरणसम्मत शब्दप्रयोग से व्यक्ति का अभ्युदय होता है–

“समानायामर्थावगतौ शब्दैश्चापशब्दैश्च शास्त्रेषु धर्मनियमः क्रियते , शब्देनैवार्थोSभिधेयो नापशब्देन एवं क्रियमाणमभ्युदयकारि भवतीति” । 

इसीलिए वाक्यपदीयकार श्रीभर्तृहरि कहते हैं कि पाणिनि आदि शिष्ट महापुरुषों से प्राप्त व्याकरण से सिद्ध शब्द धर्म ( पुण्य ) के जनक हैं और उससे असिद्ध शब्द ( जिसे महाभाष्यकार अपशब्द शब्द से कह रहे हैं ) अधर्म के उत्पादक हैं । भले ही वे समानार्थक क्यों न हों-

शिष्टेभ्य आगमात् सिद्धा साधनो धर्मसाधनम् । अर्थप्रत्यायनाभेदे विपरीतास्त्वसाधवः ।।-ब्रह्मकाण्ड-२७

 अपशब्द के प्रयोग का परिणाम है –“अधर्म” जो पराभव का कारण बनता है । भगवान् महाभाष्यकार श्रौतवचन प्रस्तुत करके कहते हैं कि असुरों ने जो अपशब्द का प्रयोग किया वही उनके पराजय का कारण बना- ???? “ते Sसुरा हेSलयो हेSलय इति कुर्वन्तः पराबभूवुः । तस्माद् ब्राह्मणेन न म्लेच्छितवै नापभाषितवै, म्लेच्छो ह वा एष यदपशब्दः” -१/१/१पस्पशाह्निक,महाभाष्य ।

  यदि कहें कि संस्कृत “देवभाषा” है और उसे यदि असुर शुद्ध न बोल सके तो उनकी पराजय क्यों ? तो इसका उत्तर यह है कि असुर सुर ( देव ) विरोधियों को कहते हैं और देवों की भाँति इनके भी पिता महर्षि कश्यप ही हैं तथा मातायें परस्पर सगी बहनें । इसलिए इन असुरों की गणना “देवयोनि” में की गयी है–

विद्याधरोSप्सरोयक्षरक्षोगन्धर्वकिन्नराः । पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोSमी देवयोनयः ।।

-अमरकोष-१/१/११

 ब्राह्मणों के लिए तो यह अनिवार्य है कि वे संस्कृत शब्दों का ही प्रयोग करें । ब्राह्मण भूसुर ( भूलोक के देव ) हैं उन्हें ” सुदेवो असि वरुण —सत्यदेवोSसि,–।। सत्यदेवाः स्यामित्यध्येयं व्याकरणम्” -१/१/ पस्पशाह्निक,महाभाष्य । इस वचन के अनुसार व्याकरण का अध्ययन करके सत्य से प्रकाशित होकर वस्तुतः 

सत्यदेव बनकर सभी को सत्यता का पाठ पढ़ाना होगा ।

 जिससे सम्पूर्ण संसार में व्याप्त असत्यमूलक भ्रष्टाचार, आतंकवाद आदि को निर्मूल करके हम भारत की  “वसुधैव कुटुम्बकम्” भावना विश्व के जन- जन में भर सकें । और असत्य, आतंकवाद आदि से निर्मुक्त स्वर्णिम विश्व की स्थापना कर सकें । 

संस्कृत से दूर हो जाने के कारण ही आज हम अपनी संस्कृति से भी दूर हो गये । जिसके कारण भारत “विश्वगुरु” बना हुआ था । आज उसी संस्कृत भाषा की उपेक्षा से वह अपने स्वरूप को भी भूल चुका है । 

संस्कृत भाषा के शब्दों की बात छोड़े, इसके ग्रन्थों की जितनी संख्या है । उतने शब्द इंटरनेशनल लैंग्वेज मानी जाने वाली इंग्लिश में नहीं हैं । १२ देशों की भाषा इंग्लिश में उतने शब्द नहीं जो केवल हमारे देश भारत की संस्कृत के 

पुस्तकों की है । 

संस्कृत भाषा के ६अरब शब्दों तक की ही गणना कम्प्यूटर से हो पायी है । जो आज संस्कृत के कतिपय विद्वानों तक ही सीमित है । इसलिए अपनी संस्कृति और भारत को “विश्वगुरु” की उपाधि से विभूषित कराने वाली संस्कृत को हमें पुनः खोये सम्मान को प्राप्त करने के लिए अपनाना ही पड़ेगा । 

—जय श्रीराम—

—जयतु भारतम् , जयतु वैदिकी संस्कृतिः—

#आचार्यसियारामदासनैयायिक #संस्कृत

3 Replies to “संस्कृत भाषा में पुण्यजनकता

  1. स्याच्छब्दैश्चापशब्दैश्च स्वीयाभीष्टार्थबोधनम्।
    साधुशब्दैस्तु धर्माप्तिरसाधुभिरधर्मता।।

    1. साधुवादा:। तस्मात् प्रयोक्तव्या: साधुशब्दा: ।।

  2. साधूक्तं श्रीमता यद्धि भाषणीयं सुसंस्कृतम्।
    प्राप्तिस्तेनास्ति धर्मस्याsसाधवोsधर्मदायकाः।।

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