अध्याय ३६,चण्डिकाश्रम का माहात्म्य,भाग-१

॥ ययातिरुवाच ॥

ययाति जी बोले–

॥ चण्डिकाया द्विजश्रेष्ठ कथं तत्राश्रमोऽभवत् ॥ कस्मिन्काले फलं तेन किं दृष्टेन भवेन्नृणाम् ॥ १ ॥

हे द्विजवर! आबू पर्वत में भगवती चंडिका का आश्रम कैसे हुआ ? और किस समय उस स्थान का दर्शन करने से मनुष्यों को किस प्रकार का फल प्राप्त होता है।।१।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले–

॥ शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् ॥
यां श्रुत्वा मानवः सम्यक् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २ ॥

हे राजन्! संपूर्ण पापों को नष्ट करने वाली कथा सुनो। जिस कथा को सुनकर मनुष्य समस्त पापों से पूर्णतया मुक्त हो जाता है ।।२।।

पुरा देवयुगे राजन् महिषो नाम दानवः ॥
पितामहवराद्दृप्तः सर्वदेवभयंकरः ॥ ३ ॥

राजन् ! पूर्व काल सतयुग में महिष नाम का एक दानव था । जो पितामह ब्रह्मा के वर से घमंड में भरकर संपूर्ण देवताओं को भय उत्पन्न करता रहता था।।३।।

तेन शक्रादयो देवा जिताः संख्ये सहस्रशः ॥
भयात्तस्य दिवं हित्वा गतास्ते वै यथादिशम् ॥ ४ ॥

उसने युद्ध में हजारों की संख्या में इंद्रादि देवताओं को युद्ध में जीत लिया । उसके भय से हुए देवगण स्वर्ग को छोड़कर इधर-उधर दिशाओं में भग गए ।।४।।

त्रैलोक्यं स वशे कृत्वा स्वयमिन्द्रो बभूव ह ॥५ ॥

वह तीनों लोकों को वश में करके स्वयं इंद्र बन बैठा।।५।।

आदित्या वसवो रुद्रा नासत्यौ मरुतां गणाः ॥
कृतास्तेन तथा दैत्या यथार्हं बलवत्तराः ॥ ६ ॥

उसने द्वादश आदित्य 8 वर्ष 11 रुद्रा और दो अश्वनी कुमारों तथा मरुद्गणों को हटाकर उनके स्थान पर बलवानों में श्रेष्ठ दैत्यों को यथायोग्य स्थापित किया
।।६।।

वह्निर्भयं समापन्नस्त्यक्त्वा देवगणांस्तदा ॥
दानवेभ्यो हविर्भागं देवेभ्यो न प्रयच्छति ॥ ७ ॥

उसे समय अग्नि देव भयभीत हो गए उन्होंने देवगणों का साथ छोड़कर दानवों के लिए यज्ञ का भाग देना आरंभ किया। वे देवताओं को उनका भाग नहीं देते थे।।७।।

उद्द्योतं कुरुते सूयों यादृक्तस्याभिसंमतः ॥
यज्ञभागं विनाऽप्येष भयात्पार्थिवसत्तम ॥ ८ ॥

वह जैसा चाहता था वैसे ही उसकी इच्छा अनुसार सूर्य देव प्रकाश करते थे । हे राजेंद्र! यज्ञ भाग के बिना भी भय के कारण सूर्य को ऐसा करना पड़ता था।।८।।

लोकपालास्तथा सर्वे तस्य कर्म प्रचक्रिरे ॥ दासवत्पार्थिवश्रेष्ठ यज्ञभागं विनाकृताः ॥ ॥ ९ ॥

हे राजेंद्र ! समस्त लोकपाल दास की भांति यज्ञ भाग से हीन होकर उसके समस्त कार्य को करते थे।।९।।

कस्यचित्त्वथ कालस्य सर्वे देवाः समेत्य तु ॥ पप्रच्छुर्विनयोपेता विप्रश्रेष्ठं बृहस्पतिम् ॥ १० ॥

कुछ समय बीतने पर समस्त देवगण मिल कर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ बृहस्पति जी से विनय पूर्वक पूछे।।१०।।

भगवन् किं वयं कुर्मः कुत्र यामो निराश्रयाः ॥
तस्माद्ब्रूहि क्षयोपायं महिषस्य दुरात्मन्ः ॥ ११ ॥

हे भगवन् ! हम लोग क्या करें ? निराश्रय हैं । कहां जाएं ? इसलिए दुष्टात्मा महिषासुर के नाश का उपाय आप हमें बतलाएं ।।११।।

एवमुक्तो गुरुर्देवैर्ध्यात्वा कालं चिरं नृप ।॥ ततस्तांस्त्रिदशान्प्राह जीवयन्निव भूपतेः ॥ १२ ॥

हे राजन्! इस प्रकार दीर्घकाल पर्यंत ध्यान करके देवगुरु बृहस्पति ने देवताओं को मानो जीवित करते हुए इस प्रकार कहा।।१२।।

॥ बृहस्पतिरुवाच ॥

ययाति बोले —

॥ ब्रह्मलब्धवरो दैत्यः पौरुषे च व्यवस्थितः ॥
अवध्यः सर्वदेवानां मुक्त्वैकां योषितं सुराः ॥
व्रजध्वं सहितास्तस्मादर्बुदं पर्वतोत्तमम् ॥ १३ ॥

हे देवगण! ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त करके वह दैत्य सर्वदा पराक्रम संबंधी कार्यों में लगा रहता है। वह एक स्त्री को छोड़कर संपूर्ण देवताओं से अवध्य है । इसलिए तुम सब मिलकर तप के लिए पर्वतों में उत्तम आबू पर्वत पर जाओ ।।१३।।

तपोSर्थं तत्र संसिद्धिर्जायतामचिराद्धि वः ॥
शक्तिरूपां परां देवी चण्डिका कामरूपिणीम् ॥१४॥

वहां तुम लोगों को शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होगी। तुम लोग इच्छानुसार रूप धारण करने वाली शक्तिरूपा
देवियों में श्रेष्ठ देवी चण्डिका की।।

॥आराधयध्वमेकांते यया व्याप्तमिदं जगत् ॥
सा तुष्टा वै वधार्थं तु महिषस्य दुरात्मनः ॥ १५ ॥

एकांत में दुरात्मा महिषासुर के वध के लिए आराधना करो। जिन भगवती से संपूर्ण जगत व्याप्त है ।।१५।।

करिष्यति समुद्योगमवतारसमुद्भवम् ॥
तस्या: हस्तेन सोऽवश्यं वधं प्राप्स्यति दुर्मतिः॥१६ ॥

वे तुम्हारे तप से प्रसन्न होकर वे देवी
अवतार लेकर स्वयं को प्रकट करने का प्रयास करेंगी।।१६।।

अहं वः कीर्तयिष्यामि शक्तियं मन्त्रमुत्तमम् ॥ पूजाविधानसंयुक्तं भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम् ॥ १७ ॥

मैं तुम लोगों के लिए भोग और मोक्ष देने वाला, सुंदर पूजा के विधान से संयुक्त शक्ति संबंधी उत्तम मंत्र बताऊंगा ।।१७।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥
पुलस्त्य जी बोले–

॥ एवमुक्ताः सुराः सर्वे हर्षेण महतान्विताः ॥
तेनैव सहिता राजन्गताः पर्वतमर्बुदम् ॥ १८ ॥

हे राजन्! बृहस्पति जी के द्वारा इस प्रकार कहने पर संपूर्ण देवता हर्ष से भर गए और उनके साथ ही आबू पर्वत पहुंचे।।१८।।

तत्र स्नाताञ्छुचीन्सर्वान्दीक्षयामास गीष्पतिः ॥
शक्तियैः परमैर्मन्त्रै: सद्यःसिद्धिकरैर्नृप ॥ १९ ॥

वहां पर बृहस्पति जी ने स्नान करके पवित्र हुए उन सभी देवताओं को शीघ्र ही सिद्धि डंडंँैदेने वाले भगवती शक्ति से संबंधित उत्तम मंत्र से दीक्षित किया।।१९।।

सार्धयामत्रयं तत्र परिवारसमन्विताः ।।
बलिपूजोपहारैश्च गन्धमाल्यानुलेपनैः ॥ २० ॥

मन्त्रेण विविधेनैव चारुस्तोत्रेण भक्तितः ॥
प्रार्थयंतस्तथा नित्यं दीपज्योतिः समाहिताः ॥ २१ ॥

संपूर्ण देव परिवार से संयुक्त होकर भगवती के लिए देने योग्य वस्तु, पूजा एवम् उपहार तथा विविध गन्ध, माला और चंदनादि अनुलेपन के द्वारा साढ़े तीन प्रहार तक वहां सुंदर स्तोत्र, अनेक प्रकार के मन्त्रों से भक्ति पूर्वक देवगण एकाग्रचित होकर प्रतिदिन दीपक की ज्योति को भगवती का स्वरूप मानकर के प्रार्थना करते रहे।।२०।।

निर्ममा निरहंकारा गुरुभक्तिपरायणाः ॥ अंगन्याससमायुक्ताः समदर्शित्वमागताः ॥२२॥

इस प्रकार तप करते हुए वे देवता ममता एवं अहंकार से शून्य हो गए । गुरु की भक्ति में निरत वे अंगन्यास से युक्त होकर मंत्र जप के प्रभाव से समदर्शिता को प्राप्त किये। अर्थात समदर्शी हो गए।।२२।।

एवं संतिष्ठमानानां तेषां पार्थिवसत्तम ॥
सप्त मासा व्यतिक्रांतास्ततस्तुष्टा सुरेश्वरी ॥ २३ ॥

हे राजेंद्र ! इस प्रकार अनुष्ठान करते हुए उन देवताओं के सात मास बीत गए । तत्पश्चात् भगवती सुरेश्वरी संतुष्ट हुईं।।२३।।

दीपज्योतिःसमावेशात्तेषां गात्रेषु पार्थिव ॥
मन्त्रेण परिपूतानां परं तेजो व्यवर्धत ॥ २४ ॥

हे नृप! देवताओं के शरीर में दीपज्योति रूप भगवती का आवेश हुआ । मंत्र के जप से वे परम पवित्र हो गए थे । इसलिए उनका उत्कृष्ट तेज बढ़ने लगा।।२४।।

द्वादशार्कप्रभा जाताः षण्मासाभ्यन्तरेण ते ॥
अथ तांस्तेजसा युक्ताञ्ज्ञात्वा जीवो महीपते ॥ २५ ॥

हे राजा न वे देवगन 6 महीने के अंदर ही द्वादश सूर्य की प्रभाव से संपन्न हो गए तत्पश्चा टी उन्हें दिव्य तेज संयुक्त जानकर श्री बृहस्पति जी।।२५।।

मण्डलं रचयामास सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥
उपवेश्य ततः सर्वान्समस्तांस्त्रिदशालयान् ॥ २६ ॥

ने संपूर्ण सिद्धियों को देने वाले मंडल की रचना की। और उसमें संपूर्ण देवताओं को बिठाकर।।२६।।

तेषां शरीरगं तेजः शक्तियैर्मन्त्रसत्तमैः ॥
आकृष्य न्यसयामास मण्डले तत्र पार्थिव ॥ २७ ॥

उनके शरीर में विद्यमान तेज को शक्ति संबंधी उत्तम मन्त्रों से खींच करके राजन्! उसे मंडल में स्थापित किया।।२७।।

ततस्तेजोमयी कन्या तत्र जाता स्वरूपिणी ॥
शक्तिरूपा महाकाया दिव्यलक्षणलक्षिता ॥ २८ ॥

ऐसा करते ही वहां एक तेजस्स्वरूपिणी रूपवती कन्या उत्पन्न हुई। जो शक्तिस्वरूपा, बड़े विशाल शरीर वाली और दिव्या लक्षणों से युक्त थी।।२८।।

इन्द्रस्तस्यै ददौ वज्रं स्वपाशं च जलेश्वरः ॥
शक्तिं च भगवानग्निः सिंहयानं धनाधिपः ॥ २९॥

देवराज इंद्र ने उस कन्या को वज्र तथा वरुण ने अपना पाश दिया । भगवान् अग्नि ने उसे शक्ति और धनाध्यक्ष कुबेर ने सिंह रूपी वाहन दिया।।२९।।

अन्ये चैव गणाः सर्वे निजशस्त्राणि हर्षिताः ॥
तस्यै ददुर्नृपश्रेष्ठ स्तुतिं चक्रुः समाहिताः ॥ ३० ॥

अन्य देवताओं ने भी हर्षित होकर उसे अपने अस्त्र-शस्त्र दिए । हे राजेंद्र ! तत्पश्चात् उन लोगों ने उस दिव्य कन्या की स्तुति करना आरंभ किया।।३०।।

॥ देवा ऊचुः ॥

देवगण बोले–

॥ नमस्ते देवदेवेशि नमस्ते काञ्चनप्रभे ॥
नमस्ते पद्मपत्राक्षि नमस्ते जगदम्बिके ॥ ३१ ॥

हे देव देवेशि! आपको नमस्कार है। हे स्वर्ण के समान प्रभा वाली भगवति! हे कमलनयनि! हे जगदंबिके आपको वार-वार नमस्कार है।।३१।।

नमस्ते विश्वरूपे च नमस्ते विश्वसंस्तुते ॥
त्वं मतिस्त्वं धृतिः कान्तिस्त्वं सुधा त्वं विभावरी ॥ ३२ ॥

हे विश्वरूपिणि! आपको नमस्कार है । हे विश्व के द्वारा वन्द्य भगवति! तुम्हें नमन है । तुम्हीं बुद्धि हो। तुम्हीं धैर्य, कांति, अमृत और रात्रि भी हो।।३३।।

क्षमा ऋद्धिः प्रभा स्वाहा सावित्री कमला सती ॥
त्वं गौरी त्वं महामाया चामुण्डा त्वं सरस्वती ॥ ३३॥

तुम्हीं क्षमा, ऋद्धि, प्रभा, स्वाहा, सावित्री, लक्ष्मी और सती भी हो । तुम्हीं गौरी, महामाया, चामुंडा और सरस्वती भी हो ।।३३।।

भैरवी भीषणाकारा चण्डमुण्डासिधारिणी ॥
भूतप्रिया महाकाया घंटाली विक्रमोत्कटा ॥ ३४ ॥

हे देवि! तुम्हीं भैरवी, भीषण आकार वाली, चंड मुंड के शिर और खड्ग को धारण करने वाली हो । तुम्हें प्राणी अत्यंत प्रिय हैं । तुम विशाल शरीर वाली, घंटा धारिणी और प्रचंड पराक्रम वाली हो।।३४।।

मद्यमांसप्रिया नित्यं भक्तत्राणपरायणा ॥
त्वया व्याप्तमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ३५ ॥

हे देवि! तुम्हें मद्य और मांस अत्यंत प्रिय है और तुम नित्य भक्तों की रक्षा में लगी रहती हो । तुम्हारे द्वारा चराचर सहित तीनों लोक व्याप्त हैं अर्थात तीनों लोकों में तुम व्याप्त हो।।३५।।

॥ पुलस्त्य उवाच ॥

पुलस्त्य जी बोले–

॥ एवं स्तुता सुरैः सर्वैस्ततो देवी प्रहर्षिता ॥
तानब्रवीद्वरं सर्वा गृह्णन्तु मम देवताः ॥ ३६ ॥

इस प्रकार संपूर्ण देवगणों के द्वारा स्तुति किए जाने पर भगवती अत्यंत प्रसन्न हुई और उनसे बोली कि तुम सब देवता मुझसे वर ग्रहण करो।।३६।।

॥ देवा ऊचुः ॥

देवता बोले–

॥ दानवो महिषो नाम पितामहवरान्वितः ॥
अवध्यः सर्वभूतानां देवानां च तथा कृतः ॥ ३७ ॥

मुक्त्वैकां योषितं देवि तस्मात्तं विनिपातय ॥ ३८ ॥

हे मात:! महिष नाम का दानव पितामह ब्रह्मा के बर से युक्त है और संपूर्ण प्राणियों तथा देवताओं के द्वारा वह अवध्य है । इस प्रकार ब्रह्मा जी ने उसे अपने वर के द्वारा इन सबसे अवध्य कर दिया है।।३७।।
हे देवि! केवल एक स्त्री को छोड़कर वह सबसे अवध्य है । इसलिए आप उसे मार डालें।।३८।।

॥ देव्युवाच ॥

भगवती बोलीं —

॥ गच्छध्वं त्रिदशाः सर्वे स्वानि स्थानानि निर्वृताः ॥ ॥ अहं तं सूदयिष्यामि समये पर्युपस्थिते ॥ ३९।।

हे देवगणों! तुम सब सानंद अपने अपने स्थानों को चले जाओ । समय आने पर मैं उसे अवश्य ही मार डालूंगी।।३९।।

एवमुक्ता गताः सर्वे देवाः स्थानानि हर्षिताः ॥ ४० ॥

भगवती के इस प्रकार कहे जाने पर संपूर्ण देव हर्षित होकर अपने-अपने धाम चले गए।।४०।।

देवी तत्रैव संहृष्टा स्थिता पर्वतरोधसि।।
कस्यचित्त्वथ कालस्य नारदो भगवान् ऋषि: ।।४१।।

देवी वहीं आबू पर्वत के नक्की सरोवर ( इसे स्कंदमहापुराण में चक्र तीर्थ के नाम से बतलाया गया है)के तट पर प्रसन्न मन से स्थित हुई कुछ समय के पश्चात उनके समीप भगवान नारद ऋषि पहुंचे।।४१।।

तत्र देवीं च संदृष्ट्वा तीर्थयात्रापरायणः ॥ त्रिविष्टपमनुप्राप्तो महिषो यत्र तिष्ठति ॥ ४२ ॥

तीर्थयात्रापरायण श्रीनारद जी वहां देवी का दर्शन करके स्वर्ग पहुंचे । जहां महिष नाम का दानव विद्यमान था।।४२।।

तत्र दृष्ट्वा मुनिं प्राप्तं प्रणम्य महिषासुरः ।॥
विनयेन समायुक्तो ह्यभ्युत्थानमथाकरोत् ॥४३॥

स्वर्ग लोक में महिषासुर ने नारद मुनि को पहुंचा देखकर प्रणाम किया और विनय पूर्वक उनका स्वागत किया।।४३।।

ततस्तं पूजयामास मधुपर्कार्ध्यविष्टरैः ॥
सुखासीनं सुविश्रान्तं ज्ञात्वा वाक्यमुवाच ह ॥ ४४ ॥

उसने देवर्षि की मधुपर्क, अर्घ्य, आसन आदि से पूजा की और उन्हें आसन पर सुख पूर्वक विश्राम किया हुआ जानकर वह बोला–४४।।

कुतो भवानितः प्राप्तः किमर्थं मुनिसत्तम ॥
अमी पुत्रास्तथा राज्यं कलत्राणि धनानि च ॥ ४५ ॥

है देवर्षे!हे मुनिवर ! आप यहां कहां से और किस प्रयोजन से पधारे ? मेरे ये पुत्र,पत्नी, धन और संपूर्ण राज्य।।४५।।

अहं भृत्यसमायुक्तः किमनेन द्विजोत्तम ।॥
सर्वं तेऽहं प्रदास्यामि ब्रूहि येन प्रयोजनम् ॥ ४६ ॥

इन सब के साथ भृत्यों के सहित में स्वयं को आपको दे रहा हूं । मुझे इन सब से क्या लेना देना है । आप अपने आगमन का प्रयोजन बतलाएं।।४६।।

॥ नारद उवाच ॥

नारद जी बोले —

॥ अभिनन्दामि ते सर्वमेतत्त्वय्युपपद्यते ॥
निःस्पृहा हि वयं नित्यं मुनिधर्मं समाश्रिताः ॥ ४७ ॥

है महिष! मैं तुम्हारा अभिनंदन करता हूं। ये सब वस्तुएं तुम्हें ही शोभा देती हैं। हम लोग मुनिधर्म का आश्रय लेकर संपूर्ण वस्तुओं से निशस्पृह हो चुके हैं।।४७।।

कौतूहलादिह प्राप्तश्चिरात्ते दर्शनं गतः ।॥ मर्त्यलोकात्समायातो यास्यामि ब्रह्मणः पदम् ॥ ४८ ॥

मैं बहुत समय के बाद कुतूहलवशात् मृत्युलोक से आपका दर्शन करने आया था और अब यहां से ब्रह्मा जी के लोक को जाऊंगा।।४८।।

॥ महिषासुर उवाच ॥

महिषासुर बोला–

॥ कचिद्दृष्टं त्वया किश्चिदाश्चर्य भूतले मुने ॥
देवं वा मानुषं वापि दानवा लम्भिता विभो ॥ ४९ ॥

हे मुने! आपने भूतल पर कहीं कुछ आश्चर्य देखा क्या? हे प्रभो! देवता मनुष्य या दानव कोई आपको आश्चर्य जनक मिला क्या?।‌४९।।

॥ नारद उवाच ॥

नारद जी बोले–

॥ अत्याश्चर्यं मया दृष्टं दानवेन्द्र धरातले ॥
यन्न दृष्टं कचित्पूर्वं त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ ५० ॥

हे दानवराज! पृथ्वी पर मैंने बहुत बड़ा आश्चर्य देखा जो तीनों लोक में चराचर जगत में कहीं भी मुझे नहीं दिखाई पड़ा था ।।५०।।

अस्त्यर्बुद इति ख्यातः पर्वतो धरणीतले ॥
सर्वर्तषुष्पितैर्वृक्षैः शोभितः स्वर्गसन्निभः ॥ ५१ ॥

पृथ्वी पर अर्बुद नाम का एक विख्यात पर्वत है। जो स्वर्ग के समान है। और संपूर्ण ऋतुओं के वृक्षों एवं पुष्पों से सुशोभित होता रहता है।।५१।।

बकुलैश्चम्पकैश्वाप्रैरशोकैः कर्णिकारकैः ॥
शाळेस्तालैश्च खर्जरैर्वटैर्भल्लातकैर्थवैः ॥ ५२ ॥

जो बकुल,चंपक, अश्वत्थ अशोक: कनेर,साल, ताल,खजूर, बट, भलातक, नव।।५२।।

सरलैः पनसै वृक्षेस्तिंदुकैः करवीरकैः ॥
मन्दारैः पारिजातैश्च मलयैश्चन्दनैस्तथा ॥ ५३ ॥

पुष्पजातिविशेषैश्च सुगंधैरप्यनेककैः ॥
खाद्यैः सर्वैस्तथा लेहैश्चोष्यैः फलवरैर्वृतः ॥ ५४ ॥

जो सरल पनस के वृक्षों, तिंदुक,कनेर, मंदार, पारिजात,मलय चंदन तथा सुगंधित विशेष पुष्पों से सुशोभित था। इतना ही नहीं वह संपूर्ण खाद्य पदार्थ लेह्य,चोष्य और सुंदर फलों से भी भरा हुआ था।।५४।।

न स वृक्षो न सा वल्ली नौषधी सा धरातले ॥
न तत्र याऽसुरज्येष्ठ पर्वते वीक्षिता मया ॥ ५५ ॥

हे असुरश्रेष्ठ! धरातल में वह वृक्ष , वह लता, वह औषधि मैंने नहीं देखी । जो उस आबू पर्वत में न हो। ।५५।।

पक्षिणो मधुरारावाश्चकोरशिखिचातकाः ॥
कोकिला धार्तराष्ट्रशश्च भ्रमराः श्वेतपत्रकाः ।। ५६ ॥

मधुर आलाप भरने वाले पक्षी, चकोर,मयूर,चातक,कोकिल, काली चोंच और चरणों से युक्त हंस,भंवरे और श्वेत पंख वाले हंस भी वहां थे।।५६।।

येषां शब्दं समाकर्ण्य मुनयोऽपि समाहिताः ॥
क्षोभं यान्ति त्रिकालज्ञाः कन्दर्पशरपीडिताः ॥ ५७ ॥

जिनके शब्दों को सुनकर एकाग्रशित वाले त्रिकालज्ञ मुनि भी काम के बाण से पीड़ित होकर विचलित हो जाते थे।।५७।।

निर्झराणि सुरम्याणि नद्यश्च विमलोदकाः ॥ पद्मिनीखण्डसंयुक्ता ह्रदाः शतसहस्रशः ॥ ५८ ॥

वहां सैकड़ों हजारों की संख्या में सुंदर झरने, शुद्ध जल वाली नदियां और कमलिनियों के समूह से युक्त अनेक जलह्रद विद्यमान थे ।।५८।।

पद्मपत्रविशालाक्षा मध्यक्षामाः शुचिस्मिताः ॥
विवेकिनो नरास्तत्र शास्त्रव्रतसमन्विताः ॥ ५९ ॥

इतना ही नहीं, वहां पर कमल के समान नेत्र, पतली कमर तथा सुंदर मुस्कान वाले शास्त्रोक्त व्रतों से संपन्न विवेकशील मनुष्य भी थे।।५९।।

किं चात्र बहुनोक्तेन यत्किचित्तत्र पर्वते ॥ स्वेदजाण्डजसंज्ञेया उद्भिज्जाश्च जरायुजाः ॥ सर्वलोकोत्तरास्तत्र दृश्यन्ते पर्वतोत्तमे ॥ ६० ॥

इस विषय में अधिक क्या कहा जाए। उस पर्वत पर स्वेदज, अंडज और जितने भी लोकोत्तर प्राणी हैं। वे सब वहां पर दिखाई देते थे ।।६०।।

दशयोजनविस्तारो द्वाभ्यां संहितपर्वतः ॥
उचैः पंच च सः श्रीमान्मर्त्ये स्वर्गो व्यजायत ॥ ६१ ॥

वह पर्वत 12 योजन बिस्तर वाला और पांच योजन ऊंचा था। वह समृद्ध पर्वत मृत्यु लोक में स्वर्ग जैसा प्रतीत होता था।।६१।।

तत्राऽहं कौतुकाविष्ट इतश्चेतश्च वीक्षयन् ॥
सर्वाश्चर्यमयीं नारीमपश्यं लोकसुंदरीम् ॥ ६२ ॥

मैं आश्चर्य में भर कर वहां इधर-उधर देखा हुआ विचरण कर रहा था इस समय मैं वहां संपूर्ण आश्चर्यों से युक्त त्रैलोक्यसुंदरी एक स्त्री को देखा
।।६२।।

न देवी नापि गंधर्वी नासुरी न च मानुषी ।॥ ।।
तादृश्या मया दृष्टा न श्रुता च वराङ्गना ॥ ६३ ॥

मैंने संसार में कोई देवी या गंधर्व कन्या अथवा असुर कन्या किंवा मानवकन्या न तो ऐसी देखी थी और ना सुनी ही थी।।६३।।

रतिः प्रीतिरुमा लक्ष्मीः सावित्री च सरस्वती ॥
तस्या रूपस्य लेशेन नैतास्तुल्याः स्त्रियोऽखिलाः ॥ ६४ ॥

उसके सामान रति प्रति पार्वती लक्ष्मी सावित्री और सरस्वती यह सब देवियां उस देवी के रूप के एक लेश के तुल्य भी नहीं हैं।।६४।।

अहं दृष्ट्वा तथारूपां नारीं कामेन पीडितः ॥
तदा दानवशार्दूल वैक्लव्यं परमं गतः ॥ ६६ ॥

उस प्रकार विलक्षण रूप वाली नारी को
देखकर मैं काम से पीड़ित हो गया । हे दानवश्रेष्ठ!
उस समय मैं अत्यन्त विकल हो गया।।६६।।

ततो धैर्यमवष्टभ्य मया मनसि चिन्तितम् ॥
न करिष्ये समालापं तया सह च कर्हिचित् ॥ ६६ ॥

तत्पश्चात् धैर्य धारण करते हुए मैंने मन में सोचा कि उसके साथ कभी भी वार्तालाप नहीं करूंगा।।६७।।

यस्या दर्शनमात्रेण कामो मे हृदि वर्धितः ॥
तस्याः संभाषणेनैव किं भविष्यति मे पुनः ॥ ६७ ॥

जिसके दर्शन मात्र से मेरे हृदय में काम बढ़ गया। उसके साथ बात चीत करने से न जाने क्या होगा?६७।।

चिरकालं तपस्तप्तं ब्रह्मचर्येण वै मया ॥
नाशं यास्यति तत्सर्वं विषयैर्निर्जितस्य च ॥
तस्माद्गच्छामि चान्यत्र यावन्न विकृतिर्भवेत् ॥ ६८।।

मैंने ब्रह्मचर्य धारण करते हुए दीर्घकाल तक तप किया है। यदि मैं विषयों के वश में हो गया तो वह सब नष्ट हो जायेगा। इसलिए जब तक मेरा मन विकारयुक्त नहीं होता है। तब तक मुझे अन्यत्र चले जाना चाहिए।।६८।।

नारी नाम तपोविघ्नं पूर्व सृष्टं स्वयंभुवा ॥
अर्गला स्वर्गमार्गस्य सोपानं नरकस्य च ॥ ६९ ॥

श्रीब्रह्मा जी ने पूर्वकाल में तपश्चर्या में विघ्नरूप नारी की सृष्टि की । यह स्वर्ग प्राप्ति के मार्ग में खुले दरवाजे को बंद करने में लकड़ी की किल्ली या जंजीर है और नरक की प्राप्ति में सोपान अर्थात् सिढ़ी है।।६९।।

तावद्धैर्यं तपः सत्यं तावत्स्थैर्यं कुलत्रपा ॥
यावत्पश्यति नो नारीमेकान्ते च विशेषतः ॥ ७० ॥

तभी तक धैर्य, तपश्चर्या, सत्य,स्थिरता,और कुल की लाज है। जब तक एकान्त में विशेष स्त्री को नहीं देखता है।।७०।।

एतत्संचित्य बहुधा निमील्य नयने ततः ॥
अप्रजल्प्य वरारोहां तामहं चात्र संस्थितः ॥ ७१ ॥

वार वार ऐसा सोचकर उस सर्वांग सुन्दरी से वार्तालाप किये विना ही आंखें बंद करके मैं वहां से यहां चला आया ।।७१।।

॥ पुलस्त्य उवाच् ॥

पुलस्त्य जी बोले–

॥ नारदस्य वचः श्रुत्वा महिषः कामपीडितः ॥
श्रवणादपि राजेन्द्र पुनः पप्रच्छ तं मुनिम् ॥ ७२ ॥

देवर्षि नारद की बात सुनने मात्र से महिषासुर काम से पीड़ित हो गया । हे राजेंद्र ! उसने पुनः उन मुनि से पूछा ‌।७२।।

॥ महिषासुर उवाच ॥

महिषासुर बोला–

॥ काऽसौ ब्राह्मणशार्दूल तादृग्रूपा वरांगना ॥
यस्याः संदर्शनादेव भवानेव स्मरान्वित: ।।७३।।

हे विप्र श्रेष्ठ! ऐसे रूप वाली वह सुंदर स्त्री कौन है? जिसके दर्शन मात्र से आप कामाक्रान्त हो गए।।७३।।

॥ देवी वा मानुषी वापि यक्षिणी पन्नगी मुने ॥
कुमारी वा सकान्ता वा ब्रूहि सर्व सविस्तरम् ॥ ७४ ॥

हे मुने! वह देवी है या मनुष्यकन्या? अथवा यक्षिणी अथवा नागकन्या ? वह कुमारी है अथवा पति वाली है ? ये सब मुझे विस्तार से बतलायें।।७४।।

॥ नारद उवाच ॥

नारद जी बोले —

॥ न सा पृष्टा मया किंचिन्न जानामि तदन्वयम् ॥
एतन्मे वर्तते चित्ते सा कुमारी यशस्विनी ॥ ७५ ॥

है दानवश्रेष्ठ ! मैंने इस विषय में उससे कुछ नहीं पूछा । इसलिए मैं उसके वंश को नहीं जानता हूं ।
हां मेरे मन में ऐसा निश्चय है कि वह यशस्विनी
बाला कुमारी ही होगी।।७५।।

अक्षमालाधरा बाला कमण्डलुसमन्विता ।।
। तपस्तेपे गिरौ तत्र हेतुना केनचिच्छुभा ॥ ७६ ॥

वह कुमारी अक्षमाला को धारण करने वाली तथा कमंडलु से युक्त है। और वह मंगलमयी बाला किसी कारणविशेष से उस आबू पर्वत पर तप कर रही है ।।७६।।

सोऽहं यास्यामि दैत्येश ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥
नोत्सहे तत्कथां कर्तुं कामबाणभयातुरः ॥ ॥ ७७ ॥

हे दैत्येन्द्र! मैं सनातन ब्रह्मलोक को जाऊंगा। मैं कामबाण के भय से आतुर होने के कारण उसकी कथा किसी भी प्रकार से करना नहीं चाहता हूं।।७७।।

एवमुक्त्वा ततो राजन् ब्रह्मलोकं गतो मुनिः ॥
महिषोऽपि स्मराविष्टश्चरं तस्याः समादिशत् ॥ ७८ ॥

हे राजन्! इस प्रकार महिषासुर से कहकर मुनिवर नारद ब्रह्मलोक को चले गए। इधर महिषासुर काम से आक्रांत हो गया और उसे कन्या के लिए अपने दूध को आदेश दिया ।।७८।।

गत्वा भवान् द्रुतं तत्र दृष्ट्वा तां च वराङ्गनाम् ।।
किमर्थं सा तपस्तेपे को वै तस्याः परिग्रहः ॥ ७९ ॥

हे दूत! आप वहां शीघ्रतापूर्वक जाकर उस सुंदर कन्या को देखकर यह पता लगायें कि वह किस लिए तप कर रही है और वह किससे विवाह करना चाहती है।।७९।।

अथाऽसौ महिषादेशाद्दूतो गत्वार्बुदाचलम् ॥
दृष्ट्वा तां पद्मगर्भाभां ज्ञात्वा सर्वं विचेष्टितम् ॥ ८० ॥

तत्पश्चात् वह दूत महिषासुर के आदेश से आबू पर्वत जाकर कमल की पराग के समान कांति वाली उस बाला को देखकर और उसकी संपूर्ण चेषटाओं को जानकर।।८०।।

तस्मै निवेदयामास महिषाय सविस्मयः ॥
दृष्टा दैत्यवर स्त्री च सर्वलक्षणलक्षिता ॥ ८१ ॥

उस महिष दैत्य को सब कुछ बतलाया । इससे वह दानव अत्यंत विस्मित हुआ। हे दैत्यश्रेष्ठ! संपूर्ण शुभ लक्षणों वाली उस कन्या को मैंने देखा है।।८१।।

देवतेजोभवा कन्या साSद्यापि वरवर्णिनी ॥
त्वद्वधार्थं तपस्तेपे कौमारव्रतमाश्रिता ॥ ८२ ॥

है दैत्येन्द्र,! वह कन्या देवताओं के तेज से उत्पन्न है। और आज भी वर का वरण करने की इच्छा वाली है। तुम्हारे वध के लिए वह कुमारियों के व्रत का आश्रय लेकर तप कर रही है।।८२।।

एवं तत्र भवन्ती स्म पृष्टाः सर्वे तपस्विनः ।॥ सत्त्यमेतन्महाभाग कुरुष्व यदनंतरम् ॥ ८३ ॥

हे महाभाग ! इस प्रकार वह कन्या वहां निवास कर रही है। समस्त तपस्वियों से मैंने इस विषय में पूछा है और जो मैंने कहा यही सत्य है। अब इसके बाद जो कुछ आपको करना हो उसे आप करें।।८३।।

तस्या रूपं वयः कान्तिर्वर्णितुं नैव शक्यते ॥
नालापं कुरुते बाला सा केनापि समं विभो ॥८४॥

उसके रूप,सुंदर अवस्था और कान्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता । हे प्रभो! वह बाला किसी के साथ वार्तालाप नहीं करती।।८४।।

॥ पुलस्त्य उवाच।।

पुलस्त्य जी बोले–

॥ तच्छ्रुत्वा महिषो वाक्यं भूयः कामनिपीडितः ॥ दूतं संप्रेषयामास दानवं च विचक्षणम् ॥ ८५ ॥

ये सब वचन सुनकर महिष पुनः काम से आक्रांत हो गया। उसने देवी के समीप विचक्षणा नामक दानव को भेजा।।८५।।

विचक्षण द्रुतं गत्वा मदर्थे तां तपस्विनीम् ॥ सामभेदप्रदानेन दण्डेनापि समानय ॥ ८६।।

हे विचक्षण ! तुम शीघ्र ही उस बाला के समीप जाओ। और उस तपस्विनी कन्या को साम दाम दण्ड भेद इनमें किसी भी उपाय से मेरे लिए ले आओ।।८६।।

अथाऽसौ प्रययौ शीघ्रं प्रणिपत्य विचक्षणः ॥
अर्बुदे पर्वतश्रेष्ठे यत्र सा परमेश्वरी ॥
प्रणम्य विनयोपेतो वाक्यमेतदुवाच ताम्॥८७॥

तत्पश्चात् वह विचक्षणा महिष को प्रणाम करके शीघ्र ही वहां से आबू पर्वत पर्वत पहुंचा । जहां वे परमेश्वरी तप कर रही थीं। उसने उन्हें प्रणाम करके विनम्रभाव से यह वचन बोला।।८७।।

महिषो नाम विख्यातस्त्रैलोक्याधिपतिर्बली॥दनुवंशसमुद्भूतः कामरूपसमन्वितः॥८८॥

हे देवि! तीनो लोकों का स्वामी महाबलवान दनुवंश में उत्पन्न, स्वेच्छया रूप धारण करने में समर्थ महिष निम से प्रसिद्ध दानव है।।८८।।

स त्वां वांछति कल्याणि धर्मपत्नीं स्वधर्मतः ॥ तस्माद्वरय भद्रं ते सर्वकामप्रदं पतिम् ॥ ८९ ॥

हे मंगलमयि! वह धर्मानुसार आपको अपनी पत्नी बनाना चाहता है। इसलिए आप समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले उस मंगलमय को पति रूप में वरण कर लें।।८९।।

यदि स्यात्तव कांतोऽसौ त्वं च तस्य तथा प्रिया ॥ तत्कृतार्थं द्वयोरेव यौवनं नात्र संशय:॥ ९० ॥

यदि वह तुम्हारा पति और तुम उसकी प्राणप्रिया हो जाओ। तो दोनों की युवावस्था कृतार्थ हो जायेगी । इसमें कोई संशय नहीं है।।९०।।

॥ एवमुक्ता ततस्तेन देवी वचनमब्रवीत् ॥ किञ्चित्कोपसमायुक्ता मुहुः प्रस्फुरिताधरा॥९१॥

जब इस प्रकार उसने भगवती से कहा। तो वे कुछ क्रोध से आविष्ट होकर वार वार ओठों को फड़फड़ाते हुए बोलीं।।९१।।

॥ देव्युवाच ॥

देवी बोली —

॥ अवध्यः सर्वथा दूतः सर्वत्र परिकीर्तितः ॥ अवस्थासु ततो न त्वं सहसा भस्मसात्कृतः ॥९२॥

हे विचक्षणा! दूत सर्वथा सभी अवस्थाओं में अवध्य कहा गया है। इसलिए मैंने तुम्हें भस्म नहीं किया है। ।९२।।

गत्वा ब्रूहि दुराचारं महिषं दानवाधमम् ॥
नाहं शक्या त्वया पाप लब्धुं नान्येन केनचित् ॥ ९३ ॥

यहां से जाकर दुराचारी दानवों में अधम महिष को बोलो। कि हे पापिन्! मैं तेरे द्वारा किसी भी प्रकार से प्राप्त नहीं की जा सकती।।९३।।

वधार्थं ते समुद्योग एष सर्वो मया कृतः ॥
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा महिषं स पुनर्ययो ॥ ९४ ॥

मेरा यह सब उद्योग तेरे वध के लिए है। विचक्षण भगवती के वचन को सुनकर पुनः महिषासुर के पास गया ।।९४।।

भयेन महता विष्टस्तस्या रूपेण विस्मितः ॥
सर्वं निवेदयामास महिषाय विचेष्टितम् ॥
तस्याश्चैव तथाऽऽलापानस्पृहत्वं च कृत्स्नशः ॥ ९५ ॥

वह दूत भगवती के सुंदर रूप से आश्चर्य चकित और महान् भय से आक्रांत था। उसने देवी की संपूर्ण चेष्टाओं, उनके वार्तालाप और महिष के प्रति उनकी निस्पृहता ये सब पूर्णरूपेण महिषासुर से बतलाया ।।९५।।

तच्छ्रुत्वा महिषो राजन्कामवाणप्रपीडितः ॥ सेनापतिं समाहूय वाक्यमेतदुवाच ह ॥९६॥

हे राजन्! इन सब तथ्यों को सुनकर महिष कामबाण से पीड़ित हो गया। उसने सेनापति को बुलाकर यह वचन बोला।।९६।।

अर्बुदे पर्वते सेनां कल्पयस्व सुदुर्धराम् ॥
हस्त्यश्वकल्पितां भीमां रथपत्तिसमाकुलाम् ॥ ९७ ॥

हे सेनापते! आबू पर्वत के लिए दुर्धष और भयंकर सेना को तैयार करो। जिसमें हाथी घोड़े रथ आदि हों।।९७।।

ततोऽसौ कल्पयामास चतुरंगां वरूथिनीम् ॥ पताकाच्छत्रशवलां वादित्रारावभूषिताम् ॥ ९८ ॥

तत्पश्चात् उसने चतुरंगिणी सेना तैयार की। जिसमें पताका, छत्र सैनिकों के बाजे के शब्दों से वह सुशोभित थी ।।९८।।

ततो द्विपाश्च संनद्धा दृश्यन्तेऽधिष्ठिता भटैः ॥ इतश्चेतश्च धावन्तः सपक्षाः पर्वता इव ॥ ९९ ॥

तदनन्तर महभट जिन पर बैठे थे। ऐसे तैयार हाथी दिखाई दिये। वे इधर उधर ऐसे दौड़ रहे थे। मानो पंख वाले पर्वत हों।।९९।।

अश्वाश्चैवाप्यकल्माषा वायुवेगाः सुवर्चसः ॥अंगत्राणसमायुक्ताः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १०० ॥सैकड़ों हजारों की संख्या में कवच पहने ( युद्ध में अश्वों को गांव से बचाने हेतु कवच पहनाया जाता था। ये कवच अनेक प्रकार के होते थे)हुए श्वेत रंग के घोड़े, जो वायु के सदृश वेग वाले और अत्यंत तेजस्वी थे।।१००।।

विमानप्रतिमाकारा स्थास्तेन प्रकल्पिताः ॥ किंकिणीजालसद्धंटापताकाभिरलंकृताः ॥ १०१ ॥

उस महिष ने विमानों के समान रथ सुसज्जित कराया। जिनमें छोटी छोटी घंटियां का समूह था। वे रथ सुंदर घंटों एवं पताकाओं से अलंकृत थे।।१०१।।

पत्तयश्च महाकाया महेष्वासा महाबलाः ॥ असिचर्मधराश्चान्ये प्रासपट्टिशपाणयः ॥ १०२ ॥

और पैदल चलने वाले विशालकाय,महान धनुष धारण करने वाले और महाबली थे । उनमें कुछ लोग खड्ग और ढाल को धारण करने वाले तथा अन्य लोग छूरा के मुख जैसा अस्त्र और भाला हाथ में धारण किए हुए थे।।१०२।।

 लक्षमेकं मतंगानां रथानां त्रिगुणं ततः ॥ 

अश्वा दशगुणा राजन्नसंख्याताः पदातयः ॥ १०३ ॥

हे राजन्! महिष की सेना में हाथियों की संख्या 1 लाख और रथों की संख्या उसे तिगुनी अर्थात् ३ लाख थी। और घोड़े ३० लाख तथा पैदल सैनिक असंख्य थे।।१०३।।

 ततश्चार्बुदमासाद्य वेष्टयित्वा स दूरतः ॥ 

संमितैः सचिवैः सार्धं तदन्तिकमुपाद्रवत् ॥ १०४ ॥

तत्पश्चात् वह महिष आबू पर्वत पर पहुंचते ही उसे दूर से ही चारों ओर से घेर कर अपने विश्वसनीय सचिवों के साथ भगवती के समीप पहुंचा ।।१०४।।

ध्यानस्थां वीक्ष्य तां देवीं कन्दर्पशरपीडितः ॥ ततोऽब्रवीत्स तां वाक्यं विनयेन समन्वितः ॥ १०५ ॥

वहां उन भगवती को ध्यानस्थ देखकर वह काम के बाणों से व्याकुल हो उठा और विनय से युक्त होकर उसने भगवती से यह वचन बोला।।१०५।।

 श्रुत्वा तवेदृशं रूपमदं प्राप्तो वरानने॥

 गांधर्वेण विवाहेन तस्माद्वरय मां द्रुतम् ॥ १०६ 

हे देवि ! तुम्हारे इस प्रकार के सुंदर रूप का वर्णन सुनकर मैं यहां आया हूं । इसलिए तुम शीघ्र ही गंधर्व विवाह की पद्धति से मेरा पति रूप में वरण करो ।।१०६।।

षष्टिभार्यासहस्राणि मम सन्ति शुचिस्मिते ॥ 

कृत्वा मां दर्पितं कान्तं तासां त्वं स्वामिनी भव ॥ १०७ ॥

हे मंद मुस्कान वाली कन्ये! मेरे पास 60000 पत्नियां हैं । गर्व से भरे हुए मुझे तुम अपना पति बना कर उन सब की स्वामिनी बन जाओ।।१०७।।

अनर्हं ते तपो बाले भुंक्ष्व भोगान्यथेप्सितान् ॥ त्रैलोक्यस्वामिनी भूत्वा मया सार्धमहर्निशम् ॥ १०८॥

हे बाले! तप करना तुम्हारे योग्य नहीं है। तुम त्रिलोक की स्वामिनी होकर मेरे साथ दिन रात अभिलषित भोगों को भोगो।।१०८।।

एवमुक्ताऽपि सा तेन नोत्तरं प्रत्यभाषत ॥

 ततः कामसमाविष्टस्तदन्तिकमुपाययौ ॥१०९॥

भगवती को उसने इस प्रकार कहा। फिर भी भगवती ने उसे कोई उत्तर नहीं दिया।तत्पश्चात वह काम से आक्रांत होकर उन देवी के समीप पहुंचा।।१०९।।

 ततस्तं लोलुपं दृष्ट्वा सा देवी कोपसंयुता ॥ अस्मरद्वाहनं सिंहं समायातः स साऽऽरुहत् ॥ ११० ॥ 

तत्पश्चात उसे कामलोलुपप को देखकर देवी क्रोध से भर गईं। और उन्होंने अपने वाहन सिंह का स्मरण किया । स्मरण करते ही वह शेर शीघ्र ही वहां आया और वह उस सिंह पर बैठ गई।।११०।।

अब्रवीत्परूषं वाक्यं गच्छ गच्छेति चासकृत् ॥

 नो चेत्त्वां च वधिष्यामि स्थानेऽस्मिन्दानवाधम ॥ १११ ॥

भगवती ने कठोर वचनों में उससे कहा कि हे दानवों में अधम महिष! तू यहां से शीघ्र ही चला जा चला जा। अन्यथा इसी स्थान पर मैं तेरा वध कर दूंगी।।१११।।

 अथाऽसौ सचिवैः सार्धं समन्तात्पर्यवेष्टयत् ॥ प्रग्रहार्थं तु तां देवीं कामवाणप्रपीडितः ॥ ११२ ॥

कामबाण से पीड़ित उस महिष ने अपने सचिवों के साथ सब ओर से उन भगवती को घेर लिया।।११२।।

ततो जहास सा देवी सशब्दं परमेश्वरी ॥ तस्मादहर्निशं सार्धं निष्क्रान्ताः पुरुषा घनाः ॥ ११३ ॥

उसके बाद वे परमेश्वरी देवी शब्द युक्त अट्टहास कीं। जिससे उसके साथ ही समूह के समूह वीर पुरुष निकले।।११३।।

सुसन्नद्धाः सशस्त्राश्च रोषेण महताऽन्विताः ॥ ततस्तानब्रवीदेवी पापोऽयं वध्यतामिति ॥ ११४ ॥

वे सब अस्त्र-शस्त्र धारी महान् क्रोध से भरे हुए युद्ध के लिए तैयार थे। भगवती ने उन सबसे कहा कि इस पापी का वध कर दो।।११४।।

ततस्ते सहिताः सर्वे महिषं समुपाद्रवन्॥

तिष्ठतिष्ठेति जल्पन्तो मुञ्चन्तोऽस्त्राणि भूरिशः ॥ ११५ ॥

उसके बाद वह सब मिल करके ठहर जा ठहर जा इस प्रकार बोलते हुए और नाना प्रकार के अस्त्रों की वृष्टि करते हुए महिषासुर की ओर दौड़े।।११५।। 

ततः समभवद्युद्धं गणानां दानवेः सह॥ 

ततस्ते सचिवा: सर्वे वैवस्वतगृहं गताः ॥ ११६ ॥

तत्पश्चात् भगवती के गणों का दानवों के साथ बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। जिसमें महिषासुर के सब सचिव यमलोक पहुंच गए।।११६।।

अथाऽसौ महिषो रुष्टः सचिवैर्विनिपातितै: ॥ स्वसैन्यमानयामास तस्मिन्पर्वतरोधसि।।११७।।

संपूर्ण सचिवों के रणभूमि में मारे जाने से महिषासुर अत्यंत क्रुद्ध हुआ और वह आबू पर्वत के समीप- वर्ती तट पर अपने सैनिकों को युद्ध के लिए लाया।।११७।।

रथप्रवरमारुह्य सारथिं समभाषत ॥ 

नय मां सारथे तूर्णं यत्र साऽऽरते व्यवस्थिता ॥ ११८ ॥ 

वह एक श्रेष्ठ रथ पर चढ़कर अपने सारथी से बोला कि हे सारथे! तुम मुझे वहां ले चलो जहां पर वह देवी विद्यमान है।।११८।।

हत्वैनामद्य यास्यामि पारं रोषस्य दुस्तरम् ।।एवमुक्तस्ततो राजन् प्रेरयामास सारथिः ॥११९ ॥

आज उस देवी को मार करके मैं क्रोध के दुस्तर सागर के पार जाऊंगा– ऐसा कह कर उसने सारथी को रणभूमि में चलने के लिए प्रेरित किया।।११९।।

रथं तेनैव मार्गेण यत्र सा तिष्ठते ध्रुवम् ॥

 एतस्मिन्नेव काले तु तत्रोत्पाताः सुदारुणाः ॥ १२०॥

वह रथ को उसी मार्ग से ले चला। जहां पर वह भगवती स्थिर होकर विराजमान थीं। उस समय वहां अनेक प्रकार के भयंकर उत्पात होने लगे।।१२०।।

रथं तेनैव मार्गेण यत्र सा तिष्ठते ध्रुवम् ॥

 एतस्मिन्नेव काले तु तत्रोत्पाताः सुदारुणाः ॥ १२०॥

बहवस्तेन मार्गेण येनासौ प्रस्थितो नृप ॥ 

सम्मुखः प्रववो वातो रूक्षः कर्करसंयुतः ॥ १२१ ॥

वह रथ को उसी मार्ग से ले चला। जहां पर वह भगवती निश्चित ही विराजमान थीं। उस समय वहां अनेक प्रकार के मृत्युसूचक बहुत भयंकर उत्पात होने लगे।।१२०।।जिस मार्ग से वह प्रस्थान कर रहा था। हे राजन्! उसके समक्ष कंकड़ों से भरी हुई रूखी हवा जोर-जोर से चलने लगी।।१२१।।

 पपात महती चोल्का निहत्य रविमंडलम् ॥

 अपसव्यं मृगाश्वकुस्तस्य मार्गे नृपोत्तम ॥ १२२ ॥

हे राजेन्द्र! उसके सामने सूर्य मंडल को नष्ट करता हुआ जैसा बहुत बड़ा उल्का पिंड गिरा । मार्ग में उसे बांये करते हुए मृग चलने लगे।।१२२।।

 उपविष्टास्तथा वान्ता बहुमूत्रं प्रसुश्रुवु: ॥

 रथध्यजे समाविष्टो गृध्र: शब्दमथाकरोत् ॥ १२३ ॥

वमन का भोजन करने वाले मार्ग में बैठे कुत्तों ने बहुत अधिक मूतना आरंभ कर दिया। उस महिष के रथ की ध्वजा पर बैठकर गीध ने चिल्लाना शुरू कर दिया ।।१२३।।

 स तान्सर्वाननादृत्य महोत्पातान्सुदारुणान् ॥ 

प्रययौ सम्मुखस्तस्या देव्याः कोपपरायणः ॥ १२४ ॥ 

किन्तु महिष उन भयंकर महोत्पातों की अवहेलना करते हुए क्रोध में भरा हुआ देवी के सामने पहुंचा।।१२४।।

विमुञ्चंश्च शरान्नादांस्तिष्ठतिष्ठेति च ब्रुवन्॥

 न कश्चिदृश्यते तत्र तेषां मध्ये नृपोत्तम ॥ १२५ ॥

वह महिष बाणों को छोड़ते हुए और खड़ी रह खड़ी रह- इस प्रकार गर्जना करते हुए भगवती के समीप पहुंचा। हे राजन्! कोई दूसरा उन लोगों के मध्य दिखाई नहीं दे रहा था।।१२५।।

 महिषं रोषसंयुक्तं यो वारयति संगरे ॥

 तेन हत्वा गणगणान्कृतं रुधिरकर्दमम् ॥ १२६ ॥

क्रुद्ध महिषासुर को जो जो रणभूमि में रोकने गया देवी के उन सब गणों के जत्थे को मारकर उसने वहां रक्त का कीचड़ बना दिया।।१२६।।

 ततो देवीं समासाद्य प्रोक्ता गर्वेण पार्थिव ॥ 

न त्वया संगरो भीरु नूनं कर्तुं ममोचितः ॥ १२७ ॥ 

हे राजन्! तत्पश्चात् उन भगवती के समीप पहुंचकर वह दुष्ट उन्हें बड़े गर्व से बोला।अरी डरपोक ! यद्यपि तेरे साथ युद्ध करना मेरे लिए उचित नहीं है।।१२७।।

न च बालिशि मे वीर्यं न सौभाग्यं न वा धनम् ॥ 

न करोषि हि तेन त्वं मम वाक्यं कथञ्चन ॥ १२८ ॥

अरी मूर्ख स्त्रि! तू समझती है कि महिषासुर में पराक्रम, सौभाग्य और उसके पास धन नहीं है। इसीलिए तू किसी भी प्रकार मेरी बात नहीं मान रही है।।१२८।।

 नूनं तत्त्वेन जानामि अवलिप्तासि भामिनि ॥ कुरुष्वाद्यापि मे वाक्यं भार्या भव मम प्रिया ॥ १२९ ॥

हे सुंदर देवि! मैं भली-भांति समझता हूं कि तू अत्यन्त गर्वीली है।फिर भी आज मेरी बात मान लें और मेरी प्रिय पत्नी बन जा।।१२९।।

स्त्रियं त्वां नोत्सहे हन्तुं पौरुषे च व्यवस्थितः ॥ असकृन्निर्जितः संख्ये मया शक्र: सुरैः सह ॥ १३० ॥ 

मैं पराक्रमी होकर भी तुझ स्त्री को मारने में उत्साह नहीं रखता। मैंने अनेक वार युद्ध में देवताओं के सहित इन्द्र को जीता है।।१३०।।

त्रैलोक्ये नास्ति मत्तुल्यः पुमान्कश्चिच्च बालिशि ।॥ एवमुक्ता ततो देवी कोपेन महताऽन्विता ॥ १३१ ॥

मूर्खे! तीनों लोकों में मेरे समान कोई दूसरा पुरुष नहीं है। जब इस प्रकार उसने देवी से कहा तो वे अत्यंत क्रोध से भर गयीं।।१३१।।

 प्रगृह्म सशरं चापं वाक्यमेतदुवाच ह ।। 

नालापो युज्यते पाप कर्तुं सह मम त्वया ॥ १३२ ॥

उन्होंने बाणसहित धनुष को ग्रहण करके उस पापी से यह वचन कहा–” रे पापात्मन् ! यद्यपि मेरा तुझ जैसे पापी के साथ वार्तालाप करना भी उचित नहीं है।।१३२।।

कुमार्याः कामयुक्तेन तथापि शृणु मे वचः ॥

 न त्वया निर्जितः शक्रः स्ववीर्येण रणाजिरे ॥ १३३ ॥ 

क्योंकि मैं कुमारी हूं और तू एक कामलोलुप है। तथापि ( फिर भी) मेरी बात सुन। तूने अपने पराक्रम से देवराज इन्द्र को युद्ध में नहीं जीता है।।१३३।।

पितामह वरं देवा मन्यते दानवाधम ॥

 गौरवात्तस्य तेन त्वमात्मानं मन्यसेऽधिकम् ॥ १३४ ॥

रे दानवाधम! ब्रह्मा जी में गुरुभाव के कारण उनके दिये हुए वर का देवों ने सम्मान किया है। और वे अपने को पराजित स्वीकार कर लिए। इसीलिए मूर्ख! तू स्वयं को देवों से अधिक समझ बैठा है।।१३४।।

 मुक्त्वैकां कामिनीं पाप त्वं कृतः पद्मयोनिना ।॥ अवध्यः सर्वसत्त्वानां पुंसां जातो धरातले ॥ १३५ ॥

अरे पापी! केवल स्त्री को छोड़कर भूमंडल में समस्त जीवों और प्राणियों से तुझे ब्रह्मा ने अवध्य बना दिया है।।१३५।।

 पितामहवरः सोऽत्र जयशीलोऽसि दानव ॥

 यदि ते पौरुषं चास्ति तच्छीघ्रं संप्रदर्शय ॥ १३६ ॥

इसलिए पितामह ब्रह्मा का वर ही तेरी विजय में कारण है कि तू विजयी हुआ है। यदि तुझमें वस्तुत: कुछ पराक्रम है तो मुझे शीघ्र दिखा।।१३६।।

 एषा त्वामिषुभिस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥ एवमुक्त्वा ततो देवी शरानष्टौ मुमोच ह ॥ १३७ ॥

यह मैं तीक्ष्ण बाणों से तुझे यमलोक पहुंचा दूंगी। ऐसा कहकर देवी ने उसके ऊपर आठ बाण छोडा।।१३७।।

चतुर्भिश्चतुरो वाहाननयद्यमसादनम् ॥ 

सारथेश्च शिरः कायाच्छरेणैकेन चाक्षिपत् ॥ १३८ ॥

उन्होंने चार बाणों से रथ के चारों घोड़े को यमलोक पहुंचा दिया और एक बाण से सारथी का सिर धड़ से अलग कर दिया।।१३८।।

 ध्वजं चिच्छेद चैकेन ततोऽन्येन हृदि क्षतः ॥ 

स गात्रविद्धो व्यथितो ध्वजयष्टिं समाश्रितः ॥ १३९ ॥

उन्होंने एक बाण से महिषासुर के रथ की ध्वजा को काट दिया और दूसरे बाण से उसके हृदय में घाव कर दिया । उसका शरीर बाणों से भर गया और वह पीड़ित होकर ध्वज के डंडे को पड़कर के बैठ गया ।।१३९।।

 मूर्छया सहितो राजन्किचित्कालमधोमुखः ॥ 

ततः सचेतनो भूत्वा मुमोच निशिताञ्छरान् ॥ १४० ॥

हे राजन्! वह पापात्मा कुछ समय तक मुंह नीचे लटकाये हुए मूर्छित रहा। तत्पश्चात् चेतना लौटने पर वह तीखे बाणों को भगवती पर छोड़ने लगा।।१४०।।

 देवी सखीसमायुक्ता सर्वदेशेष्वताडयत् ॥

 ततः क्षुरप्रवाणेन धनुस्तस्य द्विधाऽकरोत् ॥ १४१ ॥

अनेक अनुचरियों से घिरी हुई उन देवी ने महिष के संपूर्ण अंगों में बाणों से पीड़ा पहुंचायी। और छूरे जैसी तेज धार वाले क्षुरप्र नामक बाण से उसके धनुष के दो टुकड़े कर दिये।।१४१।।

 छिन्नधन्वा ततो दैत्यश्चर्मखड्गसमन्वितः ॥ 

विद्राव्य सहसा देवीं तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत्।।१४२।।

धनुष कटने के बाद वह दैत्य ढाल और तलवार लेकर दौड़ते हुए सहसा भगवती से बोला –” खड़ी रह खड़ी रह” ।।१४२।।

तस्य चापततस्तूर्ण खड्गं द्वाभ्यां ह्यकृन्तयत् ॥ शराभ्यामर्धबाणेन प्रहस्य प्रासमेव च ॥ १४३ ॥

दौड़कर आते हुए महिष के खड्ग को भगवती ने दो बाणों से काट दिया और हंसकर एक बाण से उसके भाले को खंड खंड कर दिया।।१४३।।

विशस्त्रो विरथो राजन्! स तदा दानवाधमः ॥ ततोऽस्मरच्छरान्भूप शस्त्राणि विविधानि च ॥ १४४ ॥

हे राजन्! जब वह महिष शस्त्र और रथ से हीन हो गया। तब उसने दिव्य बाणों एवं अनेक प्रकार के शस्त्रों का स्मरण किया।।१४४।।

ब्रह्मास्त्रं मनसि ध्यायंस्तूर्णं तस्यै मुमोच सः ॥ मुक्तेनास्त्रेण तस्मिस्तु धूमवर्तिर्व्यजायत ॥ १४५ ॥

उसने ब्रह्मास्त्र का मन में ध्यान करके शीघ्र ही भगवती की ओर छोड़ दिया उसे अस्त्र के छोड़ते ही धूम की एक भयानक बाती उत्पन्न हुई।।१४५।

एतस्मिन्नेव काले तु सब्रह्मास्ते दिवौकसः ॥
परं भयमनुप्राप्ता दृष्ट्वा तस्य पराक्रमम् ॥ १४६ ॥

इस समय ब्रह्मा जी के सहित समस्त देवता उसके पराक्रम को देखकर अत्यंत भयग्रस्त हो गए।।१४६।।

ततो देवी क्षणं ध्यात्वा तदस्त्रं पार्थिवोत्तम ॥ ब्रह्मास्त्रेणाहनत्तूर्णं ततो व्यर्थं व्यजायत ॥ १४७ ॥

हे राजेंद्र ! भगवती ने क्षण भर उसके अस्त्र को विचार कर शीघ्र ही ब्रह्मास्त्र से मारकर उसे नष्ट कर दिया।।१४७।।

ब्रह्मास्त्रे विफले जाते ह्याग्नेयं दानवोत्तमः ॥ प्रेषयामास तां कुद्धो ह्यहनद्वारुणेन सा ॥ १४८ ॥

ब्रह्मास्त्र के विफल हो जाने पर उस श्रेष्ठ दानव ने आग्नेयास्त्र का संधान किया और उसे कृद्ध होकर भगवती की ओर भेजा। किन्तु देवी ने उसे वारुणास्त्र से नष्ट कर दिया।।१४८।।

एवं नानाप्रकाराणि तेन मुक्तानि सा तदा ॥ अस्त्राणि विफलान्येव चक्रे देवी सहस्रशः ॥ १४९ ॥

इस प्रकार उसने नाना प्रकार के अस्त्रों का प्रयोग किया किंतु भगवती ने उसके समस्त अस्त्रों को विफल कर दिया।।१४९।।

एवं निःशेषितास्त्रोऽसौ दानवो बलवत्तरः ॥
चकार परमां मायां दिव्यैरस्त्रै: सुरेश्वरी ॥ १५० ॥

इस प्रकार जब उस बलवान दानव के संपूर्ण अस्त्र समाप्त हो गए तो उसने बड़ी माया का फैलाई। जिसे भगवती देवों की स्वामिनी ने अपने दिव्य अस्त्रों से नष्ट कर दिया।।१५०।।

व्यक्षिपच्च महाकायं महिषं पर्वताकृतिम् ॥ दीर्घतीक्ष्णविषाणाभ्यां युक्तमञ्जनसंनिभम् ॥ १५१ ॥

और भगवती ने बड़े लंबे तथा तीक्षण सींगों से युक्त
काले पर्वत के समान काले महाकाय ,पर्वत जैसी आकृति वाले महिष पर बाणों को छोड़ा।।१५१।।

सिंहस्कंधं च सा देवी ततस्तमध्यरोहत ॥
खड्गेन तीक्ष्णेन शिरो देवी तस्य न्यकृंतत ॥१५२।।

तत्पश्चात् वे देवी सिंह की पीठ पर सवार हो गयीं और उन्होंने अपनी तीखी तलवार से उसे महिषासुर के शिर को काट डाला ।।१५२।।

शूलेन भेदयामास पृष्ठदेशे सुरेश्वरी ॥
ततः कलेवरात्तस्मान्निश्चक्राम महान्पुमान् ॥१५३॥

उन सुरस्वामिनी ने महिष की पीठ को भी शूल से विदीर्ण कर दिया। तत्पश्चात उसे वीरेन शरीर से एक बहुत बड़ा पुरुष निकला।।१५३।।

चर्मखङ्गधरो रौद्रस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
तमप्येवं गृहीत्वा तत्केशपाशे सुरेश्वरी ॥ १५४ ॥

जो अपने हाथ में ढाल और तलवार धारण किये हुए बड़ा भयंकर था। उसने भगवती से कहा कि “खड़ी रह खड़ी रह”। तब भगवती ने उसके शिर के केश पाशों को पकड़ कर उसे भी अपने वश में कर लिया।।१५४।।

निस्त्रिंशेनाहनत्प्रोच्चैः स च प्राणैर्व्ययुज्यत ॥
दानवः पार्थिवश्रेष्ठ पार्श्वे सिंहविदारिते ॥ १५५ ॥

और उन देवी ने बड़े जोर से अपनी तलवार से उसे मारा जिससे उसका शिर कट गया और वह महिष दानव अपने प्राणों से अलग हो गया। हे राजेन्द्र!
भगवती के वाहन सिंह ने उसकी पसलियां को पहले ही फाड़ डाला था ।।१५५।।

ततो जघान भूयोऽपि दानवान्सा रुषान्विता ॥ हतशेषाश्च ये दैत्त्या निर्भिद्य धरणीतलम् ॥ १५६ ॥

तत्पश्चात् उन महादेवी ने क्रोध में भरकर अन्य दानवों को भी मार डाला । और जो दानव शेष बचे थे। वे पृथ्वी को भेद करके पाताल लोक चले गए।।१५६।।

प्रविष्टा भयसंत्रस्ताः पातालं जीवितैषिणः ॥
ततो देव गणाः सर्वे वसवो मरुतोऽश्विनौ ॥१५७॥

जो अपने जीवन की इच्छा रखने वाले थे । वे भगवती के भय से संत्रस्त होकर पाताल में प्रवेश कर गए । तत्पश्चात् देवगण, आठों वसु, मरुद्गण और दोनों अश्विनी कुमार।।१५७।।

विश्वेदेवास्तथा साध्या रुद्रा गुह्यककिन्नराः ॥ आदित्याः शकसंयुक्ताः समेत्य परमेश्वरीम् ॥ १५८ ॥

विश्वेदेव तथा साध्यगण, एकादश रुद्र, किन्नर और द्वादश आदित्य देवराज इंद्र के सहित भगवती के समीप जाकर ।।१५८।।

समंताद्दिव्यपुष्पैश्च तां देवीं समवाकिरन् ॥
स्तुवंतो विविधैः स्तोत्रैर्नमतो भक्तितत्पराः ॥ १५९ ॥

भक्तिपरायण होकरक्षनाना प्रकार के स्तोत्रों से उनकी स्तुति करते एवं नमस्कार करते हुए सब और से उन भगवती पर पुष्पों की वर्षा करने लगे।।१५९।।

युक्तं कृतं महेशानि यद्धतः पापकृत्तमः ॥
त्रैलोक्यं सकलं ध्वस्तं पापेनानेन सुंदरि ॥ १६० ॥

और सविनय बोले- कि हे महादेववल्लभे! आपने बहुत उचित किया जो इस महापापी दानव को मार डाला । हे त्रिपुर सुंदरि ! इस पापी ने तीनों लोकों को नष्टप्राय कर दिया था।।१६०।।

त्वया दत्तं पुना राज्यं वासवस्य त्रिविष्टपे ॥ तस्माद्वरय भद्रं ते वरं यन्मनसीप्सितम् ।।
सर्वे देवाः प्रसन्नास्ते प्रदास्यंति न संशयः ॥ १६१ ॥

हे मात:! अपने स्वर्ग लोक में देवराज इंद्र का राज्य पुनः उन्हें प्रदान कर दिया । इसलिए हे कल्याणि! आप हम लोगों से जो मन में अभीष्ट हो वह वर मांग लें। हम सब देवता आप पर प्रसन्न हैं । हम वह वर अवश्य देंगे । इसमें कोई समस्या नहीं है।।

॥ देव्युवाच ॥

भगवती बोलीं–

यदि देवाः प्रसन्ना मे यदि देयो वरो मम ॥ आश्रमोऽत्रैव मे पुण्यो जायतां ख्यातिसंयुतः ॥ १६२ ॥

हे देवों! यदि आप लोग मुझ पर प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना ही चाहते हैं । तो आप लोग यही वर दें कि मेरा यह आश्रम पुण्यवर्धक तथा तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो ।।१६२।।

अस्मिंश्चाहं सदा देवाः स्थास्यामि वरपर्वते ॥ १६३ ॥

मैं आबू पर्वत के इस आश्रम में सदा निवास करूंगी।।१६३।।

॥ ब्रह्मोवाच ॥

श्रीब्रह्मा जी बोले–

॥ रूपेणानेन देवेशि ये त्वां द्रक्ष्यन्ति मानवाः ॥ आश्रमेऽत्र महापुण्ये ते यास्यंति परां गतिम् ॥ १६४॥

ब्रह्मज्ञानसमायुक्तास्ते भविष्यति मानवाः ॥ १६५ ॥

हे देवों की स्वामिनि! जिस रूप से अपने महिषासुर का वध किया है । आपके इस रूप का जो मनुष्य इस महापुण्यप्रद आश्रम में आकर दर्शन करेंगे वे मोक्ष को प्राप्त कर लेंगे ।।१६४।।
क्योंकि वे सब मनुष्य ब्रह्म ज्ञान से संपन्न होंगे।।१६५।।

यस्माचंड कुतं कर्म त्वया दानवसूदनात् ॥
तस्मात्त्वं चंडिकानाम लोके ख्यातिं गमिष्यसि ॥ १६६ ॥

हे देवि! आपने बड़ा प्रचंड कर्म किया है; क्योंकि आपने महिषासुर नामक दानव का वध कर दिया है। इसलिए आप संपूर्ण संसार में चण्डिका के नाम से विख्यात होंगी।।१६६।।

तव नाम्ना तथा ख्यात आश्रमोऽयं भविष्यति।।
॥१६७।।

आपके नाम से ही यह आश्रम विख्यात होगा अर्थात इसका नाम “चण्डिकाश्रम” होगा ।।१६७।।

येSत्र कृष्णचतुर्दश्यामाश्विने मासि शोभने ॥ पिण्डदानं करिष्यन्ति स्नानं कृत्वा समाहिताः ॥ १६८ ॥

हे मात:! जो आश्विन मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को इस आश्रम में आकरज्ञस्नान करके एकाग्रचित होकर पिंडदान करेंगे।।१६८।।

गयाश्राद्धफलं कृत्स्नं तेषां देवि भविष्यति ॥ त्वदर्शनात्तथा मुक्तिः पातकस्य भविष्यति ॥ १६९ ॥

हे महादेवि! उन लोगों को गया में श्राद्ध करने का संपूर्ण फल प्राप्त होगा और आपका दर्शन करने से उन्हें पापों से मुक्ति भी मिलेगी।।१६९।।

॥ कृष्ण उवाच ॥

श्रीकृष्ण बोले–

॥ एकरात्रिं भविष्यंति येऽत्र श्रद्धासमन्विताः ॥ उपवासपरास्तेषां पापं यास्यन्ति संक्षयम् ॥ १७० ॥

जो श्रद्धालु इस आश्रम में एक रात उपवास पारायण होकर निवास करेंगे उनके संपूर्ण पाप पूर्णतया नष्ट हो जाएंगे।।१७०।।

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